उदयपुर में गजराज पर सवार मां महालक्ष्मी का अनूठा धाम, भीनमाल से लाई गई थी 31 इंच की प्रतिमा उदयपुर के भटियानी चौहट्टा में स्थित 450 साल पुराना महालक्ष्मी मंदिर अपनी दुर्लभ गजलक्ष्मी प्रतिमा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है. झीलों के शहर उदयपुर के भटियानी चौहट्टा क्षेत्र में स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर अपनी स्थापत्य कला और विशिष्ट स्वरूप के लिए विख्यात है. इस तीर्थ स्थल का इतिहास लगभग साढ़े चार सौ वर्षों की प्राचीन विरासत को समेटे हुए है. इस मंदिर की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यहां स्थापित देवी की पाषाण प्रतिमा है, जिसमें मां महालक्ष्मी पारंपरिक कमल पुष्प के बजाय गजराज यानी हाथी की पीठ पर विराजमान दिखाई देती हैं. सफेद पत्थर को तराश कर बनाई गई 31 इंच ऊंची यह दिव्य प्रतिमा दूर-दराज से आने वाले अनगिनत श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का मुख्य केंद्र है. महाराणा जगत सिंह के दौर में रानी की अभिलाषा पर हुआ था निर्माण इस पवित्र देवालय की स्थापना का संबंध मेवाड़ के इतिहास और राजघराने की भक्ति भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है. श्रीमाली जाति संपत्ति व्यवस्था ट्रस्ट के सदस्य हेमेन्द्र ने मंदिर के ऐतिहासिक संदर्भ की जानकारी साझा करते हुए बताया कि इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह के शासनकाल में संपन्न हुआ था. उस कालखंड में जब उदयपुर में भगवान जगदीश के विशाल मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था, तब तत्कालीन रानी ने अपनी एक विशेष धार्मिक इच्छा प्रकट की थी. उनका मानना था कि जब नारायण का भव्य मंदिर नगर में निर्मित हो रहा है, तो उसी गरिमा के अनुरूप मां महालक्ष्मी का स्वतंत्र देवालय भी अवश्य बनना चाहिए. रानी के इस पावन संकल्प का सम्मान करते हुए महाराणा जगत सिंह ने महालक्ष्मी मंदिर के निर्माण की आज्ञा दी. मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठापित करने के लिए मां भगवती की विशिष्ट मूर्ति राजस्थान के भीनमाल से विशेष रूप से मंगवाई गई थी. भीनमाल से लाई गई इस प्रतिमा को पूरे शास्त्रोक्त विधि-विधान, मंत्रोच्चार और अनुष्ठान के साथ गर्भगृह में प्राण-प्रतिष्ठित किया गया था, जिसके बाद से आज तक यहां नित्य पूजा-अर्चना की परंपरा निरंतर जारी है. कमल के बजाय हाथी पर विराजित गजलक्ष्मी स्वरूप का आध्यात्मिक महत्व धार्मिक और पौराणिक संदर्भों में मां लक्ष्मी के अधिकांश विग्रह कमल के आसन पर आसीन दिखाई पड़ते हैं, किंतु इस मंदिर में उनका गजराज पर आरूढ़ होना अत्यंत दुर्लभ और विलक्षण माना जाता है. सनातन परंपरा में देवी के इस पावन स्वरूप को गजलक्ष्मी के नाम से पूजा जाता है. भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में हाथी को अपार वैभव, शक्ति, ऐश्वर्य, गरिमा और कल्याणकारी शुभता का प्रतीक माना गया है. गजराज पर देवी का यह स्वरूप भक्तों के जीवन में संपन्नता और शक्ति के समन्वय का संदेश देता है. भौगोलिक और स्थापत्य दृष्टि से यह संपूर्ण मंदिर परिसर लगभग 4200 वर्ग फीट के विस्तृत भूभाग में फैला हुआ है. अपनी साढ़े चार सौ साल पुरानी स्थापत्य संरचना, विशाल प्रांगण और देवी के अद्वितीय स्वरूप के संयोजन ने इस देवालय को क्षेत्र के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में प्रतिष्ठित किया है. भक्तों की मनोकामना और उदयपुर की सांस्कृतिक पहचान चार शताब्दियों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी इस मंदिर के प्रति जनसाधारण की आस्था में तनिक भी कमी नहीं आई है. वर्षभर और विशेष रूप से दीपावली जैसे पावन पर्वों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां शीश नवाते हैं. दर्शनार्थी मां गजलक्ष्मी के समक्ष नतमस्तक होकर अपने परिवार के लिए सुख, शांति, समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली का वरदान मांगते हैं. यह ऐतिहासिक धरोहर उदयपुर की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को