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  "title": "उदयपुर के शंभू निवास में गूंजे वैदिक मंत्र, मेवाड़ राजघराने ने शारदीय नवमी पर की तीन खास अश्वों की पूजा",
  "summary": "शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर उदयपुर में मेवाड़ राजपरिवार ने सदियों पुरानी सूर्यवंशी परंपरा निभाते हुए राजसी ठाठ-बाट के साथ अश्व पूजन अनुष्ठान पूरा किया।",
  "content": "राजस्थान की ऐतिहासिक धरा उदयपुर में शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर सदियों पुरानी राजसी परंपराएं आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही हैं। रियासतकालीन गौरव और शौर्य के प्रतीक मेवाड़ राजपरिवार ने महानवमी के मौके पर सूर्यवंशी मर्यादाओं का पालन करते हुए पारंपरिक अश्व पूजन संपन्न किया। राजमहल के शंभू निवास प्रांगण में आयोजित इस भव्य अनुष्ठान में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अश्वों की पूजा की गई। इस पावन अवसर पर महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने विधि-विधान से पूजा की बागडोर संभालते हुए पूर्वजों से चली आ रही इस विशिष्ट संस्कृति को आगे बढ़ाया।\n\nवैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधियों से हुआ अनुष्ठान\nअश्व पूजन के इस पावन आयोजन के लिए विशेष रूप से सजाए गए तीन चुनिंदा अश्वों को प्रांगण में लाया गया। इन अश्वों के नाम 'राजस्वरूप', 'राजमुकुट' और 'नागराज' हैं। राजसी परिधानों और आभूषणों से सज्जित होकर पहुंचे इन अश्वों का स्वागत वैदिक ऋचाओं के सस्वर पाठ के साथ किया गया। महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने शास्त्रों में वर्णित विधि के अनुसार एक-एक करके तीनों अश्वों के मस्तक पर कुंकुम का तिलक लगाया और अक्षत अर्पित किए। इसके उपरांत सुगंधित पुष्पमालाएं पहनाकर उनका वंदन किया गया।\n\nपूजा के अगले चरण में राजपरिवार के सदस्यों ने अश्वों की आरती उतारकर परिवार, राज्य और समाज की सुख-शांति व सुरक्षा की मंगलकामना की। पूजन संपन्न होने के बाद अश्वों को विशेष रूप से तैयार किया गया पौष्टिक आहार कराया गया और उन्हें नवीन वस्त्रादि भेंट किए गए। अनुष्ठान की संपूर्णता के प्रतीक स्वरूप अश्वों को नवरात्रि में बोई गई हरी ज्वारें धारण करवाई गईं। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उपस्थित लोगों को मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सनातन परंपरा के अनूठे संगम का जीवंत अनुभव हुआ।\n\nशौर्य, स्वामिभक्ति और युद्ध कौशल का प्रतीक\nमेवाड़ की ऐतिहासिक गाथाओं में अश्वों का स्थान केवल सामान्य सवारी या साधन तक सीमित कभी नहीं रहा। यहां के क्षत्रिय इतिहास में घोड़े को पराक्रम, रणकौशल और अटूट स्वामिभक्ति का सजीव स्वरूप माना गया है। हल्दीघाटी के ऐतिहासिक समर में महाराणा प्रताप और उनके निष्ठावान अश्व चेतक की वीरता की कहानियां आज भी जन-जन की जुबान पर हैं। मेवाड़ के वीर योद्धाओं ने हर संकट में अपने अश्वों को युद्ध का अभिन्न साथी माना है।\n\nइसीलिए शारदीय नवरात्रि की नवमी पर की जाने वाली यह पूजा केवल एक धार्मिक औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि यह उन मूक योद्धाओं के प्रति राजपरिवार की कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है जिन्होंने युद्धक्षेत्रों में अपने स्वामियों के प्राणों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह परंपरा आज की नई पीढ़ी को भी अपनी वीरगाथाओं और ऐतिहासिक जड़ों से जोड़े रखने का काम करती है।