# खंडेला के बिहारीजी मंदिर में साल में सिर्फ एक घंटे होते हैं ढाई सेंटीमीटर की नन्हीं राधा रानी के दर्शन

> सीकर जिले के खंडेला स्थित ऐतिहासिक बिहारीजी मंदिर में राधा अष्टमी पर छह सौ साल पुराने ढाई सेंटीमीटर के सूक्ष्म विग्रह के दर्शन सूक्ष्मदर्शी यंत्र से कराए गए।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/khandela-ke-bihariji-temple-men-sala-men-sirpha-eka-ghnte-hote-hain-dhai-sentimitara-ki-nanhin-radha-rani-ke-darshana-34133 · **Language:** Hindi
**Tags:** सीकर, खंडेला, बिहारीजी मंदिर, राधा अष्टमी, करमैती बाई, शेखावाटी

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खंडेला कस्बे का ऐतिहासिक बिहारीजी मंदिर अपनी अनूठी और सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है। इस देवालय की सबसे बड़ी विशेषता यहां प्रतिष्ठित भगवान श्री कृष्ण और राधाजी के स्वरूप हैं। मंदिर में विराजमान भगवान श्री कृष्ण की भव्य प्रतिमा वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर की प्रतिमा के समरूप दिखाई देती है। वहीं दूसरी ओर, यहां श्री राधाजी का एक अत्यंत दुर्लभ और लघु विग्रह मौजूद है, जिसका इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना बताया जाता है। इस अलौकिक प्रतिमा की ऊंचाई केवल 2.5 सेंटीमीटर है। आकार में इतनी सूक्ष्म होने के कारण सामान्य मानवीय दृष्टि से इसके सूक्ष्म विवरणों के दर्शन कर पाना लगभग असंभव होता है।

## साल में केवल साठ मिनट के लिए खुलते हैं दुर्लभ दर्शन के पट
इस पावन स्थल से जुड़ी सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि पूरे वर्ष के दौरान श्रद्धालुओं को इस लघु विग्रह के दर्शन केवल एक दिन और वह भी मात्र 60 मिनट के लिए ही सुलभ होते हैं। मंदिर प्रबंधन द्वारा भक्तों को इस नन्हीं प्रतिमा का दीदार कराने के लिए विशेष सूक्ष्मदर्शी यंत्र की व्यवस्था की जाती है। इस दुर्लभ क्षण के साक्षी बनने के लिए प्रतिवर्ष भक्तों का बड़ा जनसैलाब खंडेला पहुंचता है। मंदिर के पुजारी बिहारी लाल पारीक ने जानकारी दी कि शनिवार को राधा अष्टमी के पावन पर्व पर सुबह 10 बजे से 11 बजे तक मंदिर के सभामंडप में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहा। इस दौरान हजारों की संख्या में पहुंचे कृष्ण भक्तों ने सूक्ष्मदर्शी यंत्र की मदद से राधा रानी के इस दुर्लभ विग्रह के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की।

## जन्मोत्सव और अभिषेक के दो प्रमुख वार्षिक अनुष्ठान
पुजारी बिहारी लाल पारीक के अनुसार मंदिर परिसर में वर्ष में दो बड़े उत्सव पूरी भव्यता और विधिविधान के साथ आयोजित किए जाते हैं। इनमें पहला प्रमुख आयोजन भाद्रपद मास में आने वाली कृष्ण जन्माष्टमी का होता है, जबकि दूसरा बड़ा पर्व राधा अष्टमी का रहता है। कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर देवालय में ठाकुर जी को विभिन्न दुर्लभ जड़ी बूटियों से तैयार किए गए जल से स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात राधा अष्टमी के दिन राधाजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है, जिसमें विशेष अभिषेक और पूजन संपन्न होता है। इसी जन्मोत्सव के दौरान सभामंडप में वह पावन घड़ी आती है जब भक्तों को साठ मिनट के लिए सूक्ष्मदर्शी से राधाजी के इस अलौकिक रूप के दर्शन का सौभाग्य मिलता है।

