# महालया अमावस्या पर पितरों की मुक्ति के दो पावन धाम, परशुराम कुंड और प्रिंसेप घाट का आध्यात्मिक महत्व

> पितृ पक्ष के समापन पर महालया अमावस्या के पावन अवसर पर अरुणाचल प्रदेश के परशुराम कुंड और कोलकाता के हुगली तट स्थित प्रिंसेप घाट पर विशेष तर्पण और पिंडदान की गहरी परंपरा है।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/mahalaya-amavasya-para-pitaron-ki-mukti-ke-do-pavana-dhama-parshuram-kund-aura-princep-ghat-ka-adhyatmika-mahatva-42986 · **Language:** Hindi
**Tags:** पितृ पक्ष, महालया अमावस्या, परशुराम कुंड, प्रिंसेप घाट, पिंडदान, तर्पण, अरुणाचल प्रदेश, कोलकाता

हिंदू आध्यात्मिक परंपरा में पितृ पक्ष की सोलह तिथियों को दिवंगत पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मिक समर्पण का सबसे विशिष्ट कालखंड स्वीकार किया गया है। इन सोलह दिनों में परिवारजन अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी मुक्ति की कामना करते हुए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे वैदिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। धार्मिक ग्रंथों में यह विश्वास दृढ़ है कि इस अवधि में श्रद्धापूर्वक अर्पित किया गया जल, तिल और अन्न सीधे पितरों तक पहुंचता है तथा उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है। देश के विभिन्न अंचलों में पिंडदान के अनेक तीर्थ विख्यात हैं, परंतु पूर्वोत्तर भारत में अरुणाचल प्रदेश का परशुराम कुंड और पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का प्रिंसेप घाट अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक महिमा के कारण सबसे अलग पहचान रखते हैं। पितृ पक्ष की अंतिम तिथि अर्थात महालया अमावस्या पर इन दोनों तीर्थों में पिंडदान, ब्राह्मण भोज और तिलोदक अर्पण करने से पूर्वजों को जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है।

## परशुराम कुंड का पौराणिक आख्यान और मातृ हत्या के दोष से मुक्ति
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में कलकल बहती लोहित नदी के तट पर स्थित परशुराम कुंड हिंदू आस्था का एक अत्यंत पूजनीय केंद्र है। इस दिव्य कुंड का सीधा संबंध भगवान श्रीहरि विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों में उल्लेख मिलता है कि भगवान परशुराम ने अपने पिता महर्षि जमदग्नि के कठोर आदेश का पालन करते हुए अपनी माता रेणुका का वध कर दिया था। पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर किए गए इस कृत्य के उपरांत महर्षि जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा, जिससे उनकी माता पुनः जीवित हो गईं और परशुराम को अद्वितीय पितृ-भक्ति का आशीर्वाद भी मिला। इस सबके बावजूद एक पुत्र पर अपनी जननी के वध का भयंकर पाप लग गया।

इस घोर पाप के प्रभाव स्वरूप भगवान परशुराम के हाथ से उनका परशु अर्थात कुल्हाड़ी चिपक गई और अनेक प्रयत्नों के बाद भी अलग नहीं हुई। इस पश्चाताप और अभिशाप से मुक्ति पाने के लिए वे समूचे आर्यावर्त के समस्त तीर्थों, नदियों और सरोवरों में भ्रमण करते रहे। जब वे भटकते हुए लोहित नदी के इस पावन तट पर बने कुंड में पहुंचे और वहां के पवित्र जल में डुबकी लगाई, तब चमत्कारिक रूप से उनके हाथ से वह कुल्हाड़ी अलग होकर गिर गई और वे मातृ-हत्या के घोर पाप से पूरी तरह मुक्त हो गए। यही कारण है कि इस कुंड को माता-पिता तथा पूर्वजों से जुड़े अत्यंत गंभीर दोषों, पापों और ऋणों से निवृत्ति पाने का सबसे फलदायी तीर्थ माना जाता है।

