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  "type": "article",
  "title": "मां के निधन के बाद जैकी श्रॉफ ने समझा जिंदगी का फलसफा, युवाओं को दी मोबाइल छोड़कर अपनों को देखने की सलाह",
  "summary": "बॉलीवुड अभिनेता जैकी श्रॉफ ने अपनी मां को खोने के दर्द को याद करते हुए युवाओं से डिजिटल दुनिया की चमक छोड़कर परिजनों के साथ वक्त बिताने की भावुक अपील की है।",
  "content": "जीवन में बड़ी उपलब्धियां और आलीशान मकान हासिल करने की धुन कई बार इंसान को उन रिश्तों से दूर कर देती है, जो असल में उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं। हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता जैकी श्रॉफ ने हालिया बातचीत में अपने जीवन के पुराने संघर्षों, तंगहाली के दौर और अपनी मां को खोने की दिल दहला देने वाली घटना को साझा किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भौतिक संपन्नता की दौड़ में जब घर बड़े होते हैं, तो अक्सर कमरों के साथ-साथ दिलों के बीच भी अलगाव की दीवारें खिंच जाती हैं। आधुनिक जीवनशैली में लगातार स्मार्टफोन और सोशल मीडिया में खोए रहने वाले युवाओं को आगाह करते हुए उन्होंने एक बेहद संजीदा संदेश दिया है कि वे आभासी दुनिया से बाहर निकलें और अपने परिजनों की आंखों में देखकर उनसे संवाद स्थापित करें।\n\nतंगहाली का बचपन और एक कमरे का अपनापन\nजैकी श्रॉफ का पारिवारिक इतिहास काफी संघर्षपूर्ण रहा है। उनका परिवार मूल रूप से तुर्कमेनिस्तान (तत्कालीन यूएसएसआर) से विस्थापित होकर मुंबई पहुंचा था। शुरुआती दिनों में उनके परिवार ने घोर आर्थिक तंगी झेली। मुंबई में वे जिस छोटे से मकान में रहते थे, वह इतना सीमित था कि उसका आकार आज के दौर के बड़े बंगलों के बाथरूम के बराबर रहा होगा। उस एकलौते कमरे में सुख-सुविधाओं का नितांत अभाव था, मगर वहां मानवीय संवेदनाएं और आत्मीयता भरपूर थीं।\n\nउस दौर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उस छोटे से कमरे में पूरा परिवार एक-दूसरे के बेहद करीब रहता था। रात को सोते समय एक तरफ उनकी मां होती थीं, दूसरी तरफ उनके पिता होते थे और वे खुद दोनों के बीच में सोते थे। उस जगह पर किसी तरह की निजी सीमाएं या दीवारें नहीं थीं। जगह की कमी के बावजूद उस एक कमरे में प्रेम, सुरक्षा और एक-दूसरे के प्रति परवाह की भावना बहुत गहरी थी, जिसे कोई भी दौलत खरीद नहीं सकती।\n\nसफलता की चाहत और बीच में खड़ी हुई दीवारें\nअन्य साधारण पृष्ठभूमि के नौजवानों की तरह जैकी श्रॉफ के मन में भी यह प्रबल अभिलाषा थी कि वे कड़ा परिश्रम करके खूब पैसा कमाएं ताकि अपने मां-बाप को हर संभव ऐशो-आराम और बेहतर जिंदगी मुहैया करा सकें। उन्होंने अभिनय जगत में अपनी पहचान बनाई, कड़ी मेहनत की बदौलत आर्थिक सफलता पाई और एक बड़ा आलीशान मकान खरीदा। मगर इस नई संपन्नता ने उनके पारिवारिक जीवन में एक ऐसा मोड़ ला दिया, जिसका अंदेशा उन्हें कभी नहीं था।\n\nबड़े घर में जाने के बाद हर सदस्य को अलग जगह मिल गई। जैकी श्रॉफ ने इस बदलाव को याद करते हुए भावुक स्वर में कहा, “मैंने सोचा था कि मां को पैसे कमा कर एक कमरा दूंगा और पापा को एक कमरा दूंगा। लेकिन जब बड़ा कमरा बनाया, तो उसके बीच में दीवार बन गई। एक रात उस दीवार के उस तरफ मेरी मां को हार्ट अटैक आ गया और हमें पता भी नहीं चला।” यह हादसा उनके लिए ऐसा आघात था जिसने उनकी पूरी सोच को हिलाकर रख दिया।\n\nअपनी मां के इस तरह अचानक चले जाने पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उन्होंने सवाल किया, “आया क्या, गया क्या? समझ ही नहीं आया कि मैंने क्या पाया? मैंने बड़े कमरे तो ले लिए, लेकिन बीच में दीवारें आ गईं और मैं अपनी मां को खो बैठा।” उनके मुताबिक दौलत और बड़े घरों का वह सुख बेमानी साबित हुआ, जिसने उन्हें उस वक्त अपनी मां के करीब रहने से रोक दिया जब उन्हें सबसे ज्यादा मदद की जरूरत थी।