## शेखावाटी की मीरा भक्त करमैती बाई की अनन्य साधना
ढाई सेंटीमीटर के इस लघु विग्रह की स्थापना के तार करीब छह शताब्दी पुरानी एक भावुक आध्यात्मिक गाथा से जुड़े हैं। पुजारी के कथन के अनुसार इस विग्रह का सीधा संबंध परम कृष्ण भक्त करमैती बाई से है, जिन्हें पूरे राजस्थान और ब्रज क्षेत्र में शेखावाटी की मीरा के नाम से सम्मान दिया जाता है। ऐतिहासिक धार्मिक ग्रंथ भक्तमाल में भी करमैती बाई की निश्छल भक्ति और साधना का विस्तार से वर्णन दर्ज है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार विवाह के उपरांत गौने की पहली ही रात करमैती बाई समस्त सांसारिक बंधनों को त्यागकर पैदल ही वृंदावन धाम की यात्रा पर निकल पड़ी थीं। वृंदावन पहुंचने पर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं एक संत के वेष में उन्हें साक्षात दर्शन दिए और अपने हाथों से भोजन कराया था।

## यमुना तट पर पिता को सौंपा था विग्रह और भक्ति का मार्ग
जब करमैती बाई के पिता और तत्कालीन राजपुरोहित परशुराम उन्हें खोजते हुए वृंदावन पहुंचे और घर लौटने का आग्रह किया, तब उन्होंने वापस लौटने से साफ इनकार कर दिया। कहा जाता है कि उन्होंने यमुना नदी के पावन जल से श्रीकृष्ण का एक पावन विग्रह प्राप्त कर अपने पिता को भेंट किया और उन्हें सांसारिक मोह त्यागकर कृष्ण भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। पुजारी के अनुसार इसी पावन परंपरा के अंतर्गत उन्होंने राधाजी का यह ढाई सेंटीमीटर का सूक्ष्म विग्रह भी अपने पिता को सौंपा था। कालांतर में श्रीकृष्ण और राधाजी के ये दोनों पावन स्वरूप खंडेला के बिहारीजी मंदिर में स्थापित हुए और तभी से यहां नियमित सेवा-पूजा की यह अटूट परंपरा निरंतर चली आ रही है।

## भक्ति साधना देखकर तत्कालीन शेखावत नरेश ने बनवाई थी कुटिया
करमैती बाई के पिता परशुराम तत्कालीन शेखावत राजा के दरबार में राजपुरोहित की पदवी पर थे। अपनी पुत्री के त्याग, उपदेशों और विरह भाव से भरे भजनों से प्रभावित होकर वे स्वयं राजकाज और पुरोहिताई के बंधनों से मुक्त होकर कृष्ण भजन में लीन रहने लगे। जब इस असाधारण परिवर्तन की सूचना राज्य के राजा तक पहुंची, तो वे स्वयं सच्चाई जानने के लिए वृंदावन पहुंचे। यमुना के पावन किनारे पर कृष्ण के वियोग में लीन करमैती बाई की अनन्य साधना और प्रेमाभक्ति देखकर नरेश भी गहरे रूप से भावविभोर हो गए। राजा ने श्रद्धापूर्वक निवेदन कर ब्रह्मकुंड के समीप करमैती बाई के निवास और भजन के लिए एक कुटिया का निर्माण करवाया। इसके बाद राजा स्वयं भी सांसारिक वैभव से परे हटकर कृष्ण भक्ति के रंग में रंग गए। वही छह सौ वर्ष पुरानी आध्यात्मिक धरोहर आज भी खंडेला के बिहारीजी मंदिर में सुरक्षित है, जहां राधा अष्टमी पर ढाई सेंटीमीटर की राधा रानी का यह अलौकिक दर्शन जन-जन को मुग्ध कर देता है।

## इसका आप पर असर
खंडेला के बिहारीजी मंदिर से जुड़ी यह अनूठी परंपरा धार्मिक पर्यटन और स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए दर्शन के सटीक नियमों की जानकारी देती है।

- **सीकर और शेखावाटी में:** स्थानीय श्रद्धालुओं को ध्यान रखना होगा कि इस दुर्लभ विग्रह के दर्शन केवल राधा अष्टमी के दिन सुबह 10 से 11 बजे तक ही उपलब्ध होते हैं। यदि इस निर्धारित एक घंटे की अवधि में दर्शन छूट जाएं, तो अगले अवसर के लिए पूरे एक वर्ष का इंतजार करना पड़ता है।
- **देशभर के श्रद्धालुओं के लिए:** कृष्ण भक्ति और प्राचीन मूर्तिकला में रुचि रखने वाले पर्यटक अपनी यात्रा योजना राधा अष्टमी के पर्व के अनुसार तय कर सकते हैं। खंडेला कस्बे की यात्रा की योजना बनाते समय सुबह की इस विशेष व्यवस्था और सभामंडप के नियमों की पूर्व जानकारी रखना आवश्यक है।
- **मंदिर परंपरा और अनुष्ठान:** कृष्ण जन्माष्टमी पर ठाकुर जी के जड़ी बूटियों से होने वाले स्नान दर्शन का हिस्सा बनने के लिए भी अलग से यात्रा तय की जा सकती है। इससे भक्तों को साल में आयोजित होने वाले इन दोनों प्रमुख आयोजनों में समय पर शामिल होने की सुविधा मिलती है।
- **आस्था और स्थानीय इतिहास:** इतिहास और शोध के छात्रों को शेखावाटी की मीरा करमैती बाई की छह सौ साल पुरानी परंपरा को प्रत्यक्ष समझने का अवसर मिलता है। प्राचीन भक्ति साहित्य और स्थानीय संस्कृति को सहेजने के दृष्टिकोण से यह परंपरा अत्यंत प्रेरणादायी है।

