# मधुश्रावणी व्रत 2026: इस साल 13 दिनों तक रखा जाएगा व्रत, जानिए इसकी परंपरा और पूजा से जुड़ी खास बातें

> बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में नवविवाहिता महिलाओं द्वारा किए जाने वाले मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत इस साल 3 अगस्त को हुई है और यह 15 अगस्त तक चलेगा। इस बार यह पर्व 13 दिनों का होगा।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-08-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/madhushravani-vrat-2026-13-din-ka-vrat-13444 · **Language:** Hindi
**Tags:** मधुश्रावणी व्रत, मिथिलांचल, सावन 2026, बिहार संस्कृति, सुहाग पर्व, शिव गौरी पूजा

श्रावण मास को महादेव की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम समय माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह महीना भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। इस दौरान शिवालयों में भक्तों का तांता लगा रहता है और जलाभिषेक तथा सोमवार के व्रतों का विशेष महत्व होता है। कई साधु-संत पवित्र नदियों के तट पर डेरा डालकर हठयोग तक करते हैं। इसी पावन महीने में बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में नवविवाहिताएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए मधुश्रावणी का व्रत रखती हैं। इस वर्ष यह अनुष्ठान 3 अगस्त से आरंभ हुआ है और 15 अगस्त को इसका समापन होगा। खास बात यह है कि इस बार मधुश्रावणी व्रत पूरे 13 दिनों का होगा।

## इस प्रकार संपन्न किया जाता है मधुश्रावणी अनुष्ठान
मिथिलांचल अंचल में ब्राह्मण, कर्ण कायस्थ और स्वर्णकार परिवारों में यह पर्व मुख्य रूप से मनाया जाता है। जिन घरों में कन्याओं का नया-नया विवाह होता है, वे नवविवाहिताएं शादी के बाद पड़ने वाले पहले सावन मास में लगभग 14 से 15 दिनों तक विधि-विधान से शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। इस लंबी पूजा के अंतिम दिन महिलाओं को घुटनों पर 'टेमी' दी जाती है। इस प्रक्रिया में नवविवाहिता के घुटनों को अग्नि के संपर्क में लाया जाता है, जो एक प्रकार की अग्नि परीक्षा जैसी होती है। प्राचीन मान्यता है कि घुटने पर जितना बड़ा घाव बनता है, पति की आयु उतनी ही लंबी होती है। हालांकि, समय के साथ अब 'शीतल टेमी' का चलन काफी बढ़ गया है, जिसमें बिना आग के ही यह रस्म पूरी कर ली जाती है। यदि आग का प्रयोग किया भी जाता है, तो केवल घुटने के पास तेल का दीपक लाकर तुरंत हटा लिया जाता है।

## मधुश्रावणी की प्राचीन पृष्ठभूमि और पूजन सामग्री
ऐसी मान्यता है कि इस व्रत की शुरुआत प्राचीन काल में नवविवाहित महिलाओं को उनके नए वैवाहिक जीवन में सामंजस्य और सहजता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। इन दिनों में महिलाएं पारंपरिक दुल्हन के वस्त्र पहनती हैं, आसपास से मौसमी फूल तथा पेड़-पौधों के पत्ते चुनकर बांस की टोकरियों में संभालकर रखती हैं। वे प्रतिदिन भगवान शिव और माता गौरी की पूजा-अर्चना करती हैं। इस अनुष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरी पूजा किसी महिला पुरोहित द्वारा संपन्न कराई जाती है और वही नवविवाहिता को व्रत से जुड़ी कथाएं भी सुनाती हैं। इस दौरान केवल ससुराल पक्ष से भेजी गई पूजन सामग्री का ही उपयोग किया जाता है, और खाने के लिए अनाज भी वहीं से आता है। पूजा के हर दिन के अंत में नवविवाहिता द्वारा अन्य सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री भेंट की जाती है, जिसमें कच्ची पिसी मेहंदी का विशेष महत्व होता है।

## विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा और पर्यावरण का संदेश
मधुश्रावणी व्रत के दौरान नवविवाहिताओं को भगवान शिव और माता गौरी के साथ-साथ नाग देवताओं, सूर्य, चंद्रमा और नवग्रहों की भी पूजा करनी होती है। इस पर्व के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मिलता है। हमारी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में प्रकृति के महत्व को दर्शाने के लिए जूही और मैनी जैसे पौधों को अनुष्ठानों में शामिल किया जाता है। इस पर्व का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि जहां सामान्यतः किसी भी देवी-देवता को बासी फूल अर्पित करना वर्जित माना जाता है, वहीं इस अनुष्ठान के दौरान माता मनसा देवी को ताजे फूलों के स्थान पर बासी फूल ही चढ़ाए जाते हैं। यह पर्व सावन मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होता है और शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को संपन्न होता है।

## कठोर नियम और माता पार्वती से जुड़ी पौराणिक मान्यता
व्रत के इन दिनों में नवविवाहिताएं कई कड़े नियमों का पालन करती हैं। वे पहले दिन जो बाल बांधती हैं, उन्हें अनुष्ठान के अंतिम दिनों तक वैसे ही बंधा रखती हैं। इन दिनों में वे दिन में केवल एक बार और वह भी बिना नमक का भोजन ग्रहण करती हैं। वे बिस्तर की बजाय जमीन पर सोती हैं और सुबह की नियमित पूजा के बाद शाम को भी संध्या वंदन करती हैं। पूजा स्थल यानी कोहवर में कच्ची मिट्टी से बने हाथी, नाग-नागिन और शिव-गौरी की प्रतिमाएं स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें जन्म-जन्मांतर तक भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त होते रहे। इस पूरे मास में नवविवाहिताएं देवाधिदेव महादेव के साथ माता गौरी और नागवंश से अपने पति की लंबी उम्र का वरदान मांगती हैं।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह पर्व देश भर के मिथिला सांस्कृतिक दायरे और वहां के प्रवासियों के बीच पारंपरिक रीति-रिवाजों और पारिवारिक संबंधों के महत्व को रेखांकित करता है।

**बिहार में:** मिथिलांचल क्षेत्र के परिवारों में नवविवाहित महिलाओं के लिए यह 13 दिवसीय कठिन अनुष्ठान और ससुराल से आने वाली सामग्री व खानपान की व्यवस्था स्थानीय परंपराओं को सीधे प्रभावित करती है।

## सवाल-जवाब

### 1. मधुश्रावणी व्रत 2026 की शुरुआत कब से हुई है?
मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत इस साल 3 अगस्त को हुई है और इसका समापन 15 अगस्त को होगा।

### 2. इस बार मधुश्रावणी व्रत कितने दिनों का है?
इस वर्ष मधुश्रावणी व्रत कुल 13 दिनों का किया जा रहा है।

### 3. मधुश्रावणी व्रत मुख्य रूप से कहां मनाया जाता है?
यह व्रत मुख्य रूप से बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में नवविवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।

### 4. इस व्रत के दौरान किनकी पूजा की जाती है?
इस दौरान भगवान शिव, माता गौरी, नाग देवताओं, सूर्य, चंद्रमा और नवग्रहों की पूजा की जाती है।

### 5. टेमी रस्म क्या होती है?
यह अनुष्ठान का अंतिम चरण है जिसमें नवविवाहिता के घुटनों को अग्नि के संपर्क में लाया जाता है, हालांकि अब शीतल टेमी का चलन अधिक है।

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