गया में माता सीता ने फल्गु किनारे बालू से क्यों किया था राजा दशरथ का पिंडदान, जानिए पौराणिक रहस्य पितृपक्ष के दौरान गयाजी में पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है, जिसकी जड़ें वनवास काल में माता सीता द्वारा फल्गु नदी के किनारे बालू से किए गए तर्पण से जुड़ी हैं. बिहार के गया क्षेत्र को सनातन परंपरा में पितरों की मुक्ति और तर्पण का केंद्र माना गया है. हर साल पितृपक्ष की अवधि में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के उद्धार और मोक्ष की मंगलकामना लेकर इस पावन भूमि पर एकत्र होते हैं. इस वर्ष पितृपक्ष 27 सितंबर, रविवार से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर संपन्न हो रहा है. गयाजी में पिंडदान की इस प्राचीन परंपरा का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रसंग रामायण काल में माता सीता द्वारा अपने ससुर राजा दशरथ के तर्पण से जुड़ा हुआ है. वनवास के दौरान गया पहुंचे थे भगवान राम, सीता और लक्ष्मण पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, यह घटना उस समय की है जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास काट रहे थे. उसी दौरान उन्हें अयोध्या नरेश राजा दशरथ के देहावसान का अत्यंत दुखद समाचार प्राप्त हुआ. पिता के निधन की सूचना मिलते ही भगवान राम शोकाकुल हो गए. अपने पितृ ऋण से मुक्ति और दशरथ जी की आत्मा की शांति हेतु श्राद्ध और पिंडदान संपन्न करने के उद्देश्य से वे सभी गया धाम पहुंचे. वहां पहुंचकर फल्गु नदी के तट पर पिंडदान कर्म की विधिवत तैयारियां आरंभ की गईं. राजा दशरथ की आत्मा का अनुरोध और सामग्री का संकट पिंडदान के अनुष्ठान के लिए फल, फूल और पूजन सामग्री का प्रबंध करने हेतु भगवान राम और लक्ष्मण पास के वन की ओर चले गए. इधर फल्गु तट पर पिंडदान का शुभ मुहूर्त बीतता जा रहा था. तभी एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में राजा दशरथ की आत्मा वहां प्रकट हुई और उसने माता सीता से तुरंत पिंडदान करने की विनती की. माता सीता ने विनम्रता से कहा कि शास्त्र सम्मत रूप से श्राद्ध कर्म संपन्न करने का प्रथम अधिकार पुत्रों का होता है और भगवान राम उस क्षण वहां उपस्थित नहीं हैं. इस पर राजा दशरथ की आत्मा ने तर्क दिया कि सीता कुलवधू के रूप में उनके परिवार का अभिन्न अंग हैं, इसलिए उनके हाथों किया गया समर्पण भी पूर्ण रूप से स्वीकार्य और मान्य होगा. फल्गु की बालू से बनाया पिंड और संपन्न हुआ श्राद्ध मुहूर्त का समय तेजी से निकल रहा था और श्रीराम सामग्री लेकर अभी तक नहीं लौटे थे. परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए माता सीता ने किसी भी औपचारिक पूजन सामग्री की प्रतीक्षा किए बिना तात्कालिक संसाधनों का उपयोग करने का संकल्प लिया. फल्गु नदी के किनारे प्रचुर मात्रा में रेत यानी बालू उपलब्ध थी. माता सीता ने उसी बालू को हाथों में लेकर पिंड तैयार किए और संपूर्ण श्रद्धा भाव के साथ अपने श्वसुर राजा दशरथ का पिंडदान पूरा कर दिया. इसी ऐतिहासिक घटना के बाद से गया में फल्गु तट पर बालू से बने पिंडों द्वारा तर्पण करने की परंपरा को परम फलदायी माना जाने लगा. छह साक्षियों का चयन और श्रीराम का संशय माता सीता ने इस एकांत अनुष्ठान की सत्यता प्रमाणित करने के लिए प्रकृति के छह घटकों को साक्षी बनाया. इनमें फल्गु नदी, गाय, एक ब्राह्मण, कौआ, तुलसी का पौधा और अक्षयवट वृक्ष शामिल थे. कुछ समय पश्चात जब भगवान राम और लक्ष्मण पूजन सामग्री जुटाकर लौटे, तब माता सीता ने उन्हें अवगत कराया कि राजा दशरथ का पिंडदान पहले ही संपन्न हो चुका है. भगवान राम को इस बात पर विस्मय हुआ और उन्होंने प्रमाण मांगा कि यह अनुष्ठान वास्तव में किस आधार पर पूरा हुआ. तब माता सीता ने उपस्थित सभी साक्षियों से श्रीराम के सम्मुख वास्तविक वृत्तांत बताने का आग्रह किया. झूठ बोलने पर मिला श्राप और अक्षयवट की निष्ठा पौराणिक कथा दर्शाती है कि उस निर्णायक मोड़ पर केवल अक्षयवट वृक्ष ने ही सत्य का पक्ष लिया और भगवान राम के समक्ष माता सीता के कथन की पुष्टि की. शेष अन्य पांच साक्षियों ने किसी