त्योहारी सीजन में पेंट के खर्च से राहत दिला रही करौली की पारंपरिक कली, सिर्फ 250 रुपये में दीवारों पर आएगी निखार दिवाली के मौके पर राजस्थान के करौली में महंगे डिस्टेंपर के मुकाबले देसी कली की जबरदस्त मांग देखी जा रही है, जो कम बजट के साथ कीटों से भी बचाव करती है। त्योहारी सीजन शुरू होते ही घरों के रंग-रोगन की तैयारियां तेज हो जाती हैं। बाजार में तरह-तरह के महंगे ब्रांडेड पेंट और डिस्टेंपर उपलब्ध होने के बावजूद राजस्थान के करौली में लोग आज भी अपने पुराने और पारंपरिक तौर-तरीकों पर भरोसा जता रहे हैं। यहां की देसी कली आधुनिक कृत्रिम रंगों की चकाचौंध के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है। कम बजट में बेहतर सफेदी देने वाला यह पारंपरिक विकल्प लंबे समय से लोगों के घरों की शोभा बढ़ाता आ रहा है। सस्ते बजट में बेहतरीन सफेदी और चमक बाजार में उपलब्ध आधुनिक डिस्टेंपर से घर की रंगाई करवाने पर परिवार के बजट पर भारी असर पड़ता है। इसके विपरीत, स्थानीय स्तर पर मिलने वाली कली बेहद किफायती दाम में दीवारों को नया और उजला रूप देने की सुविधा देती है। निवासियों के अनुसार, जब इसे दीवारों पर लगाया जाता है तो यह एक खास तरह की साफ सफेदी और नीले रंग की ताजगी भरी आभा बिखेरती है। इसी खूबी के चलते कई परिवार हर साल त्योहार के समय कृत्रिम पेंट के बजाय कली का ही चयन करते हैं। स्थानीय लोग इसमें हल्का नीला रंग और फेविकोल मिलाकर भी इस्तेमाल में लाते हैं। हालांकि, इसका टिकाऊपन और चमक इस बात पर निर्भर करती है कि दीवारों की सतह कैसी है और मिश्रण को किस प्रकार तैयार कर लगाया गया है। ग्रामीण इलाकों और प्राचीन हवेलियों में क्यों बनी है पहली पसंद पारंपरिक कली की पहुंच केवल शहरी सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीण अंचलों में कच्चे मकानों, मिट्टी की झोपड़ियों और बाहरी चारदीवारी की पुताई के लिए इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासतौर पर ऐतिहासिक बनावट वाले पुराने मकानों और हवेलियों में इसे आज भी सबसे मुफीद माना जाता है। कम लागत में घर को साफ-सुथरा और आकर्षक स्वरूप देने की यह विधि पीढ़ियों से आजमाई जा रही है। इसके साथ ही, स्थानीय लोग इसे स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिहाज से भी उपयोगी मानते हैं क्योंकि इससे घर में मक्खियों और मच्छरों का जमावड़ा कम होता है। रंग-रोगन के कारोबार से जुड़े गोवर्धन गुप्ता का कहना है कि कली के प्राकृतिक रासायनिक गुणों के कारण दीवारों पर पुताई होने के बाद मच्छर, मक्खी और अन्य कीड़ों का प्रकोप काफी घट जाता है। यही कारण है कि देहाती क्षेत्रों और पुरानी हवेलियों के निवासी आधुनिक विकल्पों की जगह कली को ही अपनी पहली प्राथमिकता मानते हैं। बाजार में लगातार बनी हुई है ग्राहकों की पूछपरख नये जमाने के प्लास्टिक पेंट के व्यापक प्रचार के बावजूद करौली के बाजारों में कली की खरीद में कोई कमी नहीं आई है। रंग व्यापारी राजू बंसल स्पष्ट करते हैं कि दीपोत्सव के समय हर वर्ष कली का कारोबार तेजी पकड़ता है। आज भी एक बड़ा ग्राहक वर्ग ऐसा है जो हर त्योहार पर नियमित रूप से कली खरीदने