# भाद्रपद पूर्णिमा 2026: पितृ पक्ष से पहले ऋषि-मुनियों का तर्पण क्यों है जरूरी, जानें अगस्त्य ऋषि से जुड़ी पौराणिक कथा

> सनातन परंपरा में पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से मानी जाती है, जिसमें पूर्वजों के तर्पण से पहले महर्षि अगस्त्य और अन्य सप्तर्षियों का स्मरण व पूजन किया जाता है।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-09-26 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/bhadrapada-purnima-2026-pitri-paksha-se-pahale-rishi-muniyon-ka-tarpana-kyon-hai-jaruri-janen-agastya-rishi-se-juri-pauranika-kath-38937 · **Language:** Hindi
**Tags:** भाद्रपद पूर्णिमा 2026, ऋषि तर्पण, पितृ पक्ष, अगस्त्य ऋषि, श्राद्ध तिथियां, ब्रह्मपुराण, महाभारत

सनातन परंपरा में पितृ पक्ष का विशेष स्थान है और भाद्रपद पूर्णिमा के पावन अवसर के साथ ही श्राद्ध अनुष्ठानों की शुरुआत हो जाती है। कुल सोलह दिनों तक चलने वाले इस कालखंड में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं, ताकि पूरे परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में तर्पण करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितृ दोष के दुष्प्रभावों से छुटकारा मिलता है। लेकिन बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि पितरों का अर्चन करने से पहले कुछ महान ऋषियों और मुनियों का तर्पण करना अनिवार्य होता है। श्राद्ध कर्म की शुरुआत सीधे तौर पर केवल पितरों से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऋषियों के स्मरण से होती है।

## पूर्णिमा पर ऋषि-मुनियों के तर्पण की प्राचीन परंपरा
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन पितरों से पहले ऋषि-मुनियों का तर्पण करने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जिसका सीधा संबंध महर्षि अगस्त्य के जीवन से जुड़ा हुआ है। इस विशेष दिन पर उन सभी महान ऋषियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की जाती है जिन्होंने समाज को ज्ञान, सभ्यता और धर्म का सही मार्ग दिखाया। यह परंपरा वर्तमान पीढ़ी को अपने आध्यात्मिक पूर्वजों के महान योगदान की याद दिलाती है और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का बड़ा अवसर प्रदान करती है। इस अनूठे तर्पण के पीछे की पौराणिक कथा और महर्षि अगस्त्य की भूमिका को विस्तार से समझना आवश्यक है।

## शास्त्रों में वर्णित पूर्वजों से पहले ऋषियों का पूजन
ब्रह्मपुराण के अध्ययन से ज्ञात होता है कि मनुष्य को किसी भी देवता की वंदना करने से पहले अपने पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए और पूर्वजों के भी पहले आदरणीय ऋषियों का ध्यान करना चाहिए। जिस प्रकार हर शुभ और मांगलिक कार्य की शुरुआत भगवान गणेश के पूजन से होती है, ठीक उसी प्रकार पितृ पक्ष के तर्पण का शुभारंभ भाद्रपद पूर्णिमा के दिन अगस्त्य ऋषि के पूजन और तर्पण के साथ किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पावन तिथि पर ऋषि अगस्त्य के नाम से तर्पण संपन्न करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और वे पूरे वर्ष भर जल की प्राप्ति के लिए भटकते नहीं हैं।

## आतापी और वातापी असुरों का अंत
इस परंपरा से जुड़ी एक बहुत ही रोचक कथा महाभारत के वन पर्व में विस्तार से मिलती है। प्राचीन काल में आतापी और वातापी नाम के दो अत्यंत क्रूर और मायावी असुर भाई हुआ करते थे। आतापी के पास एक खास जादुई शक्ति थी जिसके बल पर वह किसी भी मृत प्राणी को आवाज देकर जीवित कर सकता था, जबकि वातापी किसी भी जीव या वस्तु का रूप धारण करने में सक्षम था। इन दोनों भाइयों ने ऋषि-मुनियों को समाप्त करने का एक बेहद भयानक षड्यंत्र रचा था। वातापी बकरे या किसी अन्य खाद्य पदार्थ का रूप धारण कर लेता और आतापी किसी भी ऋषि को अपने यहां भोजन के लिए आमंत्रित करता था। जैसे ही ऋषि वह भोजन ग्रहण कर लेते, आतापी अपने भाई वातापी को जोर से आवाज लगाता था।

