दुर्गा सप्तशती पाठ के जरूरी नियम, महाअष्टमी और महानवमी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान नवरात्र के आखिरी दिनों में महाअष्टमी और महानवमी के मौके पर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के कुछ खास नियम और सावधानियां बताई गई हैं। नवरात्र का पावन पर्व अब अपने अंतिम चरणों की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में महाअष्टमी और महानवमी की पूजा की तैयारियां घरों में शुरू हो चुकी हैं। इस विशेष अवधि में कई घरों में महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी की तिथियों पर विधि-विधान से चंडी पाठ करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र ग्रंथ का नियमित पठन करने से जीवन की तमाम परेशानियों से राहत मिलती है और ज्योतिषीय ग्रहों के बुरे प्रभावों में भी काफी कमी आती है। इस अनुष्ठान से घर के आस-पास का वातावरण पूरी तरह सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है और हर कार्य में सफलता हासिल होती है। हालांकि, इन प्रमुख तिथियों पर जब यह पाठ किया जाता है, तो कुछ खास दिशा-निर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि यह कोई साधारण साधना नहीं है। इस ग्रंथ में कई शक्तिशाली सिद्ध मंत्र भी समाहित हैं, जिनका उच्चारण करते समय विशेष सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। चंडी पाठ की संरचना और कुल अध्याय चंडी पाठ को दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य के नाम से भी जाना जाता है, जो प्राचीन मार्कंडेय पुराण का एक प्रमुख हिस्सा है। इस ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी और इसमें कुल 13 अध्याय तथा 700 श्लोक मौजूद हैं। संस्कृत के शब्दों के अनुसार सप्त का मतलब सात और शत का मतलब सौ होता है, इसलिए इसे सप्तशती कहा जाता है। इस महान ग्रंथ में महिषासुर जैसे शक्तिशाली राक्षसों पर माता दुर्गा की ऐतिहासिक विजय का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस अनुष्ठान को सही तरीके से पूरा करने के लिए कुछ विशेष विधियों का पालन किया जाता है, जिन्हें त्र्यंगम और नवांगम के रूप में जाना जाता है। इन्हें श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार नवरात्र के दौरान या फिर एक, तीन अथवा सात बैठकों में पूरा करते हैं। पाठ संपन्न करने की प्रमुख विधियां दुर्गा सप्तशती का पठन हमेशा पूरी शुचिता और पारंपरिक विधि-विधान के साथ किया जाना चाहिए। भक्त अपनी सुविधा, समय और उपलब्ध अवसर के अनुसार इसे या तो एक ही दिन में या फिर पूरे नौ दिनों के भीतर पूरा कर सकते हैं। यदि कोई साधक एक ही बार में पूरे ग्रंथ का पाठ करना चाहता है, तो उसे त्र्यंगम या नवांगम पद्धति का सहारा लेना चाहिए। इस पवित्र पाठ को शुरू करने से पहले पूर्व दिशा की ओर एक साफ लाल रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर माता दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति की स्थापना करनी होती है। सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह शुद्ध करें और कुमकुम, चावल तथा फूलों के साथ अपनी प्रार्थना अर्पित करें। इसके बाद अपने माथे पर रोली लगाएं और शरीर व मन की शुद्धि के लिए चार बार आचमन करने की प्रक्रिया पूरी करें। पूजा के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें अनुष्ठान शुरू करने से पहले स्नान करके हमेशा साफ-सुथरे वस्त्र धारण करने चाहिए और मां दुर्गा का मन में ध्यान करते हुए पाठ का शुभारंभ करना चाहिए। पाठ की शुरुआत में सबसे पहले दुर्गा कवच का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि इसके बिना सप्तशती का पठन अधूरा माना जाता है। माता की मूर्ति या तस्वीर के सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और जब नियमित पाठ पूरा हो जाए तो अंत में आरती अवश्य करें। आरती के बाद माता से अपनी अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा