पौराणिक कथाओं में दर्ज अमेठी के कालिकन धाम की अनोखी दास्तान, महर्षि च्यवन और सुकन्या की तपोभूमि पर स्थित है चमत्कारी अमृत कुंड अमेठी के भौसिंहपुर गांव में स्थित प्राचीन मां कालिका धाम का नाता महर्षि च्यवन और राजकुमारी सुकन्या की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जहां अमृत कुंड के जल को चमत्कारी माना जाता है। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में संग्रामपुर विकासखंड के तहत भौसिंहपुर गांव स्थित मां कालिका धाम आस्था और ऐतिहासिक विरासत का एक विशेष संगम प्रस्तुत करता है। यह पवित्र स्थल न केवल आम श्रद्धालुओं के लिए अटूट विश्वास का केंद्र है, बल्कि इसका इतिहास वैदिक काल और पौराणिक आख्यानों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। अयोध्या की राजकुमारी सुकन्या और तपस्वी महर्षि च्यवन मुनि के जीवन प्रसंगों से इस क्षेत्र का सीधा संबंध बताया जाता है। मंदिर प्रांगण में मौजूद अमृत कुंड को लेकर मान्यता है कि इसके पवित्र जल के स्पर्श मात्र से जीवन के बड़े से बड़े कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं। यही वजह है कि पूरे साल इस तपोस्थली पर भक्तों का तांता लगा रहता है। घने अरण्य में महर्षि च्यवन की कठोर साधना का केंद्र इस पवित्र स्थान से जुड़ी पौराणिक पृष्ठभूमि लगभग 2000 वर्ष पूर्व के उस दौर में ले जाती है जब यह पूरा इलाका एक सघन जंगल हुआ करता था। उस कालखंड में यह शांत वन क्षेत्र महर्षि च्यवन मुनि की प्रमुख तपोस्थली बना। मुनि इस निर्जन वन में ईश्वरीय चिंतन और कठोर तपस्या में इस हद तक लीन हो गए कि उन्हें अपनी भौतिक देह और आसपास के वातावरण की कोई सुध नहीं रही। समय बीतने के साथ उनकी निश्चल देह पर दीमकों ने अपनी बांबी बना ली। इसी दौरान वन में राजा शर्याति का आगमन हुआ, जिन्हें कथाओं में राजा शरियाद भी कहा गया है। उनके साथ आई उनकी पुत्री राजकुमारी सुकन्या ने कौतूहलवश मिट्टी के ढेर में चमकती दो ज्योति समान बिंदुओं को देखकर एक तिनका चुभो दिया, जो असल में ध्यानमग्न मुनि की आंखें थीं। इस घटना से महर्षि की आंखें फूट गईं और उनका ध्यान भंग हो गया। श्राप, महामारी का प्रकोप और राजकुमारी सुकन्या का समर्पण अचानक हुई इस गंभीर पीड़ा से क्रोधित होकर तपस्वी मुनि ने राजा की पुत्री को श्राप दे दिया। इसके परिणाम स्वरूप राजा की पूरी सेना और प्रजा में अचानक भयंकर महामारी फैल गई। जब राजा को इस अनहोनी के मूल कारण का बोध हुआ तो वे तुरंत मुनि के आश्रम पहुंचे और उनसे करबद्ध होकर क्षमा याचना की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उपस्थित ऋषियों के निर्णय और मार्गदर्शन के आधार पर राजा शर्याति ने अपनी पुत्री सुकन्या का विवाह महर्षि च्यवन से करा दिया ताकि वे आजीवन उनकी सेवा कर सकें। राजकुमारी सुकन्या के समर्पण और सेवाभाव के बाद सैनिकों व प्रजा को उस घातक महामारी से मुक्ति मिली। इसके बाद इस स्थान पर मां कालिका का विधिवत आवाहन किया गया। गंगा और सरयू के मध्य स्थित पवित्र भौगोलिक स्थिति भौगोलिक और आध्यात्मिक दृष्टि से कालिकन के नाम से विख्यात यह सिद्धपीठ एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति में अवस्थित है। यह पावन भूमि उत्तर दिशा में सरयू नदी और दक्षिण दिशा में पवित्र गंगा नदी के बिल्कुल मध्य में स्थित है। दोनों पावन नदियों से समान दूरी पर स्थित होने के कारण ही प्राचीन काल में ऋषियों ने इसे अपनी साधना और तपस्या के लिए चुना था। श्रीमद्भागवत महापुराण के नवें स्कंध के तीसरे अध्याय में इस कथा का विस्तृत विवरण दर्ज है, जहां मां भगवती के चरित्र का प्रारंभिक आख्यान मिलता है। इसके अतिरिक्त देवी पुराण, कालिका पुराण और सुख सागर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों में भी इस स्थान की महत्ता का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। सोम यज्ञ का आयोजन और अश्विन कुमारों को अधिकार इस पवित्र भूमि पर एक ऐतिहासिक सोम यज्ञ का भी आयोजन हुआ था। इस महायज्ञ में देव चिकित्सक अश्विन कुमार उपस्थित हुए थे और उन्हें यज्ञ में उनका विधिवत हिस्सा और धार्मिक अधिकार इसी तपोभूमि पर प्रदान किया गया था। अश्विन कुमारों ने जब इस स्थल पर स्थित कुंड के तट पर मां भगवती की अनन्य भक्ति भाव से आराधना की, तो जगतजननी उनकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुईं। देवी ने स्वयं अमृत कुंड की रक्षा का संकल्प लिया और अपने गणों