856 ईस्वी में रखी गई थी नींव: बरेली के श्री तपोनिधि पंचायती आनंद अखाड़े की 1200 साल पुरानी तप परंपरा की पूरी कहानी नाथ नगरी बरेली से जुड़ा श्री तपोनिधि पंचायती आनंद अखाड़ा करीब 1200 वर्ष पुराना है, जिसकी स्थापना 856 ईस्वी में बरार क्षेत्र में हुई थी और जो आदि शंकराचार्य की दशनामी परंपरा से जुड़ा शैव अखाड़ा है। संत परंपरा, प्राचीन मंदिरों और आध्यात्मिक धरोहर के लिए पूरे देश में पहचानी जाने वाली नाथ नगरी बरेली की कहानी जब लिखी जाती है, तो उसमें श्री तपोनिधि पंचायती आनंद अखाड़े का नाम खास तौर पर उभरकर आता है। सनातन धर्म के सबसे पुराने और सबसे अनुशासित अखाड़ों में गिने जाने वाले इस अखाड़े की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसका इतिहास करीब 1200 वर्ष पीछे तक जाता है। 856 ईस्वी और बरार से शुरू हुआ सफर दस्तावेजी मान्यता के अनुसार आनंद अखाड़े की स्थापना वर्ष 856 ईस्वी में बरार क्षेत्र में हुई थी। यह अखाड़ा आदि शंकराचार्य की दशनामी संन्यास परंपरा की कड़ी है और शैव संप्रदाय के प्रमुख अखाड़ों में शुमार किया जाता है। इससे जुड़े साधु मुख्य रूप से भगवान शिव की उपासना करते हैं, कठिन तपस्या को अपनी साधना का आधार मानते हैं और सनातन परंपराओं को सहेजने के काम में जुटे रहते हैं। बरेली क्यों बना इस अखाड़े का तप-केंद्र वरिष्ठ इतिहासकार डॉ राजेश कुमार शर्मा बताते हैं कि जिस शहर को नाथ नगरी कहा जाता है, वही आनंद अखाड़े की आध्यात्मिक हलचल का बड़ा ठिकाना रहा है। मान्यता है कि अखाड़े से जुड़े सिद्ध संतों और नागा साधुओं ने यहां सालों-साल तप किया। यही वजह है कि शहर के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद उनके आश्रम, मंदिर और समाधि स्थल आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। डॉ शर्मा के मुताबिक इस अखाड़े का नाता बरेली के मशहूर अलखनाथ मंदिर से भी जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि बाबा अलखिया ने इसी इलाके में कठोर तपस्या की थी और इसके बाद यह जगह अलखनाथ धाम के रूप में प्रसिद्ध हो गई। आज भी हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। शास्त्र और शस्त्र — दोनों में पारंगत नागा संन्यासी इतिहास गवाह है कि आनंद अखाड़े के नागा साधुओं की भूमिका सिर्फ आध्यात्मिक जीवन तक सीमित नहीं रही। धर्म और संस्कृति की रक्षा में भी उन्हें अहम माना गया है। नागा संन्यासी शास्त्र और शस्त्र दोनों में दक्ष समझे जाते हैं और सनातन परंपराओं को बचाए रखने के लिए खुद को समर्पित रखते आए हैं। आज भी जीवित है यह परंपरा मौजूदा दौर में आनंद अखाड़ा बरेली के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियां चला रहा है। रामपुर गार्डन स्थित आनंद आश्रम, सिविल लाइंस का हनुमान मंदिर, अलखनाथ मंदिर और दूसरे धार्मिक केंद्र इसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। अखाड़े में आज भी अनुशासन, तपस्या और साधना को सबसे ऊपर रखा जाता है। https://trendkia.com/religion/856-isvi-men-rakhi-gai-thi-ninva-bareli-ke-shri-taponidhi-pnchayati-annda-akhare-317 TrendKia — Har trend, sabse pehle.