गया में पिंडदान से पहले पुनपुन में क्यों जरूरी है तर्पण, जानें गोदावरी तालाब का महत्व पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के मोक्ष के लिए पुनपुन नदी और गया के गोदावरी तालाब में पिंडदान और तर्पण का विशेष विधान है। इस वर्ष 6 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार आगामी 6 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत होने जा रही है। इस दौरान देश भर से लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने के लिए पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं। धार्मिक परंपराओं के मुताबिक बिहार के पटना और औरंगाबाद जिलों के बीच बहने वाली पुनपुन नदी में स्नान करने के बाद ही पितरों के लिए पहला अनुष्ठान किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार गयाजी जाने से पहले पुनपुन में पिंडदान करना बेहद आवश्यक माना गया है। इसके बिना गया में किया जाने वाला श्राद्धकर्म पूरा नहीं माना जाता है, जिसके कारण श्रद्धालु पहले यहीं पहुंचते हैं। पुनपुन को क्यों कहा जाता है पिंडदान का प्रथम द्वार धार्मिक मान्यताओं में इस स्थान का विशेष महत्व है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने माता जानकी के साथ मिलकर यहीं अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पहले पिंड का तर्पण किया था। इसी वजह से पुनपुन घाट को पिंडदान का प्रथम द्वार कहा जाता है। इस अनुष्ठान के पूरा होने के बाद ही श्रद्धालु गया पहुंचकर फल्गु नदी के तट पर पूरे विधि-विधान के साथ अगला तर्पण करते हैं। यहां श्राद्ध करने वाले लोग अपनी यात्रा यहीं से आरंभ करते हैं, हालांकि गया में सालभर तीर्थयात्रियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन पितृपक्ष के इन पंद्रह दिनों में इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। गोदावरी तालाब का क्या है महत्व और विकल्प कई बार यात्रा के दौरान ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं कि श्रद्धालु किन्हीं कारणों से पुनपुन नदी तक नहीं पहुंच पाते हैं और सीधे गयाजी पहुंच जाते हैं। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए भी शास्त्रों में उपाय बताया गया है। यदि कोई भक्त सीधे गया पहुंचता है तो वह यहां स्थित गोदावरी तालाब में स्नान करके तर्पण और पिंडदान की शुरुआत कर सकता है। पंडित राजा आचार्य के अनुसार जो लोग त्रिपाक्षिक श्राद्ध करना चाहते हैं, वे इस तालाब में स्नान के बाद अनुष्ठान शुरू कर सकते हैं। पुनपुन नदी में न पहुंच पाने की स्थिति में गोदावरी तालाब में स्नान करने से उतना ही पुण्य और फल प्राप्त होता है जितना पुनपुन में श्राद्ध करने से मिलता है। पितृपक्ष के दौरान कितने दिनों के होते हैं अनुष्ठान पितृपक्ष के इस पूरे पखवारे के दौरान मुख्य रूप से चार प्रकार के कर्मकांडों का विधान तय किया गया है। इसमें एक दिन, तीन दिन, सात दिन और सत्रह दिनों तक चलने वाले पिंडदान शामिल होते हैं। सत्रह दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान को त्रिपाक्षिक पिंडदान कहा जाता है। बाहर से आने वाले जो भी श्रद्धालु गया पहुंचते हैं, उन्हें सबसे पहले पुनपुन नदी के जल में तिल अर्पित करके अपने कर्मकांड की शुरुआत करनी चाहिए। इस वर्ष 6 सितंबर को पुनपुन श्राद्ध का दिन है और इस पावन अवसर पर जो लोग पुनपुन नहीं जा पाते, वे गोदावरी तालाब में डुबकी लगाकर अपनी धार्मिक प्रक्रियाओं को पूरा कर सकते हैं। इसका आप पर असर पितृपक्ष के दौरान इन धार्मिक अनुष्ठानों और यात्राओं का पालन करने वाले श्रद्धालुओं को अपनी यात्रा की योजना और समय का विशेष ध्यान रखना होगा। • बिहार में: पटना, औरंगाबाद और गया आने वाले श्रद्धालुओं को भारी भीड़ का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए परिवहन और आवास की व्यवस्था पहले से कर लें। • यात्रा व्यवस्था: जो लोग पुनपुन नहीं पहुंच पाते, वे गया के गोदावरी तालाब में स्नान करके अपने अनुष्ठान पूरे कर सकते हैं, जिससे उनका समय बचेगा। • समय प्रबंधन: अनुष्ठान के लिए एक, तीन, सात और सत्रह दिनों के विकल्प उपलब्ध हैं, इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार ही पिंडदान का विकल्प चुनें। • धार्मिक नियम: वेदों और मान्यताओं के अनुसार सही क्रम का पालन करने से ही पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा क्यों हुआ पितृपक्ष के दौरान पुनपुन और गया में पिंडदान करने की यह परंपरा सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। • पौराणिक मान्यता: भगवान राम द्वारा पुनपुन घाट पर पहला तर्पण किए जाने के कारण इस स्थान को अनुष्ठान की शुरुआत का मुख्य द्वार माना गया है। • भौगोलिक स्थिति: पटना और औरंगाबाद के बीच स्थित होने के कारण पुनपुन नदी गया जाने वाले मार्ग पर पड़ती है, जिससे यह यात्रा का स्वाभाविक पहला पड़ाव बन जाती है। • शास्त्रीय विकल्प: यात्रा की बाधाओं को दूर करने के लिए शास्त्रों में गोदावरी तालाब को पुनपुन के बराबर ही पवित्र और फलदायी विकल्प माना गया है। सवाल-जवाब 1. पितृपक्ष की शुरुआत इस वर्ष कब से हो रही है? इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 6 सितंबर से हो रही है। 2. पुनपुन नदी कहां स्थित है? पुनपुन नदी पटना और औरंगाबाद जिलों के बीच स्थित है। 3. गया में पिंडदान से पहले पुनपुन में स्नान क्यों जरूरी है? मान्यता है कि भगवान राम ने यहीं पहला तर्पण किया था, इसलिए गया के पिंडदान से पहले यहां तर्पण करना अनिवार्य माना जाता है। 4. यदि कोई श्रद्धालु पुनपुन न जा सके तो क्या विकल्प है? पुनपुन न पहुंच पाने की स्थिति में श्रद्धालु गया के गोदावरी तालाब में स्नान कर सकते हैं। 5. सत्रह दिन के पिंडदान को क्या कहा जाता है? सत्रह दिन के पिंडदान को त्रिपाक्षिक पिंडदान कहा जाता है। 6. पुनपुन श्राद्ध इस वर्ष किस तारीख को है? इस वर्ष 6 सितंबर को पुनपुन श्राद्ध का अनुष्ठान होगा। https://trendkia.com/religion/gaya-me-pind-daan-se-phele-punpun-me-kyu-jaruri-hai-tarpan-aur-godavari-talab-ka-mahatva-47150 TrendKia — Har trend, sabse pehle.