कुशाग्रहणी अमावस्या पर पितृ दोष निवारण और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए जपें ये 4 पवित्र मंत्र 11 सितंबर 2026 को पड़ने वाली भाद्रपद अमावस्या पर पितरों की तृप्ति और जीवन के कष्टों को दूर करने के लिए 4 विशेष मंत्रों का जप फलदायी माना जाता है। जानिए इन मंत्रों के जप का महत्व और विधि। हिंदू धर्म में भाद्रपद अमावस्या का अत्यधिक धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। उदयातिथि की गणना के अनुसार वर्ष 2026 में भाद्रपद अमावस्या 11 सितंबर को मनाई जाएगी। सनातन परंपरा में इस अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस पावन तिथि पर वर्ष भर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ के लिए पवित्र कुशा घास एकत्रित की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पितरों का स्मरण करने, तर्पण देने और उनके निमित्त मंत्रों का जप करने से पितृ देव प्रसन्न होते हैं तथा साधक को उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। पितृ प्रसन्नता और दोष निवारण के लिए चार विशेष मंत्र भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर पितरों को प्रसन्न करने तथा जीवन में आ रही रुकावटों को समाप्त करने के लिए शास्त्रों में कुछ विशिष्ट मंत्रों का उल्लेख किया गया है। इन मंत्रों के नियमित और विधिपूर्वक जप से व्यक्ति को अनेक प्रकार के आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं। 1. पितृ गायत्री मंत्र मंत्र: ॐ पितृगणाय विद्महे जगत्धारिणे धीमहि तन्नो पितृ प्रचोदयात्। भाद्रपद अमावस्या के शुभ दिन पर पितृ गायत्री मंत्र का पाठ अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। इस मंत्र का जप करने से साधक को पितरों की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है और कुंडली में मौजूद पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। यदि जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हों या कार्य बनते-बनते बिगड़ जाते हों, तो इस मंत्र के प्रभाव से वे कष्ट दूर होने लगते हैं। साथ ही यह मंत्र वंश वृद्धि और पारिवारिक सुख-समृद्धि में भी सहायक माना जाता है। अमावस्या की तिथि पर श्रद्धापूर्वक कम से कम 11 बार इस मंत्र का जप अवश्य करना चाहिए। 2. स्वधा मंत्र मंत्र: ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः अमावस्या तिथि पर जब पितरों को जल और तिल से तर्पण अर्पित किया जाता है, तब स्वधा मंत्र का उच्चारण करना अनिवार्य माना जाता है। धार्मिक विधान के अनुसार, जिस प्रकार देव पूजन और यज्ञ के दौरान आहुति देते समय 'स्वाहा' शब्द का प्रयोग किया जाता है, ठीक उसी प्रकार पितरों को आहुति अथवा तर्पण प्रदान करते समय 'स्वधा' का उच्चारण किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र का जप करने से पितरों की आत्मा पूर्ण रूप से तृप्त होती है और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। 3. पितृ नमस्कार मंत्र मंत्र: ॐ श्री पितृदेवताभ्यो नमः। भाद्रपद अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों का ध्यान करते हुए और दोनों हाथ जोड़कर पितृ नमस्कार मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करना चाहिए। इस सरल और प्रभावशाली मंत्र का जप करने से पितृ देव अपने वंशजों पर कृपा वर्षा करते हैं। इसके प्रभाव से व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं और लंबे समय से अटके या बिगड़े हुए कार्य भी धीरे-धीरे सिद्ध होने लगते हैं। 4. पितृ शांति मंत्र मंत्र: ॐ आद्य-भूताय विद्महे सर्व-सेव्याय धीमहि। शिव-शक्ति-स्वरूपेण पितृ-देव प्रचोदयात्॥ यदि परिवार में किसी पूर्वज की अकाल मृत्यु हुई हो या किसी दुर्घटना के कारण उनका निधन हुआ हो, तो भाद्रपद अमावस्या के दिन पितृ शांति मंत्र का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता है। इस मंत्र के निरंतर जप से दिवंगत आत्माओं को शांति प्राप्त होती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही साधक को पितृ दोष के नकारात्मक प्रभावों से भी स्थायी राहत मिलती है। इसका आप पर असर भाद्रपद अमावस्या पर किए जाने वाले ये मंत्र जप और धार्मिक कार्य साधकों को आध्यात्मिक शांति देने के साथ-साथ उनके जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने में मदद करते हैं। • पितृ दोष से राहत: इन मंत्रों का विधिपूर्वक जप करने से जन्मपत्रिका में मौजूद पितृ दोष का प्रभाव कम होता है। इससे मानसिक तनाव दूर होता है और परिवार में शांति स्थापित होती है। • रुकते हुए कार्यों की सिद्धि: नियमित मंत्र जप से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आ रही रुकावटें दूर होती हैं। जो काम लंबे समय से अटके हुए थे, उनमें प्रगति होने लगती है। • वंश वृद्धि और समृद्धि: पितृ गायत्री मंत्र का पाठ करने से परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह साधक के वंश की निरंतरता और उन्नति में सहायक माना जाता है। • अकाल मृत्यु वाले पूर्वजों की शांति: दुर्घटना या असामयिक मृत्यु का शिकार हुए पूर्वजों के लिए शांति मंत्र का जप करने से उनकी आत्मा को मोक्ष मिलता है। इससे घर का वास्तु और वातावरण सकारात्मक बनता है। • धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कुशा संचयन: इस दिन लाई गई पवित्र कुशा घास का प्रयोग पूरे वर्ष के पूजा-पाठ में किया जाता है। इससे घर के समस्त अनुष्ठान शास्त्रीय रूप से फलदायी बनते हैं। ऐसा क्यों हुआ सनातन परंपरा में भाद्रपद अमावस्या को कुशा एकत्रित करने और पितरों के तर्पण के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। • कुशा संग्रह का वार्षिक विधान: धार्मिक शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद अमावस्या ही वह एकमात्र तिथि है जब वर्ष भर के पूजा-अनुष्ठानों के लिए पवित्र कुशा उखाड़ी जाती है, जिससे इस तिथि को कुशाग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। • पितरों की तृप्ति का पर्व: अमावस्या तिथि सूर्य और चंद्रमा के विशेष मिलन की तिथि होती है, जिसे पितरों के स्मरण और तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। • शास्त्रोक्त मंत्रों का सामर्थ्य: वैदिक ग्रंथों में स्वधा और पितृ गायत्री जैसे मंत्रों को पितृ लोक तक आहुति और श्रद्धा पहुँचाने का सीधा माध्यम बताया गया है। सवाल-जवाब 1. वर्ष 2026 में भाद्रपद अमावस्या किस तारीख को है? उदयातिथि के अनुसार वर्ष 2026 में भाद्रपद अमावस्या 11 सितंबर को मनाई जाएगी। 2. भाद्रपद अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या क्यों कहा जाता है? इस तिथि पर साल भर के धार्मिक कार्यों और पूजा-अनुष्ठानों के लिए पवित्र कुशा घास एकत्रित की जाती है, इसलिए इसे कुशाग्रहणी अमावस्या कहते हैं। 3. पितृ गायत्री मंत्र का जप कम से कम कितनी बार करना चाहिए? अमावस्या के दिन पितृ गायत्री मंत्र का जप कम से कम 11 बार करना शुभ माना जाता है। 4. अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वजों के लिए किस मंत्र का जप करना चाहिए? अकाल मृत्यु या दुर्घटना में दिवंगत हुए पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पितृ शांति मंत्र (ॐ आद्य-भूताय विद्महे...) का जप करना चाहिए। 5. तर्पण के समय स्वधा मंत्र का जप क्यों किया जाता है? जिस प्रकार देवताओं को आहुति देते समय स्वाहा कहा जाता है, उसी प्रकार पितरों को तर्पण अर्पित करते समय स्वधा बोलने से उनकी आत्मा पूर्ण रूप से तृप्त होती है। https://trendkia.com/religion/kushagrahani-amavasya-para-pitri-dosha-nivarana-aura-purvajon-ke-ashirvada-ke-lie-japen-ye-4-pavitra-mntra-29774 TrendKia — Har trend, sabse pehle.