# इस्कॉन मंदिर में परंपरा ऐसी, रथयात्रा से ठीक पहले 15 दिनों तक बीमार रहते हैं भगवान जगन्नाथ

> उज्जैन के इस्कॉन मंदिर में रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ को अस्वस्थ मानकर 15 दिनों तक आयुर्वेदिक विधि से उनकी विशेष सेवा की जाती है.

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-07-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/iskcon-mndira-men-parnpara-aisi-rathayatra-se-thika-pahale-15-dinon-taka-bimara-rahate-hain-bhagavana-jagannath-4431 · **Language:** Hindi
**Tags:** उज्जैन, इस्कॉन मंदिर, भगवान जगन्नाथ, रथयात्रा, ज्वर लीला, दशमूल औषधि, आयुर्वेदिक उपचार

मध्य प्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन, जिसे पुराने समय में अवंतिका कहा जाता था, अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं के लिए पूरे देश में जानी जाती है. यहां इस्कॉन मंदिर से निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हर साल भक्तों के लिए खास आकर्षण होती है, लेकिन इस यात्रा से पहले एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है जो सुनने में हैरान करने वाली लगती है. मान्यता है कि रथयात्रा शुरू होने से पहले भगवान जगन्नाथ खुद अस्वस्थ हो जाते हैं और कुछ दिनों तक उनकी विशेष सेवा और उपचार किया जाता है.

## श्रीकृष्ण के प्रसंग से जुड़ी है यह परंपरा
इस्कॉन मंदिर के पीआरओ राघव पंडित दास के मुताबिक, रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ को एकांतवास में रखने की यह परंपरा बेहद खास मानी जाती है. इन दिनों मंदिर के पुजारी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ उनकी सेवा में जुटे रहते हैं. इसकी जड़ें भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े एक प्रसंग से मिलती हैं, जब स्नान उत्सव के बाद वे अपनी मौसी के घर ठहरे थे और उसी दौरान अस्वस्थ हो गए थे. उसी परंपरा को आज भी जीवंत रखने के लिए भगवान को विश्राम दिया जाता है और उनकी विशेष सेवा-पूजा की जाती है.

## 15 दिन चलती है ज्वर लीला, दशमूल औषधि से इलाज
भगवान जगन्नाथ की इस अस्वस्थ अवस्था को धार्मिक परंपरा में ज्वर लीला कहा जाता है. इस दौरान उन्हें पूरे 15 दिनों तक विश्राम दिया जाता है और उनकी सेवा पूरी तरह आयुर्वेदिक तरीके से होती है. इलाज के लिए हिमालय और अन्य जगहों से तैयार की गई खास जड़ी-बूटी दशमूल औषधि इस्तेमाल की जाती है, जिसका काढ़ा बनाकर भगवान को अर्पित किया जाता है. इन 15 दिनों में उनकी देखभाल ठीक वैसे ही की जाती है जैसे किसी बीमार इंसान की जाती है. उन्हें हल्का और तरल भोजन दिया जाता है, ताकि विशेष सेवा और उपचार के जरिए उनका जल्द स्वास्थ्य लाभ हो सके.

## रोज होती है मालिश, भोग में खिचड़ी और दलिया
परंपरा के मुताबिक भगवान जगन्नाथ की यह ज्वर लीला सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि इसे भक्त और भगवान के बीच के गहरे रिश्ते का प्रतीक माना जाता है. जब भगवान अस्वस्थ रहते हैं, तब उनकी सेवा भी बिल्कुल एक आम इंसान की तरह की जाती है. उन्हें औषधीय तेल से रोज मालिश दी जाती है, उनकी सेहत का पूरा ध्यान रखा जाता है और शरीर की स्थिति पर बारीकी से नजर रखी जाती है. इन दिनों भगवान को हल्का भोजन जैसे खिचड़ी, दलिया और मूंग की दाल का भोग अर्पित किया जाता है. यह परंपरा यही संदेश देती है कि भगवान अपने भक्तों के सुख-दुख और जीवन के हर पहलू से गहराई से जुड़े हुए हैं.

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** देशभर के जगन्नाथ भक्तों के लिए यह परंपरा बताती है कि रथयात्रा से पहले मंदिरों में एकांतवास और खास पूजा का दौर चलता है, इसलिए इस दौरान दर्शन के नियम और समय बदल सकते हैं.
- **उज्जैन में:** उज्जैन के इस्कॉन मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को 15 दिनों की ज्वर लीला के दौरान भगवान जगन्नाथ के एकांतवास और दर्शन व्यवस्था में होने वाले बदलाव का ध्यान रखना चाहिए.

## सवाल-जवाब

### 1. भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले कौन सी परंपरा निभाई जाती है?
मान्यता के अनुसार रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं और उन्हें 15 दिनों तक एकांतवास में रखकर आयुर्वेदिक सेवा दी जाती है.

### 2. इस परंपरा को क्या कहा जाता है?
इसे धार्मिक परंपरा में ज्वर लीला के नाम से जाना जाता है.

### 3. भगवान का इलाज किस औषधि से किया जाता है?
हिमालय और अन्य जगहों से तैयार दशमूल औषधि का काढ़ा बनाकर भगवान को अर्पित किया जाता है.

### 4. यह परंपरा किस प्रसंग से जुड़ी है?
यह भगवान श्रीकृष्ण के उस प्रसंग से जुड़ी है, जब स्नान उत्सव के बाद मौसी के घर ठहरने के दौरान वे अस्वस्थ हो गए थे.

### 5. इस दौरान भगवान को क्या भोग लगाया जाता है?
उन्हें हल्का भोजन जैसे खिचड़ी, दलिया और मूंग की दाल का भोग अर्पित किया जाता है.

### 6. यह परंपरा किस मंदिर में निभाई जाती है?
यह परंपरा उज्जैन के इस्कॉन मंदिर में निभाई जाती है, जहां से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकलती है.

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