\n\nस्मार्टफोन की दुनिया छोड़ अपनों से जुड़ें युवा\nआज की पीढ़ी के तौर-तरीकों पर चिंता जताते हुए जैकी श्रॉफ ने कहा कि नौजवान अपना ज्यादातर वक्त मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट पर जाया कर रहे हैं। तकनीक की लत इतनी बढ़ गई है कि लोग एक ही घर में बैठकर भी एक-दूसरे से बेखबर रहते हैं। अभिनेता ने युवाओं को सीधी सलाह दी कि वे स्क्रीन में चेहरा छिपाने के बजाय अपने परिवार के लोगों के साथ आमने-सामने बैठकर बात करने की आदत डालें।\n\nउन्होंने कहा, “जितना समय आप मोबाइल को देखते हैं, उतना समय अपनों को देखिए। हम तकनीक में इतने आगे बढ़ गए हैं कि अपनों के आमने-सामने बैठकर बात करना ही भूल गए हैं।” उनका मानना है कि रिश्ते स्क्रीन पर भेजे गए संदेशों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत मौजूदगी और आत्मीय नजरों से मजबूत होते हैं।\n\nदिन में साठ सेकंड का नियम और वास्तविक मौजूदगी\nजैकी श्रॉफ ने युवाओं के सामने एक सरल मगर असरदार तरीका रखा। उन्होंने हर किसी से अपील की कि वे अपने व्यस्त दिनचर्या में से कम से कम साठ सेकंड (एक मिनट) का वक्त जरूर निकालें। इस एक मिनट में वे अपनी मां, पिता, बेटे या करीबी दोस्तों की आंखों में आंखें डालकर उन्हें गहराई से देखें और महसूस करें। जब आप किसी की आंखों में झांकते हैं, तो बिना कुछ कहे भी उसके दिल का हाल और उसकी भावनाएं समझ में आ जाती हैं।\n\nउन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे तकनीक या मोबाइल फोन के विरोधी नहीं हैं। वे स्वयं भी मोबाइल का उपयोग करते हैं, परंतु जब परिजनों के साथ होते हैं तो मोबाइल को किनारे रख देते हैं। जब वे अपने बेटे टाइगर श्रॉफ या अपने अन्य प्रियजनों से रूबरू होते हैं, तो पूरी तवज्जो उनके साथ संवाद पर होती है और वे सीधे आंखों में देखकर बात करते हैं।\n\nअपने विचार का सार समझाते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि जीवन में रुपया-पैसा, करियर और आलीशान आवास हासिल करना जरूरी हो सकता है, लेकिन परिवार की निकटता और उनके साथ बिताया गया समय सबसे अमूल्य धरोहर है। यदि सफलता पाने के चक्कर में इंसान अपने प्रियजनों से ही दूर हो जाए और उनके चले जाने के बाद पछतावे के सिवा कुछ न बचे, तो वह सारी संपत्ति व्यर्थ हो जाती है। इसलिए वर्चुअल दुनिया से दूरी बनाकर अपनों को गले लगाना और उनकी भावनाओं को समझना ही जीवन का सच्चा अर्थ है।\n\nइसका आप पर असर\nडिजिटल उपकरणों में लगातार व्यस्त रहने की आधुनिक जीवनशैली सीधे तौर पर व्यक्तिगत रिश्तों और मानसिक सुकून को प्रभावित करती है।\n\n• स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने की आदत परिवारों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ा रही है। हर दिन कम से कम कुछ समय बिना फोन के बिताने से घरेलू तनाव कम हो सकता है।\n• पारिवारिक संवाद में सुधार: आमने-सामने बैठकर बात करने की कमी से बुजुर्गों और बच्चों में अकेलेपन की भावना बढ़ रही है। दिन में केवल एक मिनट अपनों की आंखों में देखकर बात करने से आपसी समझ और सुरक्षा का भाव गहरा होता है।\n• स्वास्थ्य और आपातकालीन सजगता: बड़े घरों या अलग कमरों में रहने वाले बुजुर्ग परिजनों की नियमित देखभाल पर ध्यान देना जरूरी है। समय-समय पर उनकी स्थिति जांचने से किसी भी आपात स्वास्थ्य समस्या की तुरंत पहचान संभव हो पाती है।\n• जीवन प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन: केवल वित्तीय सफलता या बड़े मकानों की चाहत में अपनों से दूर होना बाद में मानसिक अफसोस का कारण बन सकता है। करियर की व्यस्तता के बीच प्रियजनों के लिए गुणवत्तापूर्ण समय निकालना जीवन संतुलन के लिए आवश्यक है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nजैकी श्रॉफ का यह भावुक संदेश उनके व्यक्तिगत जीवन के उस गहरे आघात से उपजा है, जब एक बड़े घर में अलग कमरा होने के कारण उनकी मां को आए दिल के दौरे का समय पर पता नहीं चल सका। इसके साथ ही आज की युवा पीढ़ी में बढ़ती डिजिटल निर्भरता ने उन्हें यह चेतावनी देने के लिए प्रेरित किया।