# अरावली की वादियों में बसा 800 साल पुराना सीम माता मंदिर, युद्धकाल की तलवार आज भी है मौजूद

> राजसमंद जिले की पहाड़ियों पर स्थित सीम माता का 800 साल पुराना मंदिर अपनी ऐतिहासिक मान्यताओं और दुर्गम रास्ते के लिए जाना जाता है। नवरात्रि के दिनों में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-17 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/tracing-the-history-of-the-800-year-old-seem-mata-temple-amidst-the-aravali-hills-48709 · **Language:** Hindi
**Tags:** सीम माता मंदिर, राजसमंद, मेवाड़ इतिहास, अरावली पहाड़ियां, नवरात्रि, देवगढ़ आमेट

मेवाड़ की ऐतिहासिक धरा पर अनगिनत प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर स्थापित हैं, जिनकी कहानियां पराक्रम और अटूट श्रद्धा की मिसाल पेश करती हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध स्थान राजसमंद जिले में देवगढ़ और आमेट की सीमा के पास अरावली की श्रृंखलाओं के बीच स्थित है, जिसे सीम माता मंदिर के रूप में जाना जाता है। लगभग 800 वर्षों के प्राचीन इतिहास को अपने आंचल में समेटे इस पावन धाम तक पहुंचना आसान नहीं है, क्योंकि भक्तों को यहां तक आने के लिए दुर्गम रास्तों और सात पहाड़ियों को पार करना पड़ता है। जमीन के धरातल से लगभग 1000 फीट की ऊंचाई पर विराजमान यह देवी स्थल आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए गहरी आस्था का बड़ा केंद्र है, और विशेषकर नवरात्रि के पावन पर्व पर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।

 

## सीमाओं पर विराजने के कारण पड़ा नाम और भौगोलिक स्थिति
 अरावली की प्राकृतिक हरियाली और पथरीली वादियों के बीच घिरे इस मंदिर का नामकरण भी इसकी भौगोलिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह माता कुल पांच गांवों की सीमाओं के मध्य विराजमान हैं, जिसके कारण इन्हें सीम माता पुकारा जाता है। इन पहाड़ियों का रास्ता काफी कठिन और संकरा है, फिर भी माता के प्रति अटूट विश्वास रखने वाले श्रद्धालु हर बाधा को पार करके यहां पहुंचते हैं। इस स्थान से जुड़ी एक और अनोखी जनश्रुति काफी प्रसिद्ध है, जिसके मुताबिक साल में एक बार पूरी पहाड़ी का रंग बदलकर बिल्कुल सोने जैसा चमकने लगता है। इस दुर्लभ और अद्भुत प्राकृतिक दृश्य को देखने के लिए भी लोग खासे उत्साहित रहते हैं और इस अनोखे पल के साक्षी बनना चाहते हैं.

 

## मुगलकाल और मेवाड़ के इतिहास से जुड़ा गौरवशाली संबंध
 सीम माता का यह धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसका सीधा नाता मेवाड़ के वीरतापूर्ण इतिहास से भी जोड़ा जाता है। परंपराओं और किंवदंतियों के अनुसार, जब मुगलकाल के दौरान विभिन्न रियासतों पर लगातार आक्रमण हो रहे थे, तब स्थानीय ठाकुर परिवारों ने अपनी कुलदेवी और आराध्य से अपनी रक्षा की गुहार लगाई थी। ऐसी मान्यता है कि कमेरी गांव के ठाकुर प्रताप सिंह चुण्डावत और उनके पूरे परिवार की युद्ध के विकट समय में माता ने प्रत्यक्ष रूप से सहायता की थी। किंवदंतियों में यह भी कहा जाता है कि माता अपने भक्त ठाकुर प्रताप सिंह को साक्षात दर्शन देती थीं। युद्ध के उस कालखंड में माता द्वारा उपहार स्वरूप दी गई तलवार आज भी इस मंदिर में सुरक्षित रखी हुई है, जिसे देखने और नमन करने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं.

