# करौली में भद्रावती किनारे विश्राम मुद्रा वाले बैठे हनुमान, जानिए राजमहल के अखाड़े से प्रकट होने का इतिहास

> राजस्थान के करौली में भद्रावती नदी तट पर स्थित सैकड़ों वर्ष पुराना बैठे हनुमान मंदिर अपनी दुर्लभ स्वयंभू प्रतिमा और रहस्यमयी स्थापना इतिहास के कारण देश-विदेश के श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-09-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/karauli-men-bhadravati-kinare-vishrama-mudra-vale-baithe-hanuman-janie-rajamahala-ke-akhare-se-prakata-hone-ka-itihasa-36244 · **Language:** Hindi
**Tags:** करौली, बैठे हनुमान, राजस्थान मंदिर, भद्रावती नदी, राजा गोपाल सिंह, मनकामेश्वर महादेव, मंडरायल दुर्ग

राजस्थान की ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी करौली में पवनपुत्र हनुमान के अनेक पावन स्थल मौजूद हैं, परंतु भद्रावती नदी के तट पर स्थापित बैठे हनुमान जी का धाम अपने आप में अद्वितीय और चमत्कारी माना जाता है। सैकड़ों वर्ष पुराने इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहां प्रतिष्ठित हनुमान जी की दुर्लभ स्वयंभू प्रतिमा है। इस विग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मारुति नंदन विश्राम की मुद्रा में बैठे हुए दिखाई देते हैं। इसी शांत और बैठी हुई स्थिति के कारण लोकमानस में यह पावन स्थल बैठे हनुमान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस अलौकिक विग्रह की कीर्ति केवल करौली या राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कोने-कोने के अलावा सात समंदर पार विदेशों से भी श्रद्धालु इनके दर्शन के लिए खिंचे चले आते हैं।

## विश्राम मुद्रा वाले विग्रह की दिव्यता और भक्तों का अटूट विश्वास
बैठे हनुमान जी के प्रति स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आने वाले दर्शनार्थियों की आस्था अत्यंत प्रगाढ़ है। श्रद्धालुओं की ऐसी मान्यता है कि इस शांत प्रतिमा के महज दर्शन करने से ही भक्तों के सारे संकट दूर हो जाते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। जो व्यक्ति एक बार इस विग्रह की सौम्य छवि के दर्शन कर लेता है, उसका इस स्थान से एक गहरा आत्मिक नाता बन जाता है। करौली के रहने वाले प्रेम स्वरूप शर्मा, जो अपनी बाल्यावस्था से ही इस पावन धाम से जुड़े हुए हैं, बताते हैं कि पवनपुत्र हनुमान की विश्राम मुद्रा वाली ऐसी भव्य और विशाल प्रतिमा अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। वहीं 75 वर्षीय स्थानीय नागरिक हरि बल्लभ गुप्ता का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में ऐसा अलौकिक स्वरूप कहीं और नहीं देखा। उनके अनुसार बैठे हनुमान जी केवल दृष्टिपात मात्र से ही जीवन की बड़ी से बड़ी आपदाओं और विपदाओं का निवारण कर देते हैं।

## सात समंदर पार तक फैली ख्याति और विदेशी भक्तों का आगमन
इस पावन धाम की अलौकिक आभा का प्रभाव वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिलता है। स्थानीय निवासी शिवम शर्मा इस संदर्भ में बताते हैं कि बैठे हनुमान जी के चमत्कारों की चर्चा सुनकर विदेशी धरती से भी लोग यहां पहुंचते हैं। उन्होंने स्मरण करते हुए बताया कि एक बार ऑस्ट्रेलिया से एक श्रद्धालु विशेष रूप से यहां दर्शन करने पहुंचे थे, जिन्होंने यह स्वीकार किया कि पूरे भारतवर्ष में हनुमान जी का ऐसा अनूठा विग्रह केवल राजस्थान के करौली में ही विद्यमान है। शिवम शर्मा के अनुसार बैठे हनुमान अपने अनन्य भक्तों को स्वप्न में भी दर्शन देते हैं और उनके जीवन में आने वाले संकटों को अपनी कृपा से सहज ही हर लेते हैं।

