मशहद में 9 जुलाई को सुपुर्द-ए-खाक होंगे आयतुल्ला अली खामेनेई, समझिए इस्लाम में जनाजे की हर रस्म ईरान के आयतुल्ला अली खामेनेई की आखिरी रस्में आज तेहरान से शुरू होकर कुम से होते हुए 9 जुलाई को मशहद में सुपुर्द-ए-खाक के साथ पूरी होंगी। जानिए इस्लाम में जनाजे और दफन की हर रस्म की पूरी जानकारी। ईरान के रहबर-ए-आला माने जाने वाले मरहूम आयतुल्ला अली खामेनेई की आखिरी रस्में आज से शुरू हो रही हैं। पूरी दुनिया की नजरें तेहरान पर टिकी हुई हैं, क्योंकि वहां लाखों लोगों के जमा होने की उम्मीद जताई जा रही है। ईरानी हुकूमत ने इस मौके पर कई दिनों तक चलने वाले जनाजे के पूरे कार्यक्रम का ऐलान कर दिया है, जिसमें शहर दर शहर अलग-अलग रस्में अदा की जाएंगी। तेहरान से कुम होते हुए मशहद तक जाएगा जनाजा इस पूरे कार्यक्रम की शुरुआत तेहरान से होगी, जहां सबसे पहले जनाजे की नमाज अदा की जाएगी। यहीं आम लोगों को मरहूम आयतुल्ला अली खामेनेई का आखिरी दीदार करने का मौका भी मिलेगा। तेहरान की रस्मों के बाद यह सिलसिला कुम पहुंचेगा, जहां मजहबी मरासिम अंजाम दिए जाएंगे। इसके बाद आखिरी पड़ाव मशहद होगा, जहां 9 जुलाई को उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। आयतुल्ला अली खामेनेई की रुख्सती सिर्फ ईरान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया के लिए एक बड़ा और अहम वाकिया बन चुकी है। यही वजह है कि इन दिनों बहुत से लोगों के जेहन में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर सुपुर्द-ए-खाक होता क्या है और इस्लाम में इस रस्म को किस तरीके से अंजाम दिया जाता है। सुपुर्द-ए-खाक का असल मतलब क्या है सुपुर्द-ए-खाक दरअसल फारसी और उर्दू जबान का लफ्ज है, जिसका शाब्दिक मतलब है मिट्टी के हवाले करना। इस्लाम में किसी इंसान के इंतकाल के बाद उसके जिस्म को पूरे एहतराम और अदब के साथ दफ्न करने की रस्म को ही सुपुर्द-ए-खाक कहा जाता है। मुस्लिम समाज में इसे महज एक आखिरी विदाई की रस्म भर नहीं माना जाता, बल्कि यह हर मुसलमान पर एक मजहबी फर्ज भी माना गया है, जिसे निभाना जरूरी समझा जाता है। पहला कदम गुस्ल, यानी जिस्म को पाक करने की रस्म किसी मुसलमान के इंतकाल के बाद सबसे पहला काम होता है उसके जिस्म को शरीअत के मुताबिक पाक करना, जिसे गुस्ल कहा जाता है। इस अमल में साफ पानी से मरहूम के पूरे जिस्म को धोया जाता है, ताकि उन्हें पाक हालत में अल्लाह के हुजूर पेश किया जा सके। यह नाजुक जिम्मेदारी ज्यादातर घर के करीबी लोग ही निभाते हैं, या फिर ऐसे तजुर्बेकार लोगों को बुलाया जाता है जिन्हें इस काम का पहले से अनुभव हो। कफन, अमीर हो या गरीब सबके लिए एक जैसा उसूल गुस्ल पूरा होने के बाद मरहूम को सादे सफेद कपड़े में लपेटा जाता है, जिसे कफन कहा जाता है। इस्लाम में सादगी पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया है, इसीलिए कफन में किसी भी तरह की सजावट या दिखावे की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। यह उसूल अमीर और गरीब, दोनों तरह के लोगों के लिए बिल्कुल बराबर लागू होता है, यानी दफन के वक्त किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सलात-उल-जनाजा, बिना रुकू और सज्दे वाली अलग नमाज कफन पहनाने के बाद मरहूम को मस्जिद, ईदगाह या किसी खुले मैदान में ले जाया जाता है, जहां सलात-उल-जनाजा यानी जनाजे की नमाज अदा की जाती है। इस नमाज में मरहूम की मगफिरत, यानी उनके गुनाहों की माफी, उन पर अल्लाह की रहमत और जन्नत में