\n\nराजसी आभूषणों से अलंकृत हुए मारवाड़ी अश्व\nशंभू निवास प्रांगण में आयोजित इस उत्सव का मुख्य आकर्षण अश्वों का मनोहारी और वैभवशाली शृंगार रहा। पूजा के लिए लाए गए अश्वों को पारंपरिक राजस्थानी कलात्मकता के अनुरूप सजाया गया था। उनके गलों में विशेष कंठी पहनाई गई थी और कानों तथा माथे के पास चांदी के बारीक काम वाले छोगे झूल रहे थे। इसके अलावा उनके चेहरों को पारंपरिक मुखभूषणों और कलात्मक लगाम से सुशोभित किया गया था, जबकि उनके पार्श्व में चंवर डुलाए जा रहे थे।\n\nजब यह अनुष्ठान चल रहा था, तब प्रांगण में नगाड़ों की गूंज और शहनाई की मंगल ध्वनियों ने समूचे वातावरण को एक अलौकिक और राजसी रूप दे दिया। वाद्य यंत्रों की थाप और वैदिक मंत्रों की सम्मिलित ध्वनि ने वहां उपस्थित हर व्यक्ति को राजपूताना के स्वर्णिम युग की याद दिला दी। इस दौरान प्रत्येक अश्व की चाल-ढाल और भव्यता देखते ही बन रही थी।\n\n17वीं शताब्दी के ऐतिहासिक अस्तबल में संरक्षण\nमेवाड़ राजघराने का यह अनुष्ठान मात्र एक दिवसीय आयोजन नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक धरोहर और दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण का एक गहरा संकल्प भी जुड़ा हुआ है। सिटी पैलेस परिसर में स्थित सत्रहवीं सदी के ऐतिहासिक अस्तबल में आज भी मारवाड़ी नस्ल के उच्च कोटि के घोड़ों का विधिवत संवर्धन और संरक्षण किया जा रहा है।\n\nमारवाड़ी नस्ल के अश्व अपनी गठीली शारीरिक बनावट, सहनशीलता, तेज गति और अंदर की ओर विशेष रूप से मुड़े हुए कानों के लिए पूरी दुनिया में विख्यात हैं। राजपरिवार ने सदियों से इस अनूठी नस्ल की शुद्धता को बनाए रखने का जिम्मा उठाया है। सदियों पुराने अस्तबलों में आज भी इन अश्वों की देखरेख ठीक उसी राजसी विधि से की जाती है जैसे रियासतकाल में की जाती थी। यह निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि उदयपुर का राजपरिवार आधुनिकता के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान, जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान और पुरातात्विक परंपराओं को कितनी निष्ठा से संजोए हुए है।\n\nइसका आप पर असर\nयह पारंपरिक आयोजन भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्वदेशी नस्लों के संरक्षण के व्यावहारिक महत्व को दर्शाता है।\n\n• भारत में: यह अनुष्ठान देश भर के नागरिकों और शोधकर्ताओं को भारत की स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण और सम्मान के प्रति जागरूक करता है। ऐतिहासिक परंपराओं का ऐसा निरंतर पालन आधुनिक भारत में सांस्कृतिक पर्यटन और धरोहर संरक्षण के प्रयासों को संबल प्रदान करता है।\n• उदयपुर में: स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के लिए यह आयोजन मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास तथा सूर्यवंशी परंपराओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर उपलब्ध कराता है। इस तरह के आयोजनों से स्थानीय लोक कलाकारों, वादकों और पारंपरिक परिधान कारीगरों की कला को निरंतर प्रोत्साहन और सम्मान मिलता है।\n• अश्व प्रेमियों के लिए: शुद्ध मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों का यह प्रदर्शन पशुपालकों और हॉर्स ब्रीडर्स को स्वदेशी नस्ल संवर्धन के लिए प्रेरित करता है। 