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  "title": "कोटा का डेरू माता मंदिर: जहां ढोक लगाने मात्र से जोड़ों और कमर के दर्द में मिलती है राहत, जानें इस चमत्कारी धाम की पूरी कहानी",
  "summary": "कोटा से करीब 17 किलोमीटर दूर स्थित डेरू माता (जाखोड़ा माता) मंदिर हाड़ौती क्षेत्र की आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां श्रद्धालु जोड़ों, कमर और शरीर के पुराने दर्द से मुक्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं।",
  "content": "राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में आस्था का एक ऐसा केंद्र है, जहां लोग दवा और ऑपरेशन की सलाह के बावजूद सबसे पहले मत्था टेकने पहुंचते हैं। यह है डेरू माता मंदिर, जिसे जाखोड़ा माता मंदिर के नाम से भी पहचाना जाता है। कोटा शहर से इसकी दूरी करीब 17 किलोमीटर है, जबकि कैथून कस्बे से यह महज लगभग 4 किलोमीटर दूर है। हजारों श्रद्धालुओं की गहरी आस्था ने इस ऐतिहासिक स्थान को क्षेत्र का प्रमुख तीर्थ बना दिया है।\n\nक्यों खास है माता का यह दरबार\nइस मंदिर की सबसे बड़ी मान्यता शारीरिक पीड़ा से जुड़ी हुई है। श्रद्धालु मानते हैं कि माता के दरबार में ढोक लगाने और सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर जोड़ों, कमर, हाथ-पैर और सिर के दर्द जैसी गंभीर समस्याओं में चमत्कारिक रूप से राहत मिलती है। यहां आने वालों का अटूट विश्वास है कि अपनी पीड़ा लेकर जो भी व्यक्ति माता तक पहुंचता है, उसकी पुकार जरूर सुनी जाती है। सच्ची श्रद्धा के साथ की गई प्रार्थना से भयंकर से भयंकर दर्द भी कुछ ही समय में कम होने लगता है, ऐसा भक्तों का कहना है। यही कारण है कि सिर्फ कोटा ही नहीं, बल्कि दूर-दूर से रोगी अपने कष्टों से मुक्ति की आस में यहां दर्शन के लिए आते हैं। चिकित्सा विज्ञान के इस दौर में भी लोगों की यह आस्था जरा भी डगमगाई नहीं है।\n\nतीन पीढ़ियों से चल रही सेवा-पूजा\nमंदिर के वर्तमान पुजारी श्याम बिहारी शर्मा इसके अतीत पर रोशनी डालते हैं। उनके अनुसार उनका परिवार पिछली तीन पीढ़ियों से इस प्राचीन मंदिर की सेवा और पूजा-अर्चना में जुटा हुआ है। यहां विशेष रूप से माता के पल्लू की पूजा की परंपरा है। भीड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आम दिनों में प्रतिदिन करीब 500 से 700 श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, और रविवार व खास अवसरों पर यह आंकड़ा कई गुना बढ़ जाता है। बड़ी तादाद में लोग अपने पुराने दर्द और असाध्य रोगों से छुटकारे की कामना लेकर हाजिरी लगाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के मुताबिक पूजा-पाठ करवाते हैं और चढ़ावा अर्पित करते हैं।\n\nराजा-महाराजाओं के दौर का इतिहास\nपुजारी श्याम बिहारी शर्मा बताते हैं कि इस चमत्कारी मंदिर को राजा-महाराजाओं के समय का माना जाता है। मंदिर परिसर के ठीक पास बना एक पुराना तालाब भी उसी दौर के शासकों की देन है। सैकड़ों वर्ष पुरानी यह देवी आस्था आज भी लोगों को अपने आप यहां खींच लाती है, और परिसर का शांत वातावरण श्रद्धालुओं को मानसिक सुकून भी देता है।\n\nभक्तों की जुबानी, उनके अनुभव\nदर्शन के लिए पहुंचीं रजनी शर्मा ने अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें उठने-बैठने में बेहद गंभीर तकलीफ थी और डॉक्टर ने घुटनों का ऑपरेशन कराने की सलाह दे दी थी। तभी किसी परिचित ने उन्हें एक बार जाखोड़ा माता मंदिर के दर्शन करने को कहा। इसके बाद उन्होंने माता के दरबार में तीन बार ढोक लगाई और नियमित दर्शन किए। उनका कहना है कि पहले जमीन पर बैठने और उठने में बहुत परेशानी होती थी, लेकिन अब उन्हें काफी आराम है और वे सामान्य रूप से बैठ-उठ पा रही हैं।\n\nकोटा निवासी एक अन्य श्रद्धालु सीमा जैन ने बताया कि उन्हें घुटने में बहुत तेज दर्द रहता था। ढोक लगाने के लिए वे पांचवीं बार यहां दर्शन को पहुंचीं। उनका साफ कहना है कि अब उनकी दर्द की समस्या पहले के मुकाबले काफी कम हो चुकी है और वे खुद को कहीं ज्यादा स्वस्थ महसूस कर रही हैं। आस्था और अटूट विश्वास के इस पावन केंद्र पर हर सप्ताह सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं, और लोगों का मानना है कि माता की असीम कृपा व सच्ची श्रद्धा से उनके सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं।",
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  "category": "धर्म",
  "publishedAt": "2026-06-15",
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    "जाखोड़ा माता मंदिर",
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