आला मकाम मिलने के लिए दुआ मांगी जाती है। खास बात यह है कि जनाजे की नमाज बाकी सभी नमाजों से बिल्कुल अलग होती है, क्योंकि इसमें आम नमाजों की तरह रुकू और सज्दा नहीं किया जाता। कब्रिस्तान की आखिरी रस्में और मिट्टी की तीन मुट्ठी जनाजे की नमाज पूरी होने के बाद मरहूम को कब्रिस्तान ले जाया जाता है। इस्लाम में यह कोशिश की जाती है कि इंतकाल के बाद जितनी जल्दी मुमकिन हो, दफन की रस्म पूरी कर ली जाए। इसके लिए कब्र पहले से ही तैयार करके रखी जाती है। मरहूम को आमतौर पर दाहिनी करवट इस तरह लिटाया जाता है कि उनका चेहरा किबला, यानी मक्का शरीफ की तरफ रहे। इसके बाद कब्र को मिट्टी से भर दिया जाता है। कई जगहों पर वहां मौजूद लोग भी अपनी तरफ से तीन मुट्ठी मिट्टी कब्र में डालते हैं और मरहूम के लिए मगफिरत की दुआ करते हैं। इस्लाम में कब्र को हमेशा सादा और साधारण रखना ही बेहतर माना गया है, ताकि कब्र भी कफन की तरह किसी दिखावे से दूर रहे। सुपुर्द-ए-खाक के बाद तीन दिन तक चलती है ताजियत सुपुर्द-ए-खाक की रस्म पूरी होने के बाद घर वाले, रिश्तेदार और करीबी लोग मरहूम के लिए दुआ करते हैं। इसी के साथ ताजियत, यानी सांत्वना देने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। इसमें लोग परिवार के घर पहुंचकर अहल-ए-खाना, यानी घर के सदस्यों को सब्र की तालीम देते हैं और मरहूम की मगफिरत के लिए दुआ करते हैं। आमतौर पर यह ताजियत का सिलसिला तीन दिन तक चलता है, जिसके दौरान लोग बारी-बारी से परिवार से मिलने पहुंचते रहते हैं। इसका आप पर असर यह खबर सीधे तौर पर किसी की जेब या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर नहीं डालती, लेकिन इसका महत्व अलग तरह का है। • मुस्लिम समुदाय के लिए: यह लेख सुपुर्द-ए-खाक जैसी इस्लामी रस्मों को समझने में मदद करता है, जिन्हें हर मुसलमान के लिए मजहबी तौर पर अहम माना जाता है। • ईरान की घटनाओं पर नजर रखने वालों के लिए: तेहरान, कुम और मशहद में होने वाले कार्यक्रम की तारीखें और शहर बताते हैं कि अगले कुछ दिनों में वहां क्या-क्या होने वाला है। सवाल-जवाब 1. सुपुर्द-ए-खाक में फूल चढ़ाने की क्या रिवायत है? इस्लाम की बुनियादी रस्मों में फूल चढ़ाना शामिल नहीं है, लेकिन कई मुस्लिम मुल्कों में लोग मोहब्बत और एहतराम जताने के लिए कब्र पर फूल या गुलाब की पंखुड़ियां रखते हैं, और इसे ज्यादातर स्थानीय रिवायत माना जाता है। 2. सुपुर्द-ए-खाक के वक्त कब्र में कौन उतर सकता है? आम तौर पर मरहूम का बेटा, भाई, पिता या कोई और महरम रिश्तेदार कब्र में उतरता है, और अगर यह मुमकिन न हो तो कब्रिस्तान के तजुर्बेकार लोग या दफन की रस्म अंजाम देने वाले लोग यह जिम्मेदारी निभाते हैं। 3. क्या सुपुर्द-ए-खाक रात के वक्त भी किया जा सकता है? हां, इस्लामी तालीमात के मुताबिक जरूरत पड़ने पर रात में भी सुपुर्द-ए-खाक किया जा सकता है, हालांकि जहां मुमकिन हो वहां दिन के वक्त दफन को बेहतर माना जाता है ताकि सारी रस्में आराम से पूरी हो सकें। 4. सुपुर्द-ए-खाक के बाद कब्र पर जाने की कोई तय मुद्दत होती है? नहीं, इस्लाम में कब्र पर जियारत के लिए कोई तय दिन या मुद्दत मुकर्रर नहीं है, लोग किसी भी वक्त मरहूम के लिए दुआ करने और कुरआन की तिलावत करने के इरादे से कब्रिस्तान जा सकते हैं। https://trendkia.com/religion/mashhad-men-9-julai-ko-supurda-e-khaka-honge-ayatollah-ali-khamenei-samajhie-islam-men-janaje-ki-hara-rasma-4255 TrendKia — Har trend, sabse pehle.