\n\n• व्यक्तिगत नुकसान का अनुभव: अपनी मां की असामयिक मृत्यु के समय भौतिक दूरी और कमरों की दीवारों के कारण वे तुरंत उनकी मदद नहीं कर सके थे। इस घटना ने उन्हें यह अहसास कराया कि संपन्नता और बड़े मकान अपनों की निकटता के बिना व्यर्थ हैं।\n• युवाओं में स्क्रीन की लत: समकालीन समाज में युवाओं द्वारा स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को वास्तविक पारिवारिक संवाद से अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। आभासी दुनिया के प्रति यह अत्यधिक आकर्षण लोगों को बुनियादी मानवीय रिश्तों से दूर कर रहा है।\n• तकनीक और मानवीय संवेदनाओं का असंतुलन: आधुनिक संचार माध्यमों के विस्तार के बावजूद लोगों के बीच आमने-सामने का जुड़ाव और संवेदनाएं क्षीण हो रही हैं। इसी असंतुलन को पाटने के लिए उन्होंने अपनी निजी पीड़ा के जरिए समाज को यह संदेश दिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जैकी श्रॉफ का परिवार मूल रूप से कहां से आया था?\nजैकी श्रॉफ का परिवार तुर्कमेनिस्तान (तत्कालीन यूएसएसआर) से विस्थापित होकर मुंबई आया था।\n\n2. मुंबई में जैकी श्रॉफ के बचपन का घर कैसा था?\nवे मुंबई में एक बेहद छोटे कमरे में रहते थे, जिसका आकार आज के बड़े घरों के बाथरूम जितना था और वहां पूरा परिवार एक साथ रहता था।\n\n3. जैकी श्रॉफ की मां के निधन की क्या वजह थी?\nउनकी मां को रात में दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ा था और अलग कमरे की दीवार के उस पार होने की वजह से परिवार को समय पर पता नहीं चल सका।\n\n4. जैकी श्रॉफ ने युवाओं को मोबाइल को लेकर क्या सलाह दी है?\nउन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे मोबाइल में खोए रहने के बजाय परिवार के साथ समय बिताएं और अपनों की आंखों में देखकर बात करें।\n\n5. जैकी श्रॉफ ने दिन में कितने समय का नियम अपनाने को कहा है?\nउन्होंने दिन में कम से कम 60 सेकंड (एक मिनट) निकालकर मां, पिता, बेटे या दोस्तों की आंखों में ध्यान से देखने और समझने की सलाह दी है।\n\n6. क्या जैकी श्रॉफ खुद मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं?\nहां, वे स्वयं मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं, लेकिन परिजनों और बेटे टाइगर श्रॉफ से मिलते समय फोन छोड़कर सीधे आंखों में देखकर बात करते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nकठिन परिस्थितियों से निकलकर शीर्ष मुकाम तक पहुंचने और जीवन के कड़वे अनुभवों से सच्चाई स्वीकार करने की यह यात्रा व्यावहारिक जीवन के गहरे सबक देती है।\n\n• सादगी और संतोष का महत्व: संसाधनों की कमी के बावजूद एक छोटे कमरे में जो आत्मीयता और सुरक्षा थी, वह बड़े महलों में भी नहीं मिल सकी। खुशी वस्तुओं की संख्या में नहीं, बल्कि अपनों के साथ साझा किए गए पलों में होती है।\n• गलतियों और पछतावे से सीख: जीवन में सफलता और धन कमाने का उद्देश्य अपनों को सुख देना होना चाहिए, न कि उनसे अलग हो जाना। अपनी प्राथमिकताओं को समय रहते पहचानना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।\n• सचेत उपस्थिति का अभ्यास: व्यस्त जीवन में भी रोजाना कम से कम साठ सेकंड निकालकर परिजनों से सीधे आंखों में देखकर बात करना रिश्तों को नया जीवन देता है। वास्तविक संवाद हर रिश्ते की बुनियादी जरूरत है।",
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  "category": "रिश्ते",
  "publishedAt": "2026-09-29",
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