धनतेरस से भाई दूज तक यम पंचक के अनुष्ठान, जानिए तिथियां और पूजन विधान यम पंचक का पांच दिवसीय अनुष्ठान 6 नवंबर से 11 नवंबर 2026 तक मनाया जाएगा, जिसमें यमराज की आराधना और मूक प्राणियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। सनातन परंपरा में कार्तिक कृष्ण पक्ष के अंतिम दिनों से लेकर शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक का समय विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि लगातार पांच दिनों तक चलने वाला अनुष्ठान है जिसकी शुरुआत धनतेरस के दिन से होती है और इसका समापन भाई दूज पर जाकर होता है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल में इस महापर्व को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पांच दिनों की यह पूरी समयावधि मृत्यु के अधिपति देवता यमराज की उपासना को समर्पित रहती है। लोक मान्यता के अनुसार, इन दिनों में यमराज के निमित्त दीप प्रज्वलित करने से परिजनों पर मंडराने वाला असमय काल का संकट दूर हो जाता है। इसके अतिरिक्त, इस पावन अवसर पर प्रकृति के विभिन्न मूक जीवों की पूजा करके उनके प्रति आभार प्रकट करने का भी विधान है। यम पंचक 2026 का कैलेंडर पंचांग की गणनाओं के आधार पर यम पंचक के अनुष्ठान 6 नवंबर 2026 से प्रारंभ होंगे। लगातार पांच दिनों तक चलने वाले विभिन्न धार्मिक कृत्यों के पश्चात इस पर्व का समापन 11 नवंबर 2026 को होगा। इस दौरान श्रद्धालु तिथियों के अनुरूप अलग-अलग देवताओं और प्राणियों के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित करते हैं। पांच दिनों की विस्तृत पूजन परंपरा यम पंचक के प्रत्येक दिन का अपना अलग महत्व है और हर दिन किसी न किसी विशेष जीव अथवा परंपरा को समर्पित होता है • प्रथम दिवस: इस अनुष्ठान के पहले दिन कौवे की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में कौवे को यमराज का दूत अथवा संदेशवाहक माना गया है। ऐसा विश्वास है कि प्रथम दिन कौवों को भोजन कराने से घर-परिवार किसी भी अप्रिय घटना और संकट से सुरक्षित रहता है। • द्वितीय दिवस: दूसरे दिन श्वान यानी कुत्ते की पूजा करने की परिपाटी है। सनातन धर्म की परंपराओं के अनुसार कुत्ते का संबंध प्रत्यक्ष रूप से भैरव बाबा और यमराज से जोड़ा जाता है, इसलिए उन्हें आदरपूर्वक आहार दिया जाता है। • तृतीय दिवस: तीसरे दिन समृद्धि और शुचिता की प्रतीक गौमाता का पूजन किया जाता है। इसी पावन तिथि पर दीपावली का महापर्व भी मनाया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से धन की देवी माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की विधि-विधान से पूजा संपन्न होती है। • चतुर्थ दिवस: चौथे दिन कृषि और शक्ति के प्रतीक बैलों की पूजा का विधान है। इसके साथ ही इस दिन गोवर्धन पूजा का पावन पर्व भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। • पंचम दिवस: अंतिम दिन भाई दूज का पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है, जो भाई और बहन के अटूट स्नेह और पारस्परिक विश्वास का प्रतीक माना गया है। यम दीपदान की विशेष विधि और नियम इस पूरी कालावधि में शाम के समय घर की चौखट के बाहर यम के नाम का दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार यह दीपक चार मुख वाला होना चाहिए और इसमें शुद्ध सरसों के तेल का उपयोग करना आवश्यक है। प्रज्वलित करते समय दीपक का मुख सदैव दक्षिण दिशा की तरफ रखा जाना चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है। दीप जलाते समय मन ही मन यमदेव का स्मरण करते हुए परिवार के सभी सदस्यों के दीर्घायु जीवन और सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है। इस पूरे अनुष्ठान के दौरान नित्य रूप से पक्षियों, श्वान और गायों को भोजन कराना एक आवश्यक