बेलूर मठ में महाषष्ठी से शुरू हुई दुर्गा पूजा, 125 साल पुरानी परंपरा में नहीं होती पशु बलि पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले स्थित बेलूर मठ में शुक्रवार को महाषष्ठी के साथ दुर्गा पूजा के अनुष्ठानों की भव्य शुरुआत हो गई है। स्वामी विवेकानंद द्वारा 125 साल पहले शुरू की गई इस ऐतिहासिक परंपरा में पशु बलि की जगह फल और सब्जियों की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में स्थित प्रतिष्ठित बेलूर मठ में शुक्रवार सुबह महाषष्ठी के पावन अवसर पर दुर्गा पूजा 2026 के अनुष्ठानों का भव्य शुभारंभ हुआ। यह प्रतिष्ठित आयोजन रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय में पूरे विधि-विधान से संपन्न किया जा रहा है, जिसकी स्थापना स्वामी विवेकानंद ने की थी। यहां होने वाले अनुष्ठान पारंपरिक भक्ति, प्राचीन शास्त्रीय विधानों और उन ऐतिहासिक परंपराओं का अनूठा संगम हैं, जिन्हें स्वामीजी ने खुद गढ़ा था। अपने कई लेखों में स्वामी विवेकानंद ने इस आध्यात्मिक संस्थान को एक ऐसे केंद्र के रूप में परिभाषित किया था, जिसकी निष्कलंक किरणें संपूर्ण विश्व को आलोकित करने के साथ-साथ मानव जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती हैं। कप्लारंभ और कलश स्थापना के साथ शुरुआत शुक्रवार तड़के मठ के संन्यासियों की गरिमामयी उपस्थिति और सहभागिता के बीच पूजा-विधि की औपचारिक शुरुआत की गई। सबसे पहले कप्लारंभ अनुष्ठान संपन्न किया गया, जिसे दुर्गा पूजा के मुख्य पर्व की औपचारिक शुरुआत का मुख्य प्रतीक माना जाता है। इस पवित्र अनुष्ठान के दौरान कलश की स्थापना की जाती है, जो मां दुर्गा की दिव्य और साक्षात उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। मुख्य पूजा शुरू होने से ठीक पहले देवी का आह्वान करने और उनकी पावन उपस्थिति का गर्मजोशी से स्वागत करने के उद्देश्य से ही इस विशिष्ट विधि को पूरा किया जाता है। बोधन और संध्याकालीन अनुष्ठान बेलूर मठ में वर्षों से चली आ रही सनातन परंपरा के अनुसार शुक्रवार शाम को बोधन सहित कई अन्य प्रमुख अनुष्ठान संपन्न किए जाएंगे। बोधन को मुख्य रूप से देवी दुर्गा के जागरण और उनके विधिवत आह्वान की महत्वपूर्ण रस्म माना जाता है, जिसका शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के उत्सव में अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व है। इस अवसर पर श्री रामकृष्ण परमहंस, उनकी दिव्य पत्नी और आध्यात्मिक संगिनी शारदा देवी तथा स्वामी विवेकानंद की सुसज्जित प्रतिमाओं पर श्रद्धापूर्वक फूल अर्पित किए गए। इन अलौकिक उत्सवों और अनुष्ठानों की शुरुआत के अद्भुत क्षणों को अपनी आंखों से देखने के लिए पावन गंगा के तट पर स्थित बेलूर मठ के प्रांगण में देश-विदेश से आए हजारों भक्त और अनुयायी एकत्र हुए हैं। मानवता और लोक कल्याण का संदेश बेलूर मठ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस अवसर पर जानकारी देते हुए बताया कि मठ में होने वाली दुर्गा पूजा, जिसकी नींव स्वामीजी ने श्री ठाकुर रामकृष्ण की पावन विचारधारा को केंद्र में रखकर रखी थी, आज भी उसी अटूट पवित्रता और निष्ठा के साथ मनाई जाती है। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य हर व्यक्ति को देवी दुर्गा को अपने हृदय में स्थापित करने का मार्ग दिखाना है। हम सब मिलकर देवी दुर्गा से यही प्रार्थना करते हैं कि वे संपूर्ण संसार का कल्याण करें और हर मनुष्य के हृदय में छिपी हुई समस्त आसुरी प्रवृत्तियों का अंत करें। 