# अंतिम संस्कार से पहले पार्थिव देह के कान और नाक में क्यों रखी जाती है रुई? जानिए आध्यात्मिक और जैविक दृष्टिकोण

> सनातन परंपरा में अंतिम संस्कार से पूर्व शव के नाक और कान में रुई रखने की प्रथा है। गरुड़ पुराण के आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ इस रीति के पीछे ठोस व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण भी जुड़े हैं।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-10-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/antima-snskara-se-pahale-parthiva-deha-ke-kana-aura-naka-men-kyon-rakhi-jati-hai-rui-janie-adhyatmika-aura-jaivika-drishtikona-42443 · **Language:** Hindi
**Tags:** गरुड़ पुराण, अंतिम संस्कार, सनातन परंपरा, धार्मिक मान्यताएं, शव संस्कार, मृत्यु के नियम

सनातन परंपरा के तहत किसी व्यक्ति के देहावसान के उपरांत अंतिम संस्कार से जुड़ी कई महत्वपूर्ण रीतियों का पालन किया जाता है। पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई देने से पहले विधि-विधान से स्नान कराने और अंतिम यात्रा हेतु तैयार करने के दौरान आपने अक्सर देखा होगा कि मृतक के कान और नाक में रुई लगाई जाती है। देखने में यह केवल एक सामान्य पारंपरिक नियम प्रतीत हो सकता है, लेकिन इस प्रथा के पीछे गहरे धार्मिक विश्वास और ठोस व्यावहारिक कारण दोनों ही निहित हैं। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में भले ही अंतिम संस्कार के तौर-तरीकों में सूक्ष्म भिन्नताएं पाई जाती हों, परंतु नाक और कान में रुई लगाने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित है।

## गरुड़ पुराण का दृष्टिकोण और आध्यात्मिक मान्यताएं
धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से गरुड़ पुराण में मृत्यु के पश्चात जीवात्मा की आगे की यात्रा तथा भौतिक देह की स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, जब प्राण देह छोड़ते हैं, तब भी जीवात्मा का अपने पूर्व शरीर के प्रति सूक्ष्म लगाव एकदम से समाप्त नहीं होता है। इसी कारणवश शरीर के खुले द्वारों को अवरुद्ध करने की प्रथा को आत्मा के भौतिक बंधनों से मुक्त होकर आगे बढ़ने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है। इसके अतिरिक्त, लोक मान्यताओं में यह भी माना जाता है कि देह के खाली और खुले मार्गों को ढक देने से पार्थिव शरीर किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रहता है, जिससे अंतिम यात्रा की शुचिता बनी रहती है।

## शारीरिक बदलाव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यदि इस परंपरा को आधुनिक विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से समझा जाए, तो इसके पीछे पूरी तरह जैविक कारण सामने आते हैं। मृत्यु घटित होने के तुरंत बाद शरीर की समस्त प्राकृतिक जैविक गतिविधियां और प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इसके कुछ समय बाद मांसपेशियों में कठोरता और आंतरिक बदलाव आने लगते हैं, जिसके साथ ही देह में प्राकृतिक अपघटन की प्रक्रिया का आरंभ हो जाता है। शरीर के भीतर पहले से उपस्थित सूक्ष्मजीव तेजी से सक्रिय होने लगते हैं, जो विघटन की गति को बढ़ाते हैं। इस जैविक स्थिति में देह के प्राकृतिक छिद्रों से विभिन्न प्रकार के तरल पदार्थों और स्राव के बाहर रिसने की प्रबल संभावना बन जाती है।

## स्वच्छता और सुरक्षा से जुड़े व्यावहारिक कारण
पार्थिव देह के नाक और कान में रुई लगाने का मुख्य व्यावहारिक उद्देश्य इसी स्वाभाविक रिसाव को रोकना और नियंत्रित करना होता है। यदि समय रहते इन संवेदनशील द्वारों को रुई से सुरक्षित न किया जाए, तो आंतरिक तरल पदार्थ रिसकर बाहर आ सकते हैं, जिससे अंतिम दर्शन के समय असहज स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके साथ ही, यह उपाय पार्थिव शरीर को बाहरी धूल, पर्यावरणीय गंदगी और सूक्ष्म कीटों के सीधे संपर्क में आने से बचाने में भी अत्यंत सहायक सिद्ध होता है। अंतिम यात्रा और मुखाग्नि से पहले तक शव को स्वच्छ, गरिमापूर्ण और सुरक्षित बनाए रखने के लिए यह तरीका बेहद कारगर है। यही कारण है कि यह सदियों पुरानी परंपरा आस्था के साथ-साथ व्यावहारिक उपयोगिता के चलते आज भी निभाई जा रही है।

