हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने देशव्यापी अभियान किया तेज विश्व हिंदू परिषद ने देश के विभिन्न राज्यों में हिंदू मंदिरों के सरकारी नियंत्रण को समाप्त कर प्रबंधन भक्तों और धार्मिक समुदायों को सौंपने की मांग तेज कर दी है। देशभर में धार्मिक स्थलों के संचालन और प्रबंधन को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस छिड़ गई है। विश्व हिंदू परिषद ने एक बड़े फैसले के तहत हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए अपने राष्ट्रीय अभियान को और तेज करने का ऐलान किया है। मंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान संगठन के अध्यक्ष आलोक कुमार ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारों के तहत चल रहे मंदिरों की प्रशासनिक व्यवस्था अब भक्तों और हिंदू समाज की प्रतिनिधि संस्थाओं को सौंपी जानी चाहिए। इसके लिए संगठन देश के विभिन्न राज्यों में कानूनी बदलावों की मांग को लेकर चरणबद्ध आंदोलन चलाएगा। राजनीतिक नेतृत्व से संपर्क और रणनीति अपनी इस मांग को अमलीजामा पहनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने एक विस्तृत रणनीति तैयार की है। इसके तहत संगठन के प्रतिनिधि देश भर के मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, सांसदों और विधायकों से मुलाकात करेंगे। इन मुलाकातों के दौरान जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंपकर उन राज्य कानूनों में संशोधन की मांग की जाएगी, जिनके जरिए मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कायम है। यह कदम फरवरी 2025 में घोषित मंदिर मुक्ति आंदोलन की दिशा में एक प्रमुख विस्तार है। उस समय संगठन ने सार्वजनिक सभाएं आयोजित करने, विधिक प्रस्ताव पारित करने और राज्य स्तरीय नेताओं से संपर्क साधने की योजना की रूपरेखा पेश की थी। धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता और दान को लेकर उठी चिंताएं यह अभियान ऐसे समय में जोर पकड़ रहा है जब बड़े धार्मिक संस्थानों में चढ़ावे, संपत्ति के इस्तेमाल और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर जनमानस में कई सवाल तैर रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर के चंदे से जुड़ी अनियमितताओं के आरोपों से लेकर वैष्णो देवी जैसे प्रमुख धामों से जुड़े पुराने विवादों ने इस विषय को संवेदनशील बना दिया है। अयोध्या के मामले में मंदिर ट्रस्ट ने स्वयं जांच कराने की मांग की थी। हालांकि बाद में आई रिपोर्टों में किसी बड़ी धांधली की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इन घटनाओं ने धार्मिक स्थलों में जवाबदेही और पारदर्शी प्रबंधन की जरूरत पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। धार्मिक समानता और स्वायत्तता का तर्क विश्व हिंदू परिषद का मुख्य तर्क यह है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य को सभी धार्मिक समुदायों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए। आलोक कुमार ने कहा कि देश में सरकारें मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, जैन संस्थानों या बौद्ध मठों का संचालन नहीं करती हैं। ऐसे में केवल हिंदू मंदिरों को सरकारी प्रशासनिक ढांचे के तहत रखना न्यायसंगत नहीं है। संगठन का मानना है कि मंदिरों का प्रबंधन पूरी तरह से श्रद्धालुओं और हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले ट्रस्टों के हाथों में होना चाहिए ताकि धार्मिक परंपराओं की मौलिकता बनी रहे। स्वायत्त प्रबंधन के लिए चार सूत्री ढांचा सरकारी नियंत्रण हटने के बाद मंदिरों के पारदर्शी संचालन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्व हिंदू परिषद ने एक चार सूत्री व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है • धार्मिक कार्यों में धन का उपयोग: मंदिरों में आने वाले दान और चढ़ावे की पूरी राशि का इस्तेमाल केवल हिंदू धर्म से जुड़े धार्मिक, आध्यात्मिक और चैरिटी के कामों में ही किया जाना चाहिए। • वित्तीय पारदर्शिता और ऑडिट: मंदिरों के आय-व्यय के खातों को पूरी तरह पारदर्शी रखा जाए और उनका नियमित रूप से स्वतंत्र ऑडिट कराया जाना अनिवार्य हो। • सामाजिक समावेशिता: मंदिर प्रबंधन समितियों में महिलाओं के साथ-साथ SC और ST समुदायों के प्रतिनिधियों की सम्मानजनक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। • कर्मचारियों का कल्याण: पुजारियों, आचार्यों और मंदिर परिसर में कार्यरत सभी कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सेवा