125 साल पुरानी अनूठी परंपरा और प्रसाद स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1901 में बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की इस गौरवशाली परंपरा की शुरुआत की थी, जिसके चलते वर्ष 2026 के ये आयोजन इस महान परंपरा की शुरुआत की 125वीं वर्षगांठ का प्रतीक बन गए हैं। यह पूजा अन्य कई स्थानों से बेहद अलग और खास है, क्योंकि यहां किसी भी प्रकार की पशु बलि देने की प्रथा नहीं है। चूंकि शारदा देवी पशु बलि की प्राचीन प्रथा के पूरी तरह खिलाफ थीं, इसलिए स्वामीजी ने इस पावन त्योहार के दौरान जीव हत्या रोकने के लिए प्रतीकात्मक बलि के रूप में फल और सब्जियों को अर्पित करने की अनूठी परंपरा डाली। स्वामी विवेकानंद द्वारा शुरू की गई इस समावेशी पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जाति, धर्म या पंथ के भेदभाव से ऊपर उठकर समाज के सभी वर्गों के लोग एक पंक्ति में एक साथ बैठते हैं और सभी को एक समान रूप से प्रसाद के रूप में स्वादिष्ट खिचड़ी परोसी जाती है। इसका आप पर असर यह उत्सव पश्चिम बंगाल और देश भर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व रखता है। • पश्चिम बंगाल में: हावड़ा और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय भक्तों को मठ में आयोजित होने वाले सभी पारंपरिक अनुष्ठानों और दर्शन का सीधा लाभ मिलता है। भारी भीड़ के कारण स्थानीय परिवहन और यातायात व्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। • भारत भर के लिए: देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले अनुयायी और पर्यटक इस ऐतिहासिक 125वीं वर्षगांठ के आयोजनों में शामिल हो रहे हैं। यह पर्व सभी जातियों और धर्मों के लोगों को एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करने का सांस्कृतिक संदेश देता है। ऐसा क्यों हुआ बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत ऐतिहासिक और आध्यात्मिक सुधारों के तहत की गई थी। • स्वामी विवेकानंद की पहल: स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1901 में श्री ठाकुर रामकृष्ण की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए इस उत्सव की शुरुआत की थी। • शारदा देवी का दृष्टिकोण: शारदा देवी पशु बलि की प्रथा के सख्त खिलाफ थीं, जिसके कारण स्वामीजी ने पारंपरिक बलि की जगह फल और सब्जियों की प्रतीकात्मक बलि की परंपरा शुरू की। • समानता का संदेश: इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य जाति, धर्म और पंथ के बंधनों को तोड़कर समाज के सभी वर्गों को एक साथ जोड़ना है। सवाल-जवाब 1. बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत किसने की थी? स्वामी विवेकानंद ने 1901 में बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। 2. 2026 में यह उत्सव कौन सी वर्षगांठ मना रहा है? 2026 में होने वाले आयोजन इस परंपरा की शुरुआत की 125वीं वर्षगांठ हैं। 3. बेलूर मठ की पूजा में पशु बलि क्यों नहीं दी जाती है? शारदा देवी पशु बलि की प्रथा के खिलाफ थीं, इसलिए स्वामीजी ने फल और सब्जियों की प्रतीकात्मक बलि की परंपरा शुरू की। 4. महाषष्ठी पर पहला प्रमुख अनुष्ठान कौन सा होता है? सबसे पहला अनुष्ठान कप्लारंभ संपन्न किया जाता है, जिसमें कलश की स्थापना की जाती है। 5. प्रसाद के रूप में क्या परोसा जाता है? इस पूजा के दौरान सभी को प्रसाद के रूप में खिचड़ी परोसी जाती है। https://trendkia.com/religion/belur-math-me-mahashashti-se-shuru-hui-durga-puja-48683 TrendKia — Har trend, sabse pehle.