## इसका आप पर असर
यह जानकारी अंतिम संस्कार की सदियों पुरानी प्रथा के पीछे छिपे वैज्ञानिक और व्यावहारिक तथ्यों को स्पष्ट करती है।

- **परंपरा की समझ:** अंतिम क्रिया के दौरान निभाई जाने वाली इस रीति के वैज्ञानिक और व्यावहारिक आधार को समझने में मदद मिलती है। इससे नई पीढ़ी अंधविश्वास के बजाय स्वच्छता और गरिमा से जुड़े कारणों को जान सकती है।
- **शारीरिक स्वच्छता का महत्व:** यह स्पष्ट होता है कि मृत्यु के उपरांत शरीर में होने वाले जैविक बदलावों के कारण सुरक्षात्मक कदम उठाना आवश्यक होता है। परिवार के सदस्य पार्थिव देह की स्वच्छता और शुचिता बनाए रखने के प्रति अधिक जागरूक रहते हैं।
- **अनावश्यक भ्रम से बचाव:** धार्मिक मान्यताओं और जैविक नियमों के संतुलन को समझकर लोग किसी भी तरह की भ्रांतियों से दूर रह सकते हैं। इससे अंतिम समय में शोक संतप्त परिवार के लिए रीति-रिवाजों का पालन करना अधिक सहज हो जाता है।
- **गरिमापूर्ण अंतिम विदाई:** देह से तरल पदार्थों के रिसाव और कीटों से सुरक्षा सुनिश्चित होने से मृतक को सम्मानजनक विदाई दी जा सकती है। इससे अंतिम दर्शन के दौरान उपस्थित सभी लोगों के लिए वातावरण स्वच्छ बना रहता है।

## ऐसा क्यों हुआ
अंतिम संस्कार से पूर्व पार्थिव शरीर के नाक और कान में रुई लगाने की परंपरा दो प्रमुख कारणों, यानी गरुड़ पुराण में वर्णित आध्यात्मिक मान्यताओं और मृत्यु के बाद होने वाले शारीरिक परिवर्तनों के कारण प्रचलित हुई है।

- **धार्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि:** गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के उपरांत भी जीवात्मा का भौतिक शरीर से मोह एकदम समाप्त नहीं होता है। खुले द्वारों को बंद करना आत्मा को आगे की यात्रा के लिए प्रेरित करने और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करने का माध्यम माना गया है।
- **जैविक अपघटन की प्रक्रिया:** मृत्यु के बाद शरीर की जैविक क्रियाएं रुक जाती हैं और सूक्ष्मजीव सक्रिय होकर अपघटन की गति तेज कर देते हैं। इस प्रक्रिया में शरीर के प्राकृतिक छिद्रों से आंतरिक तरल पदार्थ बाहर आने का जोखिम रहता है।
- **स्वच्छता और कीटों से सुरक्षा:** खुले वातावरण में पार्थिव देह को रखने पर धूल और सूक्ष्म कीटों के प्रवेश की संभावना रहती है। रुई लगाकर इन प्राकृतिक मार्गों को बंद करने से देह स्वच्छ और सुरक्षित बनी रहती है।

## सवाल-जवाब

### 1. अंतिम संस्कार से पहले मृतक के नाक और कान में रुई क्यों लगाई जाती है?
यह प्रथा धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ शरीर से प्राकृतिक तरल पदार्थों के रिसाव को रोकने और कीटों व गंदगी से बचाने के लिए अपनाई जाती है।

### 2. गरुड़ पुराण में इस प्रथा को लेकर क्या मान्यता बताई गई है?
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के तुरंत बाद जीवात्मा का शरीर से मोह समाप्त नहीं होता, इसलिए खुले द्वारों को बंद करना आत्मा की आगे की यात्रा और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा से जुड़ा माना जाता है।

### 3. मृत्यु के बाद शरीर में कौन से वैज्ञानिक बदलाव होते हैं?
मृत्यु के बाद जैविक क्रियाएं बंद हो जाती हैं और सूक्ष्मजीव सक्रिय होकर अपघटन शुरू कर देते हैं, जिससे प्राकृतिक छिद्रों से तरल पदार्थ रिसने की संभावना बढ़ जाती है।

### 4. क्या रुई लगाने की प्रथा सभी क्षेत्रों में एक जैसी होती है?
अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपराओं में विभिन्न क्षेत्रों के आधार पर थोड़े बदलाव हो सकते हैं, लेकिन नाक और कान में रुई लगाना व्यापक रूप से प्रचलित है।

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