## रियासतकालीन शिवालय और रानियों की पूजा से जुड़ा इतिहास
बैठे हनुमान मंदिर परिसर केवल इसी प्रतिमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका इतिहास करौली के राजपरिवार और प्राचीन शैव परंपरा से भी गहराई से जुड़ा है। हनुमान जी के यहां विराजमान होने से पूर्व यह स्थल रियासतकाल के प्राचीन शिवालय के रूप में विख्यात था, जहां मनकामेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे। सावन के पवित्र महीने में करौली राजघराने की रानियां विशेष रूप से यहां आकर मनकामेश्वर पंचमुखी भोलेनाथ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना किया करती थीं। समय बीतने के साथ जब बैठे हनुमान यहां प्रतिष्ठित हुए, तब धीरे-धीरे मनकामेश्वर महादेव की मुख्य पहचान गौण होती चली गई और यह पूरा परिसर बैठे हनुमान मंदिर के नाम से ही सर्वत्र विख्यात हो गया। आज भी मंदिर में शनिवार और मंगलवार के पावन दिनों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जबकि नवरात्रि के नौ दिनों में यहां अखंड रामायण के पाठ का भव्य आयोजन होता है। रोजगार के सिलसिले में नगर से बाहर रहने वाले प्रवासी श्रद्धालु भी दीपावली और दशहरे जैसे महापर्वों पर इनके दर्शन करना कभी नहीं भूलते।

## राजा गोपाल सिंह को आया स्वप्न और अखाड़े से हुआ प्राकट्य
करौली के वरिष्ठ इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा इस धाम के प्राकट्य का ऐतिहासिक घटनाक्रम साझा करते हुए बताते हैं कि यह प्रसंग लगभग 1747 के कालखंड से जुड़ा हुआ है। उस दौर में करौली रियासत की बागडोर पराक्रमी राजा गोपाल सिंह जी के हाथों में थी। एक रात्रि राजा गोपाल सिंह जी को स्वप्न में मारुति नंदन के दिव्य स्वरूप के दर्शन हुए और उन्हें संकेत मिला। इसके उपरांत जब राजमहल परिसर में बने अखाड़े में देखा गया, तो वहां से बैठे हनुमान जी की यह दुर्लभ स्वयंभू प्रतिमा साक्षात प्रकट हुई। राजमहल के अखाड़े से प्रतिमा के निकलने के बाद पूरे राज्य में हर्ष और कौतूहल का वातावरण बन गया था।

## मंडरायल दुर्ग ले जाते समय पहिए खुले और तय हुआ स्थापना स्थल
इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा के अनुसार प्रतिमा के प्राकट्य के पश्चात उसकी स्थापना की कहानी भी अत्यंत विस्मयकारी रही। राजा और राजपुरोहितों ने विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया कि इस पावन विग्रह को सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मंडरायल दुर्ग में ले जाकर स्थापित किया जाएगा। इसके लिए प्रतिमा को पारंपरिक बैलगाड़ियों के काफिले के सहारे मंडरायल दुर्ग की दिशा में रवाना किया गया। यात्रा जब भद्रावती नदी के तट के समीप पहुंची, जहां आज यह मंदिर अवस्थित है, तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। वहां अचानक कई बैलगाड़ियों के पहिए अपने आप धुरी से खुलकर अलग हो गए। पहियों के इस प्रकार अनायास खुल जाने को राजा और प्रजा ने भगवान हनुमान का स्पष्ट दैवीय संकेत माना कि वे आगे नहीं जाना चाहते। इसके बाद बिना किसी विलंब के प्रतिमा को नदी तट पर स्थित प्राचीन शिवालय के बाहरी बरामदे में ही ससम्मान विराजमान कर दिया गया। इसी घटना के बाद से यह स्थान बैठे हनुमान के दिव्य धाम के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

## इसका आप पर असर
धार्मिक पर्यटन और स्थानीय संस्कृति के लिहाज से यह ऐतिहासिक मंदिर करौली की पहचान को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर मजबूती प्रदान करता है।

- **भारत भर के श्रद्धालुओं के लिए:** विश्राम मुद्रा में बैठे स्वयंभू विग्रह के दर्शन का यह दुर्लभ अवसर देश भर के भक्तों को एक अनूठा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। जो श्रद्धालु प्राचीन स्थापत्य और ऐतिहासिक धरोहरों के दर्शन के इच्छुक हैं, उनके लिए करौली यात्रा में यह मंदिर एक प्रमुख केंद्र बन जाता है।
- **राजस्थान और करौली के स्थानीय निवासियों के लिए:** भद्रावती तट पर स्थित इस मंदिर में त्योहारों के दौरान होने वाले धार्मिक आयोजनों से क्षेत्रीय पर्यटन और छोटे कारोबारियों को सतत रोजगार मिलता है। बाहर रहने वाले प्रवासियों के नियमित आगमन से स्थानीय आतिथ्य और परिवहन व्यवस्था को भी सीधा संबल मिलता है।
- **आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शोधार्थियों के लिए:** रियासतकालीन इतिहास, राजमहल के अखाड़े और प्राचीन शिवालय से जुड़े साक्ष्य 18वीं सदी की वास्तुकला और धार्मिक मान्यताओं के अध्ययन का ठोस आधार देते हैं। इतिहास में रुचि रखने वाले लोग यहां 1747 के दौर की रियासती परंपराओं को प्रत्यक्ष समझ सकते हैं।
- **आगामी त्योहारों पर जाने वाले यात्रियों के लिए:** नवरात्रि, दीपावली और दशहरे के पर्वों पर मंदिर में अत्यधिक भीड़ उमड़ती है, इसलिए श्रद्धालुओं को समय प्रबंधन का ध्यान रखना चाहिए। अखंड रामायण पाठ और मंगलवार-शनिवार की आरती में सम्मिलित होने के लिए पूर्व सूचना के आधार पर यात्रा की योजना बनाना सुविधाजनक रहता है।