## महर्षि अगस्त्य का हस्तक्षेप और वध
आतापी की पुकार सुनते ही वातापी संबंधित ऋषि का पेट चीरकर जीवित बाहर आ जाता था और फिर दोनों असुर मिलकर उस मृत ऋषि को अपना भोजन बना लेते थे। इस कुटिल तरीके से उन्होंने सैकड़ों की संख्या में निरीह ऋषि-मुनियों की हत्या कर डाली थी। इन घटनाओं से त्रस्त होकर सभी ऋषि-मुनि अपनी समस्या लेकर महर्षि अगस्त्य के पास सहायता मांगने पहुंचे। अगस्त्य मुनि अपनी असीम तपस्या और अलौकिक बुद्धिमत्ता के लिए पूरे संसार में विख्यात थे। एक दिन वे स्वयं उन दोनों असुरों के पास पहुंच गए। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार आतापी ने वातापी को काटकर कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए और उन्हें महर्षि अगस्त्य को परोस दिया। मुनि ने वह सारा भोजन बिना किसी संकोच के ग्रहण कर लिया।

भोजन समाप्त होने के पश्चात आतापी ने अपने भाई वातापी को हमेशा की तरह आवाज लगानी शुरू कर दी, लेकिन उस दिन स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। महर्षि अगस्त्य ने तुरंत एक अंजुली जल को अपने मंत्रों से अभिमंत्रित किया और उसे पीते हुए कहा कि जिसे तुम आवाज दे रहे हो, वह अब कभी बाहर नहीं आ पाएगा क्योंकि मैंने उसे पूरी तरह पचा लिया है। मुनि के इन वचनों को सुनते ही आतापी बुरी तरह डर गया और अत्यधिक क्रोध में आकर उन पर हमला करने के लिए दौड़ा, लेकिन महर्षि अगस्त्य ने अपने तीव्र तपोबल से उसे वहीं तत्काल भस्म कर दिया। वह ऐतिहासिक दिन भाद्रपद पूर्णिमा का था।

## महान ऋषियों के स्मरण से होती है ऋण मुक्ति
दोनों असुरों के अंत के बाद से ही पितृ पक्ष के प्रथम दिन महर्षि अगस्त्य और उनकी धर्मपत्नी लोपामुद्रा के नाम से तर्पण अर्पित करने की स्वस्थ परंपरा का श्रीगणेश हुआ। अगस्त्य मुनि के अतिरिक्त पितृ पक्ष के दौरान कई अन्य महान ऋषियों का भी विधिवत तर्पण किया जाता है। इन प्रतिष्ठित ऋषियों में सप्तर्षि, वेदों की व्याख्या करने वाले और धार्मिक शिक्षा के प्रसारक ऋषि वशिष्ठ, भगवान परशुराम के पिता तथा धर्म के प्रचारक ऋषि जमदग्नि के अलावा ऋषि विश्वामित्र, ऋषि भारद्वाज, ऋषि गौतम और ऋषि कश्यप जैसे महान नाम शामिल हैं। वैदिक शास्त्रों के अनुसार, इन सभी ऋषियों ने मानव सभ्यता को ज्ञान, धर्म और संस्कृति से समृद्ध किया है, इसलिए इन्हें देवताओं के समान ही पूजनीय माना जाता है।

