# उदयपुर की मां-बेटी ने हस्तशिल्प को दिया नया रूप, 18 देशों के मेले में छाया रंगौरी

> उदयपुर की गौरी पालीवाल और उनकी मां वंदना पालीवाल के हस्तशिल्प ब्रांड रंगौरी ने दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेले में खूब तारीफें बटोरीं, जहां 18 देशों के हुनरमंद मौजूद थे।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/udaipur-ki-man-beti-ne-hastashilpa-ko-diya-naya-rupa-18-deshon-ke-mele-men-chhaya-rangauri-36415 · **Language:** Hindi
**Tags:** रंगौरी हस्तशिल्प, उदयपुर, गौरी पालीवाल, वंदना पालीवाल, नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम, भारतीय हस्तकला, हस्तनिर्मित उत्पाद

मेवाड़ की ऐतिहासिक नगरी उदयपुर अपनी झीलों और भव्य महलों के अलावा समृद्ध हस्तकला के लिए भी मशहूर है। इसी परंपरा को आधुनिक दौर की पसंद से जोड़ते हुए शहर की एक मां और बेटी ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई दे रही है। गौरी पालीवाल ने अपनी माता वंदना पालीवाल के साथ मिलकर 'रंगौरी' नाम से एक शिल्प पहल की नींव रखी थी। हाल ही में नई दिल्ली स्थित नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम एवं हस्तकला अकादमी में सजे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस स्थानीय उद्यम ने अपनी खास छाप छोड़ी, जहां दुनिया भर के 18 मुल्कों के दस्तकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे।

## ऑनलाइन कोचिंग से उद्यम तक का सफर
इस रचनात्मक पहल की शुरुआत लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व हुई थी। उस दौरान गौरी ने अपनी मां वंदना के मार्गदर्शन और सहयोग से ऑनलाइन कोचिंग देने के साथ-साथ हाथों से तरह-तरह की वस्तुएं तैयार करना आरंभ किया था। धीरे-धीरे यह घरेलू प्रयास एक सुव्यवस्थित स्टार्टअप के रूप में विकसित हो गया। दोनों का मूल उद्देश्य सदियों पुरानी भारतीय दस्तकारी की विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे ऐसे समकालीन कलेवर में ढालना था, जो नई पीढ़ी के युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर सके। इसी दृष्टिकोण को आधार बनाकर रंगौरी के तहत पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक डिजाइनों का अनूठा मेल तैयार किया गया।

## क्रोशिया खिलौनों से लेकर कुंदन आभूषणों की चमक
राजधानी दिल्ली में आयोजित इस शिल्प समागम में रंगौरी की स्टॉल पर प्रदर्शित कई उत्पाद आगंतुकों के मुख्य आकर्षण बने रहे। इनमें सूती धागों से बुने क्रोशिया के प्यारे खिलौने, सजावटी फूल, बालों के खूबसूरत सामान और घर की सजावट की वस्तुएं प्रमुख रहीं। इसके अलावा पारंपरिक बंदनवार, दीवारों पर सजाए जाने वाले वॉल हैंगिंग, आसानी से बिछाई जाने वाली रेडीमेड रंगोलियां और मोतियों व कुंदन के बारीक काम से बने आभूषणों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। इन कलाकृतियों में पारंपरिक जरी, बारीक कढ़ाई, मोती और कुंदन को वर्तमान दौर के फैशनेबल पैटर्न के साथ ढाला गया है।

## रचनात्मक प्रक्रिया और गुणवत्ता पर जोर
अपनी कार्यप्रणाली के विषय में गौरी का कहना है कि किसी भी नए उत्पाद को आकार देने से पहले उसके मुख्य विचार, रंगों के संयोजन और डिजाइन पैटर्न पर बहुत बारीकी से योजना बनाई जाती है। डिजाइन तय होने के पश्चात उत्पाद की मजबूती, टिकाऊपन और अंतिम फिनिशिंग पर पूरा ध्यान केंद्रित किया जाता है। यही सावधानी उनके हाथों से बनी कलाकृतियों को पारंपरिक गरिमा के साथ-साथ एक प्रीमियम और आधुनिक स्वरूप प्रदान करती है, जिससे वे बाजार में बिल्कुल अलग नजर आती हैं।

## अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में मेवाड़ की कला का परचम
नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम एवं हस्तकला अकादमी के इस मेले में देश-विदेश के कई विशिष्ट उत्पाद एक छत के नीचे देखने को मिले। प्रदर्शनी में बिहार के सत्तू और मखाना, ओडिशा की कोरापुट कॉफी, राजस्थान की लाख की चूड़ियां व टेराकोटा कला के साथ कश्मीर की प्रसिद्ध पेपर-माशे कला शामिल थी। साथ ही बेलारूस, ईरान, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के शिल्पियों ने भी अपनी स्थानीय सांस्कृतिक कलाओं को पेश किया। इतने बड़े वैश्विक जमावड़े के बीच उदयपुर की इस मां-बेटी की जोड़ी ने मेवाड़ की समृद्ध विरासत को नए जमाने के अंदाज में पेश कर खूब सराहना अर्जित की। बेहद छोटे स्तर से शुरू हुआ यह सफर अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान कायम कर चुका है।

## इसका आप पर असर
यह पहल दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक कला में थोड़ा आधुनिक डिजाइन जोड़कर घरेलू स्तर पर सफल व्यापार खड़ा किया जा सकता है।