## ऐसा क्यों हुआ
भद्रावती नदी तट पर बैठे हनुमान मंदिर की स्थापना 18वीं शताब्दी के मध्य में हुए कई अप्रत्याशित और ऐतिहासिक घटनाक्रमों का परिणाम थी।

- **राजा गोपाल सिंह का स्वप्न:** लगभग 1747 के आसपास करौली के तत्कालीन शासक राजा गोपाल सिंह जी को स्वप्न में दिव्य दर्शन प्राप्त हुए थे। इसी स्वप्न निर्देश के आधार पर राजमहल परिसर के अखाड़े की भूमि का निरीक्षण किया गया, जहां से स्वयंभू प्रतिमा प्रकट हुई।
- **मंडरायल दुर्ग स्थानांतरण का प्रयास:** प्रतिमा की सुरक्षा और महत्ता को देखते हुए राजदरबार ने इसे प्रतिष्ठित मंडरायल दुर्ग में स्थापित करने की योजना बनाई थी। इस उद्देश्य से विग्रह को पारंपरिक बैलगाड़ियों के जरिए दुर्ग की ओर रवाना किया गया था।
- **बैलगाड़ियों के पहियों का खुलना:** भद्रावती नदी के तट पर पहुंचते ही कई बैलगाड़ियों के पहिए अचानक अपनी धुरी से खुलकर निकल गए। इस अप्रत्याशित घटना को दरबार और स्थानीय लोगों ने ईश्वरीय संकेत माना कि प्रतिमा को आगे न ले जाकर इसी तट पर स्थापित किया जाए।
- **प्राचीन शैव स्थल का रूपांतरण:** नदी किनारे पूर्व से विद्यमान रियासतकालीन मनकामेश्वर महादेव शिवालय के बाहरी बरामदे में विग्रह स्थापित किया गया। इस स्थापना के उपरांत धीरे-धीरे इस समूचे परिसर की प्राथमिक पहचान बैठे हनुमान धाम के रूप में स्थापित हो गई।

## सवाल-जवाब

### 1. करौली के बैठे हनुमान मंदिर की मुख्य विशेषता क्या है?
इस मंदिर की मुख्य विशेषता यहां स्थापित हनुमान जी की स्वयंभू विशाल प्रतिमा है, जो विश्राम करते हुए बैठी मुद्रा में दिखाई देती है।

### 2. बैठे हनुमान जी की प्रतिमा का प्राकट्य कब और कैसे हुआ था?
लगभग 1747 में करौली के राजा गोपाल सिंह जी को स्वप्न आने के बाद राजमहल परिसर के अखाड़े से यह स्वयंभू प्रतिमा प्रकट हुई थी।

### 3. प्रतिमा को मंडरायल दुर्ग के बजाय नदी किनारे क्यों स्थापित किया गया?
मंडरायल दुर्ग ले जाते समय भद्रावती नदी के पास बैलगाड़ियों के पहिए अचानक खुल गए, जिसे दैवीय संकेत मानकर वहीं स्थापित कर दिया गया।

### 4. हनुमान जी की स्थापना से पहले इस स्थान पर कौन सा मंदिर था?
यहां पहले रियासतकालीन मनकामेश्वर महादेव का शिवालय था, जहां करौली की रानियां सावन में पंचमुखी भोलेनाथ की पूजा करने आती थीं।

### 5. बैठे हनुमान मंदिर में सबसे अधिक भीड़ किन दिनों और अवसरों पर रहती है?
यहां मंगलवार और शनिवार को नियमित भीड़ रहती है, जबकि नवरात्रि के अखंड पाठ तथा दीपावली और दशहरे पर श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति होती है।

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