17वीं सदी के अस्तबल की कार्यप्रणाली को जानना पारम्परिक अश्व प्रबंधन की पुरानी विधियों को समझने में सहायता करता है।\n• सांस्कृतिक जागरूकता: युवा पीढ़ी के लिए यह कार्यक्रम यह संदेश देता है कि त्योहार केवल व्यक्तिगत उत्सव नहीं बल्कि प्रकृति और मूक प्राणियों के प्रति कृतज्ञता जताने का मंच भी हैं। यह ऐतिहासिक ज्ञान नई पीढ़ी को अपने गौरवमयी अतीत से जोड़े रखने में सहायक साबित होता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह आयोजन मेवाड़ राजपरिवार की सदियों पुरानी सूर्यवंशी परंपरा और क्षत्रिय मर्यादाओं की निरंतरता के तहत हर वर्ष शारदीय नवरात्रि की नवमी को आयोजित किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से राजपूत योद्धाओं के जीवन में अश्व केवल सवारी नहीं बल्कि युद्ध का महत्वपूर्ण साथी और स्वामिभक्ति का प्रतीक रहे हैं।\n\n• सूर्यवंशी परंपरा का निर्वहन: मेवाड़ राजवंश सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा का पालन करता है, जहां शक्ति उपासना के दौरान युद्ध में सहायक रहने वाले साधनों और अश्वों की वंदना अनिवार्य मानी गई है। नवरात्रि के नौ दिनों की देवी आराधना के बाद नवमी के दिन शस्त्र और अश्व पूजन की परंपरा शास्त्रों में भी वर्णित है।\n• महाराणा प्रताप और युद्धकालीन इतिहास: मेवाड़ के इतिहास में महाराणा प्रताप और चेतक का संबंध युद्धकौशल व निष्ठा का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। युद्धों में रक्षा करने वाले अश्वों के प्रति आभार व्यक्त करने की यह भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजपरिवार की संस्कृति का अटूट हिस्सा बनी रही है।\n• मारवाड़ी नस्ल के संवर्धन की प्रतिबद्धता: राजपरिवार द्वारा 17वीं शताब्दी से चलाए जा रहे ऐतिहासिक अस्तबल में मारवाड़ी नस्ल को आज भी संरक्षित किया जा रहा है। इस अनुष्ठान के जरिए न केवल नस्ल की शुद्धता को प्रदर्शित किया जाता है, बल्कि इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवंत भी रखा जाता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मेवाड़ राजपरिवार में अश्व पूजन का आयोजन कब और कहां किया गया?\nयह अनुष्ठान शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर उदयपुर स्थित राजमहल के शंभू निवास प्रांगण में संपन्न हुआ।\n\n2. इस वर्ष अश्व पूजन का धार्मिक अनुष्ठान किसने संपन्न कराया?\nसूर्यवंशी परंपरा का पालन करते हुए महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा संपन्न की।\n\n3. पूजा के लिए किन तीन विशेष अश्वों को लाया गया था?\nइस अवसर पर 'राजस्वरूप', 'राजमुकुट' और 'नागराज' नाम के तीन राजसी अश्वों को पूजन के लिए सजाकर लाया गया था।\n\n4. अश्वों का राजसी शृंगार किन आभूषणों से किया गया था?\nअश्वों को कंठी, चांदी के छोगों, पारंपरिक मुखभूषण, कलात्मक लगाम और चंवर से सुसज्जित किया गया था।\n\n5. मेवाड़ राजघराने के ऐतिहासिक अस्तबल में किस नस्ल के घोड़ों का संरक्षण होता है?\nसिटी पैलेस परिसर के 17वीं सदी के अस्तबल में मुड़े हुए कानों वाली दुर्लभ मारवाड़ी नस्ल के अश्वों का संरक्षण किया जाता है।",
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  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-20",
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