पहुंचता है, जिसमें पुरानी संपत्तियों के मालिक प्रमुख हैं। बंसल के अनुसार, बाजार में जहां डिस्टेंपर की एक बाल्टी पर लगभग 1,000 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं, वहीं कली के जरिए यही काम महज 250 रुपये के आसपास पूरा हो जाता है। इस बड़े आर्थिक अंतर के कारण यह आम परिवारों के लिए एक व्यावहारिक और पसंदीदा समाधान बनी हुई है। इसका आप पर असर त्योहारी सीजन में घर के नवीनीकरण का बजट नियंत्रित रखने वाले परिवारों के लिए यह पारंपरिक विकल्प एक बड़ा सहारा है। • भारत में: कम आय वाले और पारंपरिक शैली के घरों में रहने वाले लोग महंगे रसायनों के स्थान पर प्राकृतिक विकल्पों की उपयोगिता को समझ सकते हैं। इससे औद्योगिक पेंट पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करने का व्यावहारिक रास्ता मिलता है। • करौली में: स्थानीय निवासी महज 250 रुपये की मामूली लागत में अपने पूरे मकान की रंगाई पूरी कर सकते हैं। इसके इस्तेमाल से न सिर्फ दीवारों की चमक लौटती है, बल्कि घरों में मक्खी और मच्छरों का उपद्रव भी काफी हद तक घट जाता है। ऐसा क्यों हुआ करौली में आधुनिक इमल्शन और डिस्टेंपर के आगमन के बाद भी देसी कली का चलन इसलिए बरकरार है क्योंकि यह अत्यंत किफायती और व्यावहारिक लाभ प्रदान करती है। • सीधा कारण: व्यावसायिक डिस्टेंपर की एक बाल्टी जहां करीब 1,000 रुपये तक पड़ती है, वहीं कली का खर्च सिर्फ 250 रुपये आता है। यह भारी बचत सीमित बजट वाले परिवारों और बड़े परिसर के स्वामियों के लिए निर्णायक साबित होती है। • पारंपरिक अनुकूलता: क्षेत्र की प्राचीन हवेलियों और ग्रामीण मिट्टी के मकानों की दीवारों पर चूने और कली की पुताई बेहद प्रभावी बैठती है। स्थानीय लोग इसमें फेविकोल और हल्का नीला रंग मिलाकर इसकी चमक और पकड़ को बढ़ा लेते हैं। • कीट-नियंत्रण गुण: स्थानीय व्यापारियों के अनुसार कली में मौजूद रसायनिक गुण घर के भीतर मक्खी और मच्छरों को दूर रखने का स्वाभाविक सुरक्षा घेरा तैयार करते हैं। इस दोहरे लाभ के कारण हर साल दीपोत्सव पर इसकी मांग में बड़ा उछाल आता है। सवाल-जवाब 1. करौली में कली का उपयोग डिस्टेंपर से कितना सस्ता पड़ता है? डिस्टेंपर की एक बाल्टी पर जहां करीब 1,000 रुपये तक खर्च होते हैं, वहीं कली से वही काम लगभग 250 रुपये में हो जाता है। 2. कली की चमक और पकड़ बढ़ाने के लिए स्थानीय लोग क्या मिलाते हैं? करौली में बेहतर चमक और मजबूती के लिए कली के मिश्रण में हल्का नीला रंग और फेविकोल मिलाया जाता है। 3. ग्रामीण इलाकों और पुरानी हवेलियों में इसे क्यों ज्यादा पसंद किया जाता है? यह कम खर्च में दीवारों को सुंदर बनाती है और इसके रासायनिक गुणों के कारण घर में मक्खी-मच्छरों का प्रकोप कम रहता है। 4. कली का टिकाऊपन किन बातों पर निर्भर करता है? कली का टिकाऊपन और चमक दीवारों की मौजूदा स्थिति, मिश्रण तैयार करने के अनुपात और लगाने के तरीके पर निर्भर करती है। https://trendkia.com/rajasthan/tyohari-sijana-men-penta-ke-kharcha-se-rahata-dila-rahi-karauli-ki-parnparika-kali-sirpha-250-rupaye-men-divaron-para-aegi-nikhara-45492 TrendKia — Har trend, sabse pehle.