कारणवश सत्य को छिपाते हुए असत्य भाषण किया. इस आचरण से माता सीता अत्यंत व्यथित और रुष्ट हो गईं. उन्होंने असत्य का साथ देने वाले साक्षियों को पृथक-पृथक श्राप दे दिए. इसी क्रम में फल्गु नदी को यह श्राप मिला कि उसकी पावन जलधारा धरातल की सतह पर दृश्यमान नहीं रहेगी और नदी ऊपरी रूप से सदैव सूखी प्रतीत होगी. आज भी फल्गु नदी के भीतर बहती है अदृश्य जलधारा मान्यता है कि माता सीता के उसी श्राप के प्रभाव से आज भी फल्गु नदी के विशाल पाट पर केवल सूखी रेत दिखाई देती है, जबकि रेत की ऊपरी परत हटाने पर नीचे जलस्रोत विद्यमान मिलता है. यही रहस्यमयी स्वरूप गयाजी की धार्मिक गरिमा को अद्वितीय बनाता है, जहां श्रद्धालु हर साल पहुंचकर अपने पूर्वजों को बालू और जल से तृप्त करते हैं. इसका आप पर असर पितृपक्ष के दौरान गयाजी में पिंडदान की परंपरा श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है. • भारत में: पितृपक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा. जो लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करना चाहते हैं, वे इन तिथियों के अनुसार अपने अनुष्ठान की योजना बना सकते हैं. • बिहार में: गयाजी में देश भर से लाखों श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना रहती है. स्थानीय प्रशासन और तीर्थ पुरोहित फल्गु तट और विभिन्न वेदियों पर तर्पण की व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित करने में जुटे हैं. • परंपरागत नियम: गया में फल्गु तट पर बालू से पिंड दान करने की विशिष्ट धार्मिक मान्यता है. श्रद्धालु बिना किसी संकोच के पारंपरिक विधि से बालू और जल अर्पित कर पूर्वजों की तृप्ति के लिए प्रार्थना कर सकते हैं. • तीर्थ यात्रा की तैयारी: सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होने से अंतिम दिनों में भारी भीड़ रहती है. यात्रा करने वाले श्रद्धालु समय रहते परिवहन और ठहरने का प्रबंध पूरा कर लें. ऐसा क्यों हुआ गया में बालू से पिंडदान और फल्गु नदी के ऊपरी सतह पर जल न दिखने के पीछे रामायण कालीन पौराणिक घटनाक्रम जुड़ा हुआ है. • सामग्री का अभाव और समय का संकट: भगवान राम और लक्ष्मण सामग्री लेने वन गए थे और पिंडदान का शुभ मुहूर्त बीतने लगा था. समय सीमा समाप्त होने के भय से राजा दशरथ की आत्मा के आग्रह पर माता सीता ने तुरंत बालू से पिंड बनाकर तर्पण किया. • पुत्री समान अधिकार: राजा दशरथ ने सीता को स्पष्ट किया कि कुलवधू होने के नाते वे परिवार की अंग हैं. इसलिए पुत्रों की अनुपस्थिति में उनके द्वारा अर्पित किया गया पिंड भी पूर्ण रूप से मान्य होगा. • झूठ और श्राप की परिणति: अनुष्ठान की गवाही मांगते समय अक्षयवट को छोड़कर फल्गु नदी और अन्य साक्षियों ने असत्य कहा. इसी कारण रुष्ट होकर माता सीता ने फल्गु को धरातल पर जलविहीन दिखने का श्राप दे दिया. सवाल-जवाब 1. इस वर्ष पितृपक्ष कब से कब तक है? इस बार पितृपक्ष 27 सितंबर, रविवार से आरंभ हो रहा है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर समाप्त होगा. 2. माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान किस नदी के किनारे किया था? माता सीता ने बिहार के गया में स्थित फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ का पिंडदान किया था. 3. माता सीता ने पिंडदान में बालू का उपयोग क्यों किया था? सामग्री जुटाने गए भगवान राम और लक्ष्मण समय पर नहीं लौटे और मुहूर्त बीत रहा था, इसलिए सीता जी ने फल्गु की बालू से ही पिंड तैयार किए. 4. माता सीता के पिंडदान के समय किस साक्षी ने सच बोला था? छह साक्षियों में से केवल अक्षयवट वृक्ष ने ही भगवान राम के सामने सच बोलकर माता सीता का साथ दिया था. 5. फल्गु नदी को माता सीता ने क्या श्राप दिया था? झूठ बोलने पर माता सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया था कि उसका जल सतह पर नहीं दिखेगा और वह ऊपर से सूखी नजर आएगी. https://trendkia.com/religion/gaya-men-mata-sita-ne-falgu-kinare-balu-se-kyon-kiya-tha-raja-dasharatha-ka-pindadana-janie-pauranika-rahasya-38285 TrendKia — Har trend, sabse pehle.