लाभों की पूर्ण सुरक्षा दी जाए। विभिन्न राज्यों में लागू एचआरसीई कानून और स्थिति वर्तमान में देश के कई राज्यों में हजारों प्रमुख हिंदू मंदिर राज्य सरकारों के बंदोबस्ती विभागों के अधीन संचालित हो रहे हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और ओडिशा जैसे राज्यों में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HRCE) कानून लागू हैं। ये कानून राज्य सरकारों को निम्नलिखित अधिकार प्रदान करते हैं • मंदिर ट्रस्टियों की नियुक्ति करने या उन्हें स्वीकृति देने का अधिकार। • भक्तों द्वारा दिए गए दान, चढ़ावे और मंदिर के राजस्व का ऑडिट करना। • मंदिर की जमीनों, अचल संपत्तियों और परिसंपत्तियों के उपयोग को नियंत्रित करना। • प्रशासनिक अव्यवस्था या किसी विवाद की स्थिति में सीधे हस्तक्षेप करना। इन कानूनों का समर्थन करने वालों का तर्क है कि प्रसिद्ध मंदिरों के पास विशाल भूखंड, बहुमूल्य आभूषण और करोड़ों का दान आता है, इसलिए वित्तीय गड़बड़ियों को रोकने के लिए सरकारी निगरानी आवश्यक है। वहीं आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था समय के साथ नौकरशाही के भारी हस्तक्षेप में बदल गई है, जिससे धार्मिक संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 26 और अदालती फैसले संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का खुद प्रबंधन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि राज्य धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर प्रशासन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं के बीच अंतर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों में यह माना गया है कि पूजा-पाठ और धार्मिक रीति-रिवाज जहां राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त हैं, वहीं संपत्ति प्रबंधन, वित्तीय ऑडिट और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को कुप्रबंधन रोकने के उद्देश्य से राज्य द्वारा नियमित किया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि सरकारी नियंत्रण को पूरी तरह समाप्त करना एक सीधी प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए संबंधित राज्यों की विधानसभाओं में कानूनों को संशोधित करना होगा, और ऐसे बदलावों को अदालत में न्यायिक समीक्षा की कसौटी से भी गुजरना पड़ेगा। इसका आप पर असर भारत भर में: मंदिर प्रबंधन में संभावित बदलावों से धार्मिक संस्थानों में चढ़ावे और संपत्तियों की वित्तीय पारदर्शिता और ऑडिट प्रणाली बेहतर हो सकती है। श्रद्धालुओं और स्थानीय समुदायों के लिए: यदि प्रबंधन गैर-सरकारी संस्थाओं को मिलता है, तो मंदिर समितियों में महिलाओं और SC/ST समुदायों के प्रतिनिधित्व के साथ स्थानीय भक्तों की सीधी भागीदारी बढ़ सकती है। सवाल-जवाब 1. विश्व हिंदू परिषद के मंदिर मुक्ति अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है? इस अभियान का मुख्य उद्देश्य हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराकर उनका प्रशासनिक प्रबंधन श्रद्धालुओं और हिंदू समाज की प्रतिनिधि संस्थाओं को सौंपना है। 2. VHP ने मंदिर प्रबंधन के लिए क्या चार सूत्री ढांचा प्रस्तावित किया है? VHP के ढांचे के अनुसार मंदिर का धन केवल हिंदू धर्मार्थ कार्यों में इस्तेमाल हो, खाते पारदर्शी और ऑडिटेड हों, प्रबंधन में महिलाओं व SC/ST समुदायों का प्रतिनिधित्व हो और पुजारियों-कर्मचारियों के वेतन व भत्ते सुरक्षित रहें। 3. किन राज्यों में मंदिर HRCE या बंदोबस्ती कानूनों के तहत आते हैं? तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और ओडिशा सहित कई राज्यों में हजारों मंदिर HRCE या राज्य बंदोबस्ती कानूनों के तहत प्रबंधित किए जाते हैं। 4. संविधान का अनुच्छेद 26 मंदिर प्रबंधन के संबंध में क्या कहता है? संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन स्वयं करने का अधिकार देता है, हालांकि अदालतें राज्य को प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं को रेगुलेट करने की अनुमति देती हैं। 5. VHP अपनी मांगों को लेकर क्या कदम उठाने जा रही है? VHP नेता देशभर के मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, सांसदों और विधायकों से मिलकर राज्य के मंदिर प्रबंधन कानूनों में संशोधन की मांग से जुड़े ज्ञापन सौंपेंगे। https://trendkia.com/religion/hindu-mndiron-ko-sarakari-niyntrana-se-mukta-karane-ke-lie-vishva-hindu-parishad-ne-deshavyapi-abhiyana-kiya-teja-14743 TrendKia — Har trend, sabse pehle.