याचना मांगनी चाहिए और उन्हें भोग अर्पित करना चाहिए। माता दुर्गा को बताशे का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में सभी में वितरित कर देना चाहिए और घर की सुख-समृद्धि की कामना करनी चाहिए। सप्तशती के शुरुआती अध्यायों का सार दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में मुख्य रूप से दैत्य मधु और कैटभ के वध की कथा का वर्णन किया गया है। इसके बाद दूसरे अध्याय में समस्त देवताओं के तेज पुंज से मां दुर्गा के प्रगट होने और महिषासुर की पूरी सेना के संहार का प्रसंग आता है। तीसरे अध्याय में महिषासुर और उसके प्रमुख सेनापतियों के वध की पूरी कथा विस्तार से बताई गई है, जबकि चौथे अध्याय में इंद्र समेत तमाम देवताओं द्वारा मां की स्तुति का वर्णन है। पांचवें अध्याय में चंड और मुंड द्वारा राक्षस शुम्भ के सामने देवी के अद्भुत सौंदर्य का बखान किया गया है और छठे अध्याय में धुम्रलोचन के वध की घटना का जिक्र है। सातवें अध्याय में चंड और मुंड दोनों के वध का प्रसंग है और आठवें अध्याय में रक्तबीज के संहार की कथा मिलती है। नौवें और दसवें अध्याय में शुम्भ और निशुम्भ के वध का पूरा वृत्तांत है, जबकि ग्यारहवें अध्याय में देवताओं द्वारा देवी की स्तुति और उन्हें मिले वरदानों की जानकारी दी गई है। अंत के बारहवें और तेरहवें अध्याय में देवी के चरित्र की महिमा के साथ वैश्य सुरथ की कथा का वर्णन है, जिन्हें माता से विशेष वरदान प्राप्त हुआ था। तीनों चरित्र और शक्तिशाली मंत्र दुर्गा सप्तशती के कुल 700 श्लोकों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है, जिन्हें प्रथम चरित्र यानी महाकाली, मध्यम चरित्र यानी महालक्ष्मी और उत्तर चरित्र यानी महासरस्वती कहा जाता है। ये तीनों ही उस परम महाशक्ति के मूल रूप हैं, जिनसे नौ अलग-अलग देवियों यानी नवदुर्गा की आराधना की परंपरा को मजबूती मिलती है। इस पाठ के प्रभाव से इंसान के सभी प्रकार के डर, शोक और जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। इस ग्रंथ के अलग-अलग श्लोकों का अपना अलग धार्मिक महत्व है, जिन्हें पढ़ने से भक्तों को मनोवांछित फल मिलते हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत या पारिवारिक सुख के लिए "सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥" मंत्र का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। जीवन में विजय हासिल करने और संकटों से बचने के लिए "ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥" मंत्र का जाप किया जाता है। इसके अलावा नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं से रक्षा के लिए "शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके. घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥" मंत्र एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच तैयार करता है। संसार की सभी बाधाओं को दूर करने के लिए "सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि. एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥" मंत्र का प्रयोग किया जाता है। सवाल-जवाब 1. दुर्गा सप्तशती में कुल कितने अध्याय और श्लोक हैं? दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय और 700 श्लोक मौजूद हैं। 2. चंडी पाठ को अन्य किस नाम से जाना जाता है? चंडी पाठ को दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य भी कहा जाता है। 3. दुर्गा सप्तशती पाठ की शुरुआत किससे करनी चाहिए? पाठ की शुरुआत हमेशा दुर्गा कवच का पाठ करके करनी चाहिए। 4. सप्तशती के श्लोकों को कितने भागों में बांटा गया है? सप्तशती के 700 श्लोकों को प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तर चरित्र नामक तीन भागों में बांटा गया है। https://trendkia.com/religion/navratri-durga-saptashati-rules-mahashtami-aur-mahanavanmi-par-chandi-path-ke-niyam-48061 TrendKia — Har trend, sabse pehle.