 

## पीढ़ियों से चली आ रही सेवा और नवरात्र का उल्लास
 इस ऐतिहासिक मंदिर की एक अन्य अनूठी विशेषता इसकी प्राचीन पूजा परंपरा से जुड़ी हुई है। यहां किसी अन्य समिति या बाहरी पुजारी के बजाय एक ही गुर्जर परिवार की दसवीं पीढ़ी लगातार माता की सेवा और पूजा-अर्चना करती आ रही है। मंदिर के वर्तमान पुजारी भगवान लाल गुर्जर ने इस स्थल के गौरवशाली इतिहास और चली आ रही परंपराओं के बारे में विस्तार से बताया है। सदियों से चली आ रही यह निरंतर सेवा इस बात की गवाही देती है कि स्थानीय लोगों की इस मंदिर के प्रति कितनी गहरी और अटूट आस्था है। साल में आने वाले दोनों प्रमुख नवरात्र यानी चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां नौ दिनों तक भारी चहल-पहल रहती है और भक्तजन माता के चरणों में हाजिरी लगाकर अपने परिवार के लिए सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं। मेवाड़ की इस पावन शक्तिपीठ में इतिहास, संस्कृति और लोकविश्वास का अनूठा संगम आज भी जीवंत नजर आता है.

## इसका आप पर असर
यह एक धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल से जुड़ी खबर है, जिसका सीधा असर स्थानीय यात्रा व्यवस्था और धार्मिक आयोजनों पर पड़ता है।

- **राजसमंद में:** स्थानीय निवासियों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को दुर्गम पहाड़ियों और सात पहाड़ियों के रास्ते चढ़ाई करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। नवरात्रि के दौरान प्रशासनिक व्यवस्थाओं और भीड़ प्रबंधन का स्थानीय लोगों के आवागमन पर असर रहता है।

- **भारत में:** देश के अन्य हिस्सों से मेवाड़ के प्राचीन मंदिरों की यात्रा की योजना बनाने वाले पर्यटकों को पर्वतीय क्षेत्रों में पैदल मार्ग की कठिन परिस्थितियों के अनुसार अपनी तैयारी करनी चाहिए। यह ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करने वाले यात्रियों को स्थानीय सांस्कृतिक धरोहरों और परंपराओं से रूबरू होने का अवसर प्रदान करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह मंदिर अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति, सदियों पुराने इतिहास और स्थानीय राजवंशों से जुड़ी रक्षात्मक कथाओं के कारण पीढ़ियों से प्रसिद्ध रहा है।

- **भौगोलिक मान्यता:** पांच गांवों की सीमाओं पर स्थित होने के कारण इस देवी का नाम सीम माता पड़ा, जो इसे स्थानीय भूगोल से जोड़ता है।

- **ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** मुगलकाल के दौरान रियासतों पर हुए आक्रमणों और स्थानीय ठाकुर परिवारों की रक्षा से जुड़ी लोककथाएं इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को पुख्ता करती हैं।

- **वंशागत सेवा परंपरा:** एक ही गुर्जर परिवार की दस पीढ़ियों द्वारा लगातार मंदिर की सेवा करने से इसकी परंपराएं जीवित और सुरक्षित रही हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. सीम माता मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर राजसमंद जिले में देवगढ़ और आमेट की सीमा के पास अरावली की पहाड़ियों में स्थित है।

### 2. मंदिर तक पहुंचने के लिए कितने पहाड़ियों को पार करना पड़ता है?
इस प्राचीन मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कुल सात पहाड़ियों को पार करना पड़ता है।

### 3. मंदिर धरातल से कितनी ऊंचाई पर है?
यह मंदिर जमीन से लगभग 1000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

### 4. सीम माता नाम क्यों पड़ा?
मान्यता है कि माता पांच गांवों की सीमाओं पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें सीम माता कहा जाता है।

### 5. युद्धकाल से जुड़ी कौन सी वस्तु आज भी मंदिर में मौजूद है?
युद्ध के समय माता द्वारा भेंट की गई तलवार आज भी मंदिर में मौजूद है।

### 6. वर्तमान में मंदिर की सेवा कौन कर रहा है?
गुर्जर परिवार की दसवीं पीढ़ी मंदिर में पूजा-अर्चना और सेवा कर रही है, जिसके पुजारी भगवान लाल गुर्जर हैं।

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