# आधुनिक युग में भी बरकरार है सिलबट्टे का क्रेज, इस वजह से आज भी लोग करते हैं इस्तेमाल

> आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मिक्सी के दौर में भी पारंपरिक सिलबट्टे की मांग आज बाजारों में बनी हुई है। कारीगरों की मेहनत और इससे तैयार मसालों के अनोखे स्वाद के कारण नई पीढ़ी भी इसे अपना रही है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/traditional-stone-grinders-remain-popular-in-modern-kitchens-despite-high-tech-appliances-30527 · **Language:** Hindi
**Tags:** सिलबट्टा, पारंपरिक रसोई, मसाला पीसना, आयुर्वेद, भारतीय संस्कृति, घरेलू उपकरण

तेजी से बदलती जीवनशैली और तकनीकी विकास के इस दौर में घरों का खान-पान और रसोई का सामान भी काफी बदल चुका है। आज के समय में रसोई के ज्यादातर काम हाईटेक और बिजली से चलने वाली मशीनों के जरिए किए जाते हैं, जिसके चलते पुरानी संस्कृति से जुड़ी कई चीजें धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो चुकी हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसी चीजें आज भी अपनी खास पहचान और उपयोगिता बनाए हुए हैं जिन्हें आधुनिक मशीनें चाहकर भी पूरी तरह विस्थापित नहीं कर पाई हैं।

ऐसी ही एक पारंपरिक वस्तु सिलबट्टा है, जो कभी हर घर की रसोई की मुख्य जरूरत हुआ करती थी और आज भी बाजारों में इसकी मजबूत मांग देखने को मिलती है। बाजारों में कारीगर आज भी पत्थर को हथौड़े और टांकी की मदद से तराशकर इस पारंपरिक उपकरण को हाथों से तैयार करते हैं। इन कुशल कारीगरों का मानना है कि अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर से बनाया गया यह साधन लंबे समय तक टिकता है और इसमें तैयार किए जाने वाले मसालों तथा चटनियों का स्वाद आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में तैयार सामग्री से बिल्कुल अलग और बेहतर होता है।

इस पारंपरिक पत्थर पर लहसुन, अदरक, विभिन्न मसाले और तरह-तरह की चटनियां पीसने का चलन सदियों पुराना है। आधुनिक मिक्सी जहां चीजों को तेजी से पीसती है, वहीं इस विधि में सामग्री की पिसाई धीरे-धीरे होती है, जिससे उसके प्राकृतिक गुण, बनावट और स्वाद में स्पष्ट अंतर महसूस होता है। यही मुख्य कारण है कि आज भी कई लोग खास पकवानों और पारंपरिक चटनियों का असली स्वाद पाने के लिए इसी विधि का उपयोग करना पसंद करते हैं।

विशेष स्वाद के अनुभव के कारण अब नई पीढ़ी के लोगों का झुकाव भी एक बार फिर इस पारंपरिक रसोई उपकरण की तरफ बढ़ने लगा है। विशेष तौर पर ग्रामीण इलाकों के अलावा पारंपरिक भोजन शैली को पसंद करने वाले परिवारों में इसका प्रयोग आज भी बड़े पैमाने पर देखा जा सकता है, जो आधुनिकता के बीच पुरानी संस्कृति की मजबूत पकड़ को दर्शाता है।

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश भारद्वाज का इस विषय में कहना है कि यह उपकरण प्राकृतिक पत्थर से बनता है और इसमें सामग्री पीसने की प्रक्रिया पूरी तरह पुरानी पद्धति पर आधारित होती है। उनके अनुसार, घरेलू स्तर पर तैयार की जाने वाली इन चीजों में ताजे घटकों के प्रयोग से भोजन की गुणवत्ता और स्वाद में सकारात्मक अंतर आता है। इस तरह पारंपरिक रूप से तैयार ताजा भोजन पाचन तंत्र के लिए भी काफी मुफीद साबित हो सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे किसी प्रकार की बीमारी या पेट संबंधी समस्याओं के इलाज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