आज भी पूरी गरिमा के साथ जीवंत बनाए हुए है. इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक मंदिर का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है. • भारत में: देशभर से मेवाड़ और राजस्थान की यात्रा करने वाले श्रद्धालु इस 450 साल पुराने मंदिर में दुर्लभ गजलक्ष्मी प्रतिमा के दर्शन कर सकते हैं. यह धार्मिक पर्यटन और वास्तुकला में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए एक प्रमुख आध्यात्मिक गंतव्य पेश करता है. • उदयपुर में: स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं के लिए भटियानी चौहट्टा स्थित यह देवालय रोजमर्रा और पर्वों के दौरान सुख-समृद्धि की प्रार्थना का मुख्य केंद्र है. दीपावली और विशेष पूजा अवसरों पर क्षेत्र में दर्शन व्यवस्था और श्रद्धालुओं की आवाजाही को लेकर यह विशेष महत्व रखता है. • धार्मिक अध्ययन: मूर्तिशिल्प और कला के अध्येता यहां 31 इंच की श्वेत पाषाण प्रतिमा और 4200 वर्ग फीट के प्राचीन परिसर की विशिष्टताओं को प्रत्यक्ष देख सकते हैं. यह स्थल राजस्थान की मूर्तिकला परंपरा और भीनमाल के ऐतिहासिक शिल्पकला संबंधों को समझने में मदद करता है. • परंपरा संरक्षण: श्रीमाली जाति संपत्ति व्यवस्था ट्रस्ट के तत्वावधान में प्राचीन पूजा पद्धतियों का निरंतर संचालन स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर को अक्षुण्ण बनाए रखता है. यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपराओं को सहेजने का एक प्रामाणिक उदाहरण है. ऐसा क्यों हुआ इस मंदिर की स्थापना तत्कालीन मेवाड़ राजघराने की धार्मिक भावना और सामाजिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी. • निर्माण का मूल कारण: मंदिर का निर्माण महाराणा जगत सिंह के शासनकाल में हुआ था, जब तत्कालीन रानी ने भगवान जगदीश के मंदिर निर्माण के साथ-साथ मां लक्ष्मी के लिए भी एक समर्पित देवालय बनाने की इच्छा व्यक्त की थी. इस शाही संकल्प को साकार करने के लिए महाराणा ने इस मंदिर की स्थापना करवाई. • प्रतिमा का भीनमाल से आगमन: गर्भगृह के लिए विशिष्ट श्वेत पाषाण की 31 इंच ऊंची प्रतिमा राजस्थान के भीनमाल से लाई गई थी. भीनमाल से मूर्ति लाकर पूरे शास्त्रोक्त विधि-विधान के साथ उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की गई, जिससे मंदिर को विशेष धार्मिक मान्यता प्राप्त हुई. • गजराज स्वरूप का चयन: कमल के स्थान पर हाथी पर आरूढ़ गजलक्ष्मी स्वरूप का चयन शक्ति, वैभव और ऐश्वर्य के प्रतीक के रूप में किया गया था. यह स्वरूप सनातन परंपरा में समृद्धि और कल्याण का विशेष सूचक माना जाता है. सवाल-जवाब 1. उदयपुर का यह महालक्ष्मी मंदिर कितना पुराना है? यह मंदिर लगभग 450 साल पुराना है और इसका निर्माण मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह के शासनकाल में हुआ था. 2. मंदिर में विराजित मां महालक्ष्मी की प्रतिमा की क्या विशेषता है? यहां मां महालक्ष्मी कमल के बजाय गजराज यानी हाथी पर विराजित हैं, जिसे धार्मिक रूप से गजलक्ष्मी स्वरूप कहा जाता है. 3. गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का आकार और निर्माण सामग्री क्या है? यह प्रतिमा सफेद पत्थर से बनी है और इसकी ऊंचाई 31 इंच है. 4. माता की यह विशेष प्रतिमा कहां से लाई गई थी? इतिहास के अनुसार मां महालक्ष्मी की इस विशिष्ट प्रतिमा को भीनमाल से लाकर विधि-विधान से प्रतिष्ठापित किया गया था. 5. मंदिर का कुल क्षेत्रफल कितना है? यह ऐतिहासिक मंदिर परिसर लगभग 4200 वर्ग फीट के क्षेत्र में फैला हुआ है. 6. मंदिर की स्थापना के पीछे क्या ऐतिहासिक संदर्भ है? जब उदयपुर में भगवान जगदीश का भव्य मंदिर बन रहा था, तब रानी की इच्छा पर महाराणा जगत सिंह ने इस महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण कराया था. https://trendkia.com/rajasthan/udaipur-men-gajaraja-para-savara-man-mahalakshmi-ka-anutha-dhama-bhinmal-se-lai-gai-thi-31-incha-ki-pratima-54960 TrendKia — Har trend, sabse pehle.