## परशुराम कुंड के दिव्य जल की महिमा और मकर संक्रांति का महाकुंभ
धार्मिक मान्यताओं में परशुराम कुंड के प्रवाहमान जल को अत्यंत दिव्य, पवित्र और पापनाशक माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों के कल्याण के लिए यहां पहुंचते हैं और श्राद्ध, पिंडदान तथा तर्पण की विधियां संपन्न करते हैं। जनमानस में यह अटूट विश्वास है कि लोहित नदी के इस पवित्र कुंड में तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा को असीम शांति प्राप्त होती है और वे मोक्षधाम को प्राप्त करते हैं। हालांकि पूरे वर्ष श्रद्धालु इस पावन कुंड में दर्शन और स्नान के लिए आते रहते हैं, लेकिन मकर संक्रांति के अवसर पर यहां पूर्वोत्तर का सबसे विशाल मेला आयोजित होता है। उस समय भारत के कोने-कोने के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी लाखों श्रद्धालु इस पावन जल में डुबकी लगाकर पुण्य अर्जित करते हैं।

## कोलकाता के प्रिंसेप घाट पर हुगली के पावन तट पर तर्पण की परंपरा
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हुगली नदी के तट पर बसा प्रिंसेप घाट और आसपास के अन्य ऐतिहासिक घाट पितृ तर्पण के लिए अत्यंत प्रतिष्ठित माने जाते हैं। हुगली नदी वस्तुतः मां गंगा की ही एक पवित्र धारा है, जिसके कारण इसके पावन तट पर किया गया कोई भी धार्मिक कर्म, पिंडदान अथवा तर्पण अमोघ फलदायी सिद्ध होता है। पितृ पक्ष के पूरे सोलह दिनों में यहां हजारों की संख्या में भक्तगण अपने पूर्वजों की स्मृति में एकत्र होते हैं, परंतु इस संपूर्ण अनुष्ठान का सबसे निर्णायक और आध्यात्मिक दिन पितृ पक्ष की अंतिम तिथि अर्थात महालया अमावस्या का होता है। इस दिन भोर की पहली किरण फूटने से पहले ही हुगली के सभी घाटों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है और समूचा वातावरण आस्था के रंग में रंग जाता है।

## चंडीपाठ की गूंज और पितृ पक्ष से देवी पक्ष का पावन संधिकाल
महालया अमावस्या के दिन नदी तटों पर स्थापित लाउडस्पीकरों से गूंजती ‘महिषासुरमर्दिनी’ के विख्यात चंडीपाठ के स्वर समूचे माहौल को भक्तिमय बना देते हैं। श्रद्धालु घुटनों तक हुगली नदी के पवित्र जल में खड़े होकर हाथ में कुश, काले तिल, गंगाजल और श्वेत पुष्प लेकर अपने पितरों को तर्पण अर्पित करते हैं और तिलोदक देते हैं। यह पावन क्षण केवल पितरों की विदाई का ही नहीं, बल्कि पितृ पक्ष की पूर्णता और देवी पक्ष अर्थात शारदीय दुर्गा पूजा के भव्य आगमन का संधिकाल भी होता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रिंसेप घाट के अतिरिक्त बागबाजार घाट, निमतला घाट तथा हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर विशेष प्रशासनिक प्रबंध किए जाते हैं। इन घाटों पर उमड़ता जनसमुद्र एक ओर जहां पूर्वजों के प्रति अनन्य श्रद्धा और मोक्ष की मंगलकामना को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति की उस गहरी कृतज्ञता भावना को भी प्रकट करता है जो पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधती है।

## इसका आप पर असर
महालया अमावस्या पर इन तीर्थों के आध्यात्मिक महत्व को समझने से श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के निमित्त सही स्थान और विधि के चयन में स्पष्टता मिलती है।