आम लोगों का भी यही मानना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय की बचत के लिए बिजली से चलने वाली मिक्सी का उपयोग अनिवार्य हो गया है, लेकिन जब बात किसी खास स्वाद और प्रामाणिक तरीकों से खाना बनाने की आती है तो सिलबट्टे का विकल्प कोई नहीं ले सकता है। यही कारण है कि एक समय जो सामान घरों से लगभग गायब होता दिख रहा था, वह अब एक बार फिर आधुनिक दौर के रसोई घरों में अपनी जगह बनाता नजर आ रहा है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक खान-पान और रसोई की पुरानी विधियों के प्रति बढ़ते रुझान का सीधा असर घरेलू जीवनशैली और स्वास्थ्य पर पड़ता है।

- **भारत में:** पारंपरिक उपकरणों के इस्तेमाल से लोगों के खान-पान में स्वाद और प्राकृतिक गुणवत्ता बनी रहती है। इससे आधुनिक जीवनशैली के बीच पुरानी सांस्कृतिक पद्धतियों को संरक्षित रखने में मदद मिलती है।
- **रसोई और स्वास्थ्य पर असर:** सिलबट्टे पर धीमी गति से पिसे मसालों से भोजन का टेक्सचर बेहतर होता है, जिससे पाचन प्रक्रिया पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, यह किसी चिकित्सीय उपचार का विकल्प नहीं है।

## ऐसा क्यों हुआ
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के बावजूद पारंपरिक उपकरणों के टिके रहने के पीछे कई खास वजहें और सांस्कृतिक जुड़ाव हैं।

- **स्वाभाविक पिसाई की प्रक्रिया:** मिक्सी की तेज गति के विपरीत पत्थर पर धीमी गति से पीसने से मसालों के प्राकृतिक तेल और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं।
- **स्वाद और बनावट का अंतर:** पारंपरिक विधि से तैयार चटनियों और मसालों का टेक्सचर अलग होता है, जिसे आधुनिक मशीनें पूरी तरह दोहरा नहीं पाती हैं।
- **कारीगरों की कला:** आज भी कुशल कारीगरों द्वारा हथौड़े और टांकी से मजबूत पत्थरों को तराशकर इन्हें टिकाऊ बनाया जाता है, जिससे इनकी मांग बाजार में बनी हुई है।

## सवाल-जवाब

### 1. सिलबट्टा किस चीज से तैयार किया जाता है?
सिलबट्टा प्राकृतिक पत्थर को हथौड़े और टांकी की मदद से तराशकर हाथों से तैयार किया जाता है।

### 2. इलेक्ट्रॉनिक मिक्सी के मुकाबले सिलबट्टे पर पीसने से क्या अंतर आता है?
मिक्सी के मुकाबले सिलबट्टे पर सामग्री धीरे-धीरे पिसती है, जिससे स्वाद, बनावट और गुणवत्ता में स्पष्ट अंतर महसूस होता है।

### 3. सिलबट्टे पर मुख्य रूप से क्या पीसा जाता है?
इस पर मसाले, चटनी, लहसुन, अदरक और अन्य खाद्य सामग्री पारंपरिक रूप से पीसी जाती है।

### 4. डॉ. ओमप्रकाश भारद्वाज के अनुसार सिलबट्टे के भोजन का स्वास्थ्य पर क्या असर होता है?
ताजी सामग्री से पारंपरिक तरीके से तैयार भोजन पाचन के लिहाज से बेहतर हो सकता है, लेकिन इसे किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जाना चाहिए।

### 5. आज के दौर में सिलबट्टा क्यों लोकप्रिय हो रहा है?
विशेष स्वाद और पारंपरिक खान-पान के प्रति बढ़ते रुझान के कारण नई पीढ़ी भी अब इसे फिर से अपनाने लगी है।

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