गोंडा में 500 साल पुराने वटवृक्ष का रहस्य: जहां कभी ऋषि करते थे तपस्या, आज उमड़ता है आस्था का सैलाब उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के देवरिया कलां गांव में स्थित एक पांच सदी पुराना बरगद का पेड़ स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। कभी घने जंगल के बीच ऋषियों की तपोभूमि रहा यह स्थान आज अपनी शांति और धार्मिक मान्यताओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित देवरिया कलां गांव केवल अपनी भौगोलिक स्थिति के लिए ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत और रहस्यमयी प्राकृतिक धरोहर के लिए भी जाना जाता है। रुपईडीह विकासखंड के अंतर्गत आने वाले इस क्षेत्र में एक ऐसा विशालकाय वटवृक्ष (बरगद का पेड़) मौजूद है, जो पिछले 500 वर्षों से अधिक समय से समय के अनगिनत थपेड़ों का साक्षी रहा है। यह प्राचीन पेड़ आज महज़ एक वनस्पति नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों और दूर-दराज से आने वाले अनगिनत श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का एक अमिट केंद्र बन चुका है। इसकी विशाल और फैली हुई शाखाएं न केवल चिलचिलाती धूप में राहगीरों को घनी और शीतल छाया प्रदान करती हैं, बल्कि मानसिक शांति की तलाश में आए लोगों को एक आध्यात्मिक आश्रय भी देती हैं। हर दिन यहां भारी संख्या में लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं, और यह अटल विश्वास है कि सच्चे मन से इस पवित्र स्थान पर की गई कोई भी प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती। प्राचीन काल के ऋषियों की रहस्यमयी तपोभूमि इस चमत्कारी बरगद के पेड़ के अतीत को लेकर कई दिलचस्प कहानियां और मान्यताएं क्षेत्र में प्रचलित हैं। स्थानीय निवासी गिरधर गोपाल मिश्र ने बताया, "हमारे पूर्वज भी इस वटवृक्ष की अद्भुत महिमा और इसके चमत्कारों के बारे में विस्तार से बताया करते थे।" पीढ़ियों से चली आ रही इन कहानियों के बावजूद, आज तक कोई भी इस बात का सटीक प्रमाण नहीं दे पाया है कि इस विशाल पेड़ का रोपण किसने और कब किया था। हालांकि, यह स्पष्ट है कि यह पेड़ देवरिया कलां गांव की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। बुजुर्गों का कहना है कि सदियों पहले यह पूरा इलाका एक बेहद घने और रहस्यमयी जंगल से घिरा हुआ था। इसी निर्जन वन में, इस वटवृक्ष के ठीक नीचे बैठकर प्राचीन काल के ऋषि-मुनि कठोर तपस्या और ध्यान किया करते थे। इसी पेड़ के समीप माता जी का एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध मंदिर भी स्थित है। जो भी श्रद्धालु इस बरगद के दर्शन करने आता है, वह अनिवार्य रूप से इस मंदिर में भी माथा टेकता है। ग्रामीण पूरे विश्वास के साथ दावा करते हैं कि यह पेड़ कम से कम पांच सदी पुराना है। त्योहारों, मेलों और परंपराओं का जीवंत केंद्र धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी इस स्थान का महत्व अद्वितीय है। यह सिर्फ एक मन्नत मांगने की जगह नहीं है, बल्कि कई महत्वपूर्ण हिंदू त्योहारों और परंपराओं का आयोजन स्थल भी है। वट सावित्री व्रत, जिसे स्थानीय भाषा में 'बरसाइत' भी कहा जाता है, के पावन अवसर पर यहां का नजारा देखने लायक होता है। इस खास दिन पर दूर-दराज से भारी संख्या में महिलाएं यहां एकत्रित होती हैं। वे पूरी श्रद्धा के साथ इस वटवृक्ष की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं, इसके चारों ओर परिक्रमा लगाती हैं, और अपने पति की लंबी आयु के साथ-साथ अपने पूरे परिवार की सुख, समृद्धि और निरंतर खुशहाली की मंगल कामना करती हैं। केवल वट सावित्री ही