## ऐसा क्यों हुआ
खंडेला के बिहारीजी मंदिर में ढाई सेंटीमीटर के इस विग्रह और केवल एक घंटे के दर्शन की परंपरा के पीछे छह सौ वर्ष पुराना भक्ति का इतिहास है।

- **अत्यंत लघु विग्रह का आकार:** राधाजी की यह पावन प्रतिमा महज 2.5 सेंटीमीटर ऊंची है, जिसे बिना उपकरण के स्पष्ट रूप से देख पाना असंभव है। इसी कारण मंदिर प्रबंधन को सभामंडप में भक्तों के लिए विशेष सूक्ष्मदर्शी यंत्र स्थापित करने की व्यवस्था करनी पड़ती है।
- **करमैती बाई का आध्यात्मिक त्याग:** शेखावाटी की मीरा कही जाने वाली करमैती बाई ने गौने की पहली रात गृहत्याग कर वृंदावन में तपस्या की थी। उन्होंने यमुना नदी से प्राप्त श्रीकृष्ण और राधा के विग्रह अपने पिता परशुराम को सौंपे थे, जो बाद में खंडेला के बिहारीजी मंदिर पहुंचे।
- **परंपरा और सुरक्षा के नियम:** करीब 600 साल पुरानी इस दुर्लभ धरोहर की सुरक्षा और पवित्रता बनाए रखने के लिए इसे वर्षभर सुरक्षित रखा जाता है। मंदिर की प्राचीन परंपरा के अनुसार इसके सार्वजनिक दर्शन केवल राधा अष्टमी के दिन एक घंटे के लिए ही मान्य किए गए हैं।
- **राजपरिवार और संतों की मान्यता:** तत्कालीन शेखावत राजा और पुरोहित परशुराम द्वारा स्थापित इस साधना पीठ में सदियों से चली आ रही मान्यताओं का आज भी उसी रूप में पालन किया जा रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. खंडेला का बिहारीजी मंदिर राजस्थान के किस जिले में स्थित है?
यह ऐतिहासिक मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खंडेला कस्बे में स्थित है।

### 2. मंदिर में विराजमान राधाजी के लघु विग्रह की ऊंचाई कितनी है?
राधाजी के इस सूक्ष्म विग्रह की ऊंचाई महज 2.5 सेंटीमीटर यानी ढाई सेंटीमीटर है।

### 3. भक्तों को इस छोटे विग्रह के दर्शन किस प्रकार कराए जाते हैं?
अत्यंत छोटा आकार होने के कारण सभामंडप में श्रद्धालुओं को सूक्ष्मदर्शी यंत्र के माध्यम से दर्शन कराए जाते हैं।

### 4. साल में राधाजी के इस विग्रह के दर्शन कितने समय के लिए होते हैं?
इसके दर्शन साल में केवल एक दिन राधा अष्टमी के मौके पर सुबह 10 बजे से 11 बजे तक यानी सिर्फ एक घंटे के लिए होते हैं।

### 5. राधाजी का यह विग्रह कितना पुराना बताया जाता है?
पुजारी के अनुसार राधाजी का यह दुर्लभ विग्रह करीब 600 साल पुराना है।

### 6. इस विग्रह का संबंध किस प्रसिद्ध कृष्ण भक्त से जुड़ा है?
इसका संबंध कृष्ण भक्त करमैती बाई से है, जिन्हें शेखावाटी की मीरा भी कहा जाता है।

### 7. कृष्ण जन्माष्टमी पर बिहारीजी मंदिर में कौन सी विशेष परंपरा निभाई जाती है?
कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में ठाकुर जी को विशेष जड़ी बूटियों से स्नान कराने की परंपरा निभाई जाती है।

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