- **पूर्वोत्तर और बंगाल के तीर्थयात्रियों के लिए:** स्थानीय स्तर पर अनुष्ठान करने वाले श्रद्धालुओं को प्रशासन द्वारा निर्धारित समय और घाटों की व्यवस्था का पालन करना होगा। इससे नदी तटों पर भीड़ नियंत्रण और सुरक्षित रूप से तर्पण संपन्न कराने में मदद मिलती है।
- **देशभर के श्रद्धालुओं के लिए:** जो लोग पितृ दोष से मुक्ति या विशेष तर्पण की योजना बना रहे हैं, वे इन सिद्ध स्थलों की यात्रा का कार्यक्रम तय कर सकते हैं। महालया के पावन दिन पर तर्पण करने से पितरों की तृप्ति और आत्मिक शांति का संकल्प पूरा होता है।
- **दैनिक पूजा और सामग्री का प्रबंध:** नदी तट पर तर्पण के लिए कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूल जैसी परंपरागत सामग्रियों की आवश्यकता होती है। अनुष्ठान स्थल पर जाने से पूर्व इन आवश्यक पूजन सामग्रियों की व्यवस्था समय से कर लेनी चाहिए।
- **उत्सव और आस्था का संधिकाल:** पितृ पक्ष की समाप्ति के तुरंत बाद शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का शुभारंभ होता है। इस बदलाव के साथ ही श्रद्धालु पितृ विसर्जन के पश्चात देवी उपासना की तैयारी में जुट जाते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
महालया अमावस्या के अवसर पर परशुराम कुंड और प्रिंसेप घाट पर श्रद्धालुओं के भारी जमावड़े के पीछे सदियों पुरानी पौराणिक घटनाएं और धार्मिक परंपराएं मुख्य कारण हैं।

- **पौराणिक पापमुक्ति की ऐतिहासिक घटना:** भगवान परशुराम को पिता की आज्ञा पर माता के वध के बाद लगे पाप और हाथ से चिपकी कुल्हाड़ी से मुक्ति इसी कुंड में स्नान के बाद मिली थी। इस दिव्य घटना के कारण यह स्थल पितृ और मातृ दोष निवारण का सर्वोच्च केंद्र बन गया।
- **गंगा की पवित्र धारा की मान्यता:** कोलकाता में बहने वाली हुगली नदी वस्तुतः गंगा नदी की ही मुख्य शाखा मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार गंगाजल में किए गए श्राद्ध और पिंडदान का फल अक्षय और मोक्षदायी होता है।
- **पितृ पक्ष का निर्णायक अंतिम दिन:** महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सोलहवां और अंतिम दिन होता है, जिसे सर्वपितृ मोक्ष तिथि माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनका तर्पण भी इसी दिन किए जाने का विधान है।
- **सांस्कृतिक और भक्तिमय परिवेश:** बंगाल में महालया की सुबह लाउडस्पीकर पर बजने वाले चंडीपाठ के साथ देवी के आह्वान की परंपरा जुड़ी हुई है। इस आध्यात्मिक वातावरण के चलते तड़के से ही हुगली के तटों पर लाखों श्रद्धालु स्वतः खिंचे चले आते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. परशुराम कुंड किस राज्य और जिले में स्थित है?
परशुराम कुंड पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश राज्य के लोहित जिले में लोहित नदी के तट पर स्थित है।

### 2. भगवान परशुराम को मातृ-हत्या के पाप से मुक्ति कैसे मिली थी?
समस्त तीर्थों में भ्रमण के बाद जब भगवान परशुराम ने लोहित नदी के इस कुंड में स्नान किया, तब उनके हाथ से चिपकी कुल्हाड़ी अलग हो गई और उन्हें पाप से मुक्ति मिली।

### 3. परशुराम कुंड में सबसे बड़ा धार्मिक मेला कब आयोजित होता है?
परशुराम कुंड में सबसे बड़ा वार्षिक मेला मकर संक्रांति के पावन अवसर पर आयोजित होता है, जिसमें भारत और नेपाल से लाखों श्रद्धालु आते हैं।

### 4. कोलकाता के प्रिंसेप घाट पर पिंडदान का क्या विशेष महत्व है?
प्रिंसेप घाट हुगली नदी के तट पर स्थित है जो गंगा की ही एक धारा है, इसलिए यहां महालया अमावस्या पर किया गया पिंडदान पितरों को मोक्ष प्रदान करता है।

### 5. महालया अमावस्या पर तर्पण के दौरान कौन सी पूजन सामग्री अर्पित की जाती है?
श्रद्धालु घुटनों तक नदी के जल में खड़े होकर कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूलों के साथ अपने पूर्वजों को तिलोदक अर्पित करते हैं।

### 6. कोलकाता में प्रिंसेप घाट के अलावा किन अन्य घाटों पर विशेष व्यवस्था की जाती है?
प्रिंसेप घाट के साथ-साथ बागबाजार घाट, निमतला घाट और हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर भी प्रशासन द्वारा विशेष प्रबंध किए जाते हैं।

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