नहीं, बल्कि सावन के पवित्र महीने, चैत्र और शारदीय नवरात्र जैसे बड़े धार्मिक अवसरों पर भी यहां भक्तों का एक विशाल हुजूम उमड़ पड़ता है। पूरे गोंडा क्षेत्र में इस विशिष्ट स्थान को एक अत्यंत जागृत और पवित्र स्थल का दर्जा प्राप्त है, जहां आने मात्र से लोगों के कष्ट दूर हो जाते हैं। सकारात्मक ऊर्जा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक आध्यात्मिक शांति के अलावा, यह स्थान स्थानीय लोगों के लिए सामाजिक जुड़ाव का भी एक बड़ा माध्यम है। गांव के निवासी संदीप दुबे के अनुसार, इस पवित्र स्थान पर हर सप्ताह सोमवार और शुक्रवार को एक बड़ा मेला आयोजित किया जाता है। इन विशेष दिनों में आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु और व्यापारी यहां जमा होते हैं। संदीप दुबे ने कहा कि इस पेड़ के नीचे बैठने मात्र से ही मन को एक अजीब सी असीम शांति मिलती है। यहां के शांत वातावरण में एक बहुत ही अलग और शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह महसूस होता है, जो शहरी जीवन के तनाव को पल भर में दूर कर देता है। वहीं, स्थानीय जानकार प्रवीन शास्त्री बताते हैं कि पुराने समय में इस वटवृक्ष के आसपास का जंगल इतना अधिक घना और डरावना था कि सूरज ढलने के बाद कोई भी आम इंसान इधर आने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता था। लेकिन आज, यह गोंडा जिले के सबसे सुरक्षित और पूजनीय स्थानों में से एक है। प्रवीन शास्त्री के मुताबिक, प्रसिद्ध उत्तरी भवानी (मां बाराही देवी) के मंदिर के बाद, देवरिया कलां का यह प्राचीन वटवृक्ष अपनी विशालता, रहस्यमयी प्राचीनता और असीम धार्मिक महत्व के चलते पूरे जिले में अपनी एक अलग और विशेष पहचान रखता है। यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि लोगों की अटूट आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का एक जीता-जागता प्रतीक है। इसका आप पर असर • भारत में: यह स्थान प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है, जो देश भर में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे सकता है। • गोंडा में: गोंडा और आसपास के निवासियों के लिए यह न केवल आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, बल्कि सोमवार और शुक्रवार को लगने वाले मेलों के जरिए स्थानीय अर्थव्यवस्था और छोटे व्यापारियों को भी सहारा देता है। सवाल-जवाब 1. गोंडा का यह प्राचीन वटवृक्ष कहां स्थित है? यह उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रुपईडीह विकासखंड के देवरिया कलां गांव में स्थित है। 2. यह बरगद का पेड़ लगभग कितना पुराना माना जाता है? ग्रामीणों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह पेड़ 500 साल से भी अधिक पुराना है। 3. इस वटवृक्ष के पास कौन सा त्योहार विशेष रूप से मनाया जाता है? यहां वट सावित्री व्रत (बरसाइत) के दिन महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जो अपने पति की लंबी उम्र के लिए पूजा करती हैं। 4. इस स्थान पर मेला किन दिनों में लगता है? स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पवित्र स्थान पर हर सप्ताह सोमवार और शुक्रवार को मेला लगता है। 5. प्राचीन काल में इस पेड़ का क्या महत्व था? मान्यता है कि प्राचीन काल में यह इलाका एक घना जंगल था और इसी वटवृक्ष के नीचे ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे। https://trendkia.com/religion/gonda-men-500-sala-purane-vatavriksha-ka-rahasya-jahan-kabhi-rishi-karate-the-tapasya-aja-umarata-hai-astha-ka-sailaba-10210 TrendKia — Har trend, sabse pehle.