- **भारत में:** देश भर के कारीगरों और छोटे उद्यमियों के लिए यह उदाहरण साबित करता है कि पारंपरिक शिल्प को नई पीढ़ी की जरूरतों के अनुसार ढालकर वैश्विक मांग पैदा की जा सकती है। इससे घरेलू दस्तकारों को अपने स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंग और ब्रांडिंग नए नजरिए से करने की प्रेरणा मिलती है।
- **उदयपुर में:** स्थानीय निवासियों और युवाओं के लिए यह सफलता बताती है कि शहर सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का कुटीर उद्योग भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है। इससे क्षेत्र के अन्य कलाकारों को अपने पारंपरिक हुनर को व्यावसायिक रूप देने का प्रोत्साहन मिलेगा।
- **खरीदारों के लिए:** हस्तनिर्मित और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की तलाश करने वाले उपभोक्ताओं को घर की सजावट और उपहारों के लिए सुंदर विकल्प मिलते हैं। यह आधुनिक जीवनशैली में पारंपरिक भारतीय कला को सहजता से शामिल करने का अवसर देता है।
- **महिला उद्यमियों के लिए:** घर से काम शुरू करने वाली महिलाओं के लिए यह एक व्यावहारिक सीख है कि कम संसाधनों और मार्गदर्शन के साथ भी बड़ा उद्यम स्थापित किया जा सकता है। शुरुआती डेढ़ साल के भीतर सही दिशा में काम करके राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों तक पहुंचा जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह उपलब्धि एक सोची-समझी कार्ययोजना और पारंपरिक भारतीय शिल्प में आए डिजाइन बदलाव का नतीजा है, जिसने स्थानीय हस्तकला को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के अनुकूल बनाया।

- **पारंपरिक और आधुनिक सोच का मेल:** गौरी पालीवाल और उनकी मां वंदना ने यह भांप लिया था कि पारंपरिक कला को युवा वर्ग तभी अपनाएगा जब उसका रूप समकालीन होगा। उन्होंने क्रोशिया, कुंदन और जरी जैसी पुरानी विधाओं को आधुनिक हेयर एक्सेसरीज, होम डेकोर और रेडीमेड डिजाइनों के साथ मिलाकर बाजार की जरूरत पूरी की।
- **गुणवत्ता और थीम पर केंद्रित दृष्टिकोण:** उत्पादों के निर्माण से पहले थीम, रंगों के संयोजन और फिनिशिंग पर गहन काम किया गया, जिससे उत्पादों की मजबूती और आकर्षण बढ़ा। इसी उच्च गुणवत्ता के कारण उनके काम को नई दिल्ली के नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम में आयोजित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच पर जगह मिली।
- **घरेलू प्रयासों का क्रमिक विस्तार:** करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ ऑनलाइन कोचिंग और हस्तनिर्मित उत्पादों का छोटा सा काम लगातार प्रयोगों के जरिए एक औपचारिक स्टार्टअप में बदला। स्थानीय स्तर पर सफलता मिलने के बाद बड़े आयोजनों में भागीदारी ने उनके काम को 18 देशों के कारीगरों के बीच पहचान दिलाई।

## सवाल-जवाब

### 1. रंगौरी ब्रांड की शुरुआत किसने और कहां की?
इसकी शुरुआत राजस्थान के उदयपुर की रहने वाली गौरी पालीवाल ने अपनी मां वंदना पालीवाल के साथ मिलकर की थी।

### 2. रंगौरी को किस अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया गया?
इसे नई दिल्ली के नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम एवं हस्तकला अकादमी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया।

### 3. इस प्रदर्शनी में कितने देशों के कारीगर शामिल हुए थे?
इस आयोजन में भारत सहित कुल 18 देशों के कारीगरों और दस्तकारों ने हिस्सा लिया था।

### 4. रंगौरी के तहत किस तरह के उत्पाद तैयार किए जाते हैं?
यहां क्रोशिया के खिलौने, सजावटी फूल, हेयर एक्सेसरीज, होम डेकोर, बंदनवार, वॉल हैंगिंग, रेडीमेड रंगोलियां और कुंदन-मोती के आभूषण बनाए जाते हैं।

### 5. इस स्टार्टअप की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?
लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व गौरी ने अपनी मां के साथ मिलकर ऑनलाइन कोचिंग और हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार करके इस काम की शुरुआत की थी।

### 6. प्रदर्शनी में अन्य कौन से प्रमुख उत्पाद देखने को मिले?
मेले में बिहार के सत्तू-मखाना, ओडिशा की कोरापुट कॉफी, कश्मीर की पेपर-माशे कला और राजस्थान के टेराकोटा व लाख की चूड़ियां प्रदर्शित की गईं।

## प्रेरणा और सबक
उदयपुर की इस मां-बेटी की जोड़ी का सफर साबित करता है कि घरेलू स्तर पर शुरू किया गया रचनात्मक प्रयास भी वैश्विक पहचान हासिल कर सकता है।

- **पारंपरिक हुनर को आधुनिक रूप दें:** सदियों पुरानी कला को जस का तस रखने के बजाय वर्तमान पीढ़ी की पसंद और उपयोगिता के अनुरूप ढालना सफलता की कुंजी है।
- **शुरुआत छोटे स्तर से करें:** किसी बड़े उद्यम के लिए तुरंत भारी संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि छोटे घरेलू प्रयोगों और ऑनलाइन माध्यमों से भी मजबूत शुरुआत की जा सकती है।
- **गुणवत्ता और फिनिशिंग से समझौता न करें:** कलात्मक उत्पादों में केवल सजावट ही नहीं, बल्कि उनकी मजबूती, सही रंग संयोजन और फिनिशिंग ही उन्हें बाजार में विशिष्ट पहचान दिलाती है।
- **परिवार का सहयोग बड़ी ताकत:** मां के पारंपरिक अनुभव और बेटी के आधुनिक नजरिए का तालमेल किसी भी स्टार्टअप को तेजी से आगे ले जाने में मददगार साबित होता है।

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