कर्तव्य माना गया है। जीव-जगत के प्रति सम्मान का संदेश यम पंचक का यह उत्सव मनुष्य को यह सिखाता है कि वह सृष्टि के सभी जीवों के प्रति संवेदनशील रहे और उनके योगदान का सम्मान करे। यमराज की उपासना के माध्यम से व्यक्ति अपने अंतर्मन से मृत्यु के भय को मिटाता है और अपने परिजनों की सलामती का आशीर्वाद प्राप्त करता है। यह पर्व पर्यावरण, मूक पशु-पक्षियों और पारिवारिक रिश्तों के बीच संतुलन साधने का एक विशिष्ट आध्यात्मिक माध्यम है। इसका आप पर असर यह पर्व सनातन परंपरा में आस्था रखने वाले परिवारों के दैनिक पूजन और जीव-सेवा के नियमों से सीधा जुड़ा है। • पूजा की तैयारी: परिवार 6 नवंबर से 11 नवंबर 2026 के बीच यम पंचक के पांचों दिन विशिष्ट अनुष्ठान संपन्न कर सकते हैं। समय रहते चार मुखी दीपक और सरसों तेल की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है। • जीव सेवा का अवसर: नित्य रूप से कौवे, कुत्ते, गाय और बैलों के लिए भोजन निकालकर सेवा की जा सकती है। इससे मूक पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा मिलती है। • शाम का दीपदान: सूर्यास्त के समय घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यम दीपक प्रज्वलित करने का नियम है। इसके माध्यम से परिवार की सुरक्षा और कल्याण की मंगलकामना की जाती है। • पारंपरिक त्योहारों का समन्वय: धनतेरस, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के साथ इन अनुष्ठानों का सुगम समन्वय किया जा सकता है। लोग अपने दैनिक पूजा कार्यक्रम को इन तिथियों के अनुसार व्यवस्थित कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यम पंचक का महापर्व मृत्यु के अधिपति देवता को प्रसन्न करने और समस्त जीव-जगत के प्रति पारस्परिक कृतज्ञता ज्ञापित करने की पौराणिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। • अकाल मृत्यु का भय निवारण: सनातन मान्यताओं में अकाल मृत्यु के संकट को टालने के लिए यमराज की आराधना को अनिवार्य माना गया है। पांच दिनों के इस कालखंड में दक्षिण दिशा में दीपदान कर अनहोनी से रक्षा की याचना की जाती है। • जीवों का देव-संबंध: कौवे को यमराज का संदेशवाहक, श्वान को भैरव और यम का अनुचर, तथा गाय व बैल को समृद्धि और कृषि का आधार माना गया है। इसी धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण इन जीवों की पूजा कर कृतज्ञता अर्पित करने का नियम विकसित हुआ। • सांस्कृतिक परंपरा का विस्तार: उत्तर भारत और नेपाल के क्षेत्रों में कार्तिक मास के इन पांच दिनों को पर्वमाला के रूप में मनाने की सदियों पुरानी प्रथा चली आ रही है। यही परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारिवारिक सुरक्षा और जीव-कल्याण की भावना को आगे बढ़ाती है। सवाल-जवाब 1. यम पंचक 2026 की तिथियां क्या हैं? यम पंचक 6 नवंबर 2026 से शुरू होकर 11 नवंबर 2026 तक मनाया जाएगा। 2. यम पंचक की शुरुआत और समापन किन त्योहारों से होता है? इस महापर्व की शुरुआत धनतेरस के दिन से होती है और इसका समापन भाई दूज पर होता है। 3. यम का दीपक किस प्रकार और किस दिशा में जलाया जाता है? घर के बाहर सरसों के तेल का चार मुख वाला दीपक दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाया जाता है। 4. यम पंचक के पहले दो दिनों में किन जीवों की पूजा होती है? पहले दिन यमराज के संदेशवाहक कौवे की और दूसरे दिन कुत्ते की पूजा की जाती है। 5. तीसरे और चौथे दिन किन पशुओं का पूजन किया जाता है? तीसरे दिन समृद्धि की प्रतीक गाय का पूजन होता है और चौथे दिन गोवर्धन पर्व के साथ बैलों की पूजा की जाती है। https://trendkia.com/religion/dhanteras-se-bhai-dooj-taka-yam-panchak-ke-anushthana-janie-tithiyan-aura-pujana-vidhana-56184 TrendKia — Har trend, sabse pehle.