## वर्ष 2026 में पितृपक्ष की तिथियां
इन महान ऋषियों का तर्पण संपन्न करके हम अपने ऊपर चढ़े ऋषि ऋण से पूरी तरह मुक्त होते हैं और इसके बाद ही हमारे पितरों तक हमारा तर्पण बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक पहुंच पाता है। ऋषियों के आशीर्वाद के बिना किसी भी जातक का पितृ तर्पण अधूरा ही माना जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन ऋषि तर्पण के साथ ही पितृ पक्ष का शुभारंभ हो जाता है, परंतु पितृ पक्ष का आधिकारिक पहला श्राद्ध आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि को संपन्न किया जाता है। यह पूरा पखवाड़ा हमेशा आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या तक चलता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर दिन रविवार से होने जा रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर दिन शनिवार को होगा। इस दौरान 26 सितंबर को शनिवार के दिन पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा, 27 सितंबर को रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध होगा, 28 सितंबर को सोमवार के दिन द्वितीया श्राद्ध मनाया जाएगा, 29 सितंबर को मंगलवार के दिन तृतीया श्राद्ध और महाभरणी का योग रहेगा, 30 सितंबर को बुधवार के दिन चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध एक साथ आएंगे, 1 अक्टूबर को गुरुवार के दिन षष्ठी श्राद्ध होगा, 2 अक्टूबर को शुक्रवार के दिन सप्तमी श्राद्ध मनाया जाएगा, 3 अक्टूबर को शनिवार के दिन अष्टमी श्राद्ध होगा, 4 अक्टूबर को रविवार के दिन नवमी श्राद्ध किया जाएगा, 5 अक्टूबर को सोमवार के दिन दशमी श्राद्ध होगा, 6 अक्टूबर को मंगलवार के दिन एकादशी श्राद्ध आएगा, 7 अक्टूबर को बुधवार के दिन द्वादशी और मघा श्राद्ध दोनों संपन्न होंगे, 8 अक्टूबर को गुरुवार के दिन त्रयोदशी श्राद्ध होगा, 9 अक्टूबर को शुक्रवार के दिन चतुर्दशी श्राद्ध मनाया जाएगा और अंत में 10 अक्टूबर को शनिवार के दिन सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस पूरे अनुष्ठान का समापन होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
भाद्रपद पूर्णिमा पर पितरों से पहले ऋषियों के तर्पण की परंपरा सनातन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार निर्धारित की गई है। यह अनुष्ठान धार्मिक और आध्यात्मिक ऋणों से मुक्ति पाने के लिए आवश्यक माना जाता है।

- **पौराणिक महत्व:** ब्रह्मपुराण के निर्देशों के अनुसार देवताओं और पूर्वजों से पहले ऋषियों का स्मरण करना अनिवार्य माना गया है ताकि तर्पण निर्बाध रूप से संपन्न हो सके।
- **महर्षि अगस्त्य का प्रसंग:** महाभारत के वन पर्व में वर्णित कथा के अनुसार अगस्त्य मुनि द्वारा असुरों आतापी और वातापी का वध भाद्रपद पूर्णिमा के दिन किया गया था।
- **ऋषि ऋण मुक्ति:** मानव जाति को ज्ञान और संस्कृति प्रदान करने वाले सप्तर्षियों और अन्य महान ऋषियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए इस अनुष्ठान का विधान है।

## सवाल-जवाब

### 1. भाद्रपद पूर्णिमा 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत कब से हो रही है?
वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 27 सितंबर दिन रविवार से हो रही है।

### 2. पितरों से पहले ऋषि-मुनियों का तर्पण क्यों किया जाता है?
ब्रह्मपुराण के अनुसार पूर्वजों से पहले ऋषियों का स्मरण करने से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है और पितृ तर्पण बिना किसी बाधा के संपन्न होता है।

### 3. महर्षि अगस्त्य से जुड़ी कौन सी पौराणिक कथा प्रसिद्ध है?
महर्षि अगस्त्य ने क्रूर असुर भाइयों आतापी और वातापी में से वातापी को अपने पेट में पचाकर उनका वध किया था, जिसकी तिथि भाद्रपद पूर्णिमा थी।

### 4. वर्ष 2026 में पितृपक्ष का समापन किस तिथि को होगा?
वर्ष 2026 में पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर दिन शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।

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