भगवान शिव को क्यों लेना पड़ा था किरात का रूप? जानिए अर्जुन और किरातेश्वर महादेव की पौराणिक कथा महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन ने दिव्य अस्त्र पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिसकी परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने शिकारी का रूप धारण किया था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने एक बार एक वनवासी शिकारी का रूप धारण कर पांडव राजकुमार अर्जुन के साथ युद्ध किया था। यह प्रसंग महाभारत के महायुद्ध से पहले का है, जब अर्जुन दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति के लिए अत्यंत कठिन तपस्या में लीन थे। भगवान से श्रेष्ठ अस्त्र हासिल करने के लिए अर्जुन को महादेव की एक कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा था, जिसके तहत स्वयं शिवजी ने अपने परम भक्त के साथ युद्ध किया था। किरात यानी शिकारी का वेश धरने के कारण ही महादेव को किरातेश्वर के रूप में जाना गया। युद्ध में विजय के लिए अर्जुन की तपस्या महाभारत के भीषण युद्ध में कौरवों पर विजय हासिल करने के लिए वरिष्ठजनों और मार्गदर्शकों ने अर्जुन को अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने की सलाह दी थी। इसके बाद अर्जुन ने इंद्रकील पर्वत का रुख किया और वहां भगवान शिव की कठोर साधना में जुट गए। अर्जुन का मुख्य लक्ष्य महादेव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करना था। यह एक ऐसा अद्भुत अस्त्र था जिसे मन, वाणी और धनुष तीनों माध्यमों से चलाया जा सकता था और इसकी सहायता से रणक्षेत्र में शत्रुओं को आसानी से पराजित किया जा सकता था। अर्जुन की इस अटूट और घोर तपस्या को देखकर भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया। वराह पर अधिकार को लेकर हुआ विवाद अर्जुन की साधना में बाधा डालने के उद्देश्य से दुर्योधन ने मूक नामक एक विशालकाय जंगली सुअर यानी वराह को इंद्रकील पर्वत की ओर भेजा। जब उस वराह को अपनी तरफ आते देखा, तब अर्जुन ने तुरंत उस पर अपना बाण साध लिया। ठीक उसी पल वहां मौजूद एक किरात यानी शिकारी के वेश में आए भगवान शिव ने भी उस पर तीर चला दिया। दोनों के बाण एक ही समय पर उस सुअर को जा लगे, जिसके बाद अर्जुन और किरात रूपी शिवजी के बीच तीखा विवाद छिड़ गया। दोनों ही उस शिकार पर अपना हक जताने लगे। धीरे-धीरे यह बहस इतनी बढ़ गई कि इसने सीधे युद्ध का रूप ले लिया। अर्जुन ने उस शिकारी को हराने के लिए एक के बाद एक कई दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, परंतु किरात बने शिव पर उन अस्त्र-शस्त्रों का कोई असर नहीं हुआ। शिकारी का रूप धरे महादेव ने अर्जुन के सभी बाणों को हवा में ही निष्फल कर दिया। जब क्रोधित होकर अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष से प्रहार करना चाहा, तो किरात ने एक ही पल में उनसे वह धनुष भी छीन लिया। अस्त्रों और शस्त्रों के पूरी तरह निष्फल हो जाने पर अर्जुन मल्ल-युद्ध पर उतर आए, लेकिन किरात ने उन्हें आसानी से जमीन पर पटक दिया और कुछ क्षणों के लिए अर्जुन बेहोश भी हो गए। अर्जुन की सभी विद्याएं उस समय विफल हो चुकी थीं। सच्चाई का बोध और अहंकार का त्याग जब अर्जुन को होश आया, तो वह समझ चुके थे कि उनके सामने साधारण शिकारी के रूप में लड़ने वाला व्यक्ति कोई सामान्य मनुष्य नहीं है। अपनी इस पराजय से आहत होकर अर्जुन ने मन ही मन भगवान शिव का स्मरण किया और वहां की मिट्टी से ही एक शिवलिंग का निर्माण करके उस पर फूल अर्पित किए। अगले ही क्षण अर्जुन ने यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि जो फूल वह शिवलिंग पर चढ़ा रहे थे, वही ठीक सामने खड़े शिकारी के गले की माला में सुशोभित मिल रहे थे। इसके बाद अर्जुन को भली-भांति ज्ञान हो गया कि किरात यानी वह शिकारी कोई और नहीं बल्कि साक्षात भगवान शिव ही हैं। यह जानते ही वह तुरंत किरात रूपी शिवजी के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगने लगे। तब भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और अर्जुन से बोले कि मैं तुम्हारी वीरता, बाण विद्या और अटूट भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं। अब तुम्हारा सारा अहंकार समाप्त हो चुका है और तुम ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली अस्त्र के वास्तविक पात्र बन चुके हो। पाशुपतास्त्र की प्राप्ति और किरातेश्वर मंदिर का महत्व अर्जुन की निष्ठा और तपस्या से संतुष्ट होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान कर दिया। इसी अस्त्र की शक्ति के बल पर अर्जुन ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का मुकाबला किया और अधर्म का अंत किया। भगवान शिव ने जिस रूप में अर्जुन की परीक्षा ली थी, उसी किरात रूप के कारण वे किरातेश्वर महादेव कहलाए। किरातेश्वर महादेव का यह प्रसिद्ध मंदिर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य सिक्किम में स्थित है। इस पावन मंदिर में नाग पंचमी, महाशिवरात्रि और बाला चतुर्दशी के पावन अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। सवाल-जवाब 1. भगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए कौन सा रूप धारण किया था? भगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात यानी एक शिकारी का रूप धारण किया था। 2. अर्जुन ने किस पर्वत पर भगवान शिव की तपस्या की थी? अर्जुन ने दिव्य अस्त्र प्राप्ति के लिए इंद्रकील पर्वत पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। 3. भगवान शिव ने अर्जुन को कौन सा शक्तिशाली अस्त्र प्रदान किया था? तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया था। 4. किरातेश्वर महादेव मंदिर भारत के किस राज्य में स्थित है? किरातेश्वर महादेव मंदिर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य सिक्किम में स्थित है। https://trendkia.com/religion/bhagwan-shiva-ko-kyon-lena-pada-tha-kirat-ka-roop-arjuna-aur-kirateshwar-mahadev-ki-katha-17539 TrendKia — Har trend, sabse pehle.