सहित एक पावन शिला के रूप में वहीं प्रतिष्ठित हो गईं। आज भी मंदिर में मां की यह स्वयंभू पावन प्रतिमा स्थापित है, जिसे दर्शनार्थी साक्षात भगवती का रूप मानकर पूजते हैं। अमृत कुंड के चमत्कारी जल की मान्यताएं और श्रद्धालुओं की आस्था पुरातत्व विभाग के अभिलेखों में धरोहर के रूप में दर्ज इस मंदिर की ख्याति केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों से भी भक्त यहां शीश नवाने पहुंचते हैं। मंदिर के अमृत कुंड के जल को लेकर जनमानस में चमत्कारी विश्वास व्याप्त है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सुबह के समय कुंड के पवित्र नीर को आंखों पर लगाने से दृष्टि संबंधी समस्याएं दूर होती हैं और कई लोगों के चश्मे तक उतर चुके हैं। इसके साथ ही त्वचा संबंधी विकारों और फुंसियों से पीड़ित लोग जब प्रातःकाल इस जल से स्नान करते हैं तो उन्हें चर्मरोगों से राहत मिलती है। भक्तगण अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां टिकरी चढ़ाते हैं और मंदिर परिसर में पीतल के घंटे बांधकर अपनी श्रद्धा निवेदित करते हैं। इसका आप पर असर अमेठी स्थित मां कालिका धाम का धार्मिक और पुरातात्विक महत्व श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों दोनों के लिए व्यावहारिक प्रभाव रखता है। • भारत में: देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक प्रमाणित पौराणिक तीर्थस्थल के रूप में सुलभ है। श्रीमद्भागवत महापुराण और देवी पुराण से जुड़े इस प्राचीन स्थल पर लोग दर्शन के साथ अमृत कुंड के जल का लाभ लेने पहुंच सकते हैं। • अमेठी में: स्थानीय ग्रामीणों और व्यापारियों के लिए यह धाम साल भर निरंतर आजीविका और धार्मिक पर्यटन का बड़ा आधार बना रहता है। मंदिर में होने वाले नियमित पूजन, टिकरी चढ़ाने और घंटे बांधने की परंपराओं से स्थानीय बाजार और परिवहन सेवाओं को सीधा सहारा मिलता है। • स्वास्थ्य संबंधी मान्यता: नेत्र और त्वचा रोगों से ग्रसित लोग सुबह के समय अमृत कुंड के शीतल जल से स्नान और आचमन कर सकते हैं। स्थानीय आस्था के मुताबिक प्रातःकाल कुंड के नीर का नियमित स्पर्श कई तरह की फुंसियों और चर्म विकारों में राहत देता है। • धरोहर संरक्षण: पुरातत्व विभाग द्वारा इसे संरक्षित विरासत में दर्ज किए जाने से इसके मूल ऐतिहासिक स्वरूप की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। इस कदम से मंदिर परिसर और उसके आसपास के प्राकृतिक वातावरण का सुनियोजित विकास संभव हो पाता है। ऐसा क्यों हुआ मां कालिका धाम का धार्मिक और ऐतिहासिक उद्भव महर्षि च्यवन के कठोर तप, राजकुमारी सुकन्या की असावधानी और उसके पश्चात हुए प्रायश्चित की पौराणिक घटनाक्रम पर आधारित है। • तपोस्थली की स्थापना: गंगा और सरयू नदियों के ठीक मध्य स्थित शांत प्राकृतिक परिवेश के कारण महर्षि च्यवन ने इस घने जंगल को अपनी साधना का मुख्य केंद्र बनाया था। इस संतुलित वातावरण ने संतों को दीर्घकालीन निर्बाध तपस्या करने की अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराईं। • आंखें फूटने और श्राप का कारण: ध्यानमग्न महर्षि की देह पर दीमकों का घेरा बन गया था, जिसे साधारण मिट्टी का टीला समझकर राजकुमारी सुकन्या ने तिनका चुभो दिया था। इस अनजाने कृत्य से मुनि की आंखें फूट गईं और उनके क्रोधित होने पर सैनिकों पर महामारी का संकट आ पड़ा। • समर्पण और देवी की स्थापना: राजा शर्याति द्वारा क्षमा याचना करने और सुकन्या का विवाह महर्षि से कराने के बाद देवी कालिका का आवाहन किया गया। बाद में सोम यज्ञ में शामिल हुए अश्विन कुमारों की आराधना से प्रसन्न होकर देवी स्वयं अमृत कुंड पर पाषाण शिला के रूप में स्थापित हो गईं। • आधुनिक प्रमाण: श्रीमद्भागवत के नवें स्कंध के तीसरे अध्याय और देवी पुराण जैसे ग्रंथों में इस पूरी घटना का अभिलेख मौजूद होने के कारण इसे पुरातत्व विभाग ने प्राचीन धरोहर के रूप में मान्यता दी। सवाल-जवाब 1. मां कालिका धाम उत्तर प्रदेश में कहां स्थित है? यह धाम उत्तर प्रदेश के अमेठी जनपद अंतर्गत संग्रामपुर विकासखंड के भौसिंहपुर गांव में स्थित है। 2. इस मंदिर का संबंध किन पौराणिक पात्रों से जुड़ा है? इस मंदिर का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंध अयोध्या की राजकुमारी सुकन्या और महर्षि च्यवन मुनि से जुड़ा हुआ है। 3. मंदिर परिसर में स्थित अमृत कुंड की क्या मान्यता है? मान्यता है कि अमृत कुंड के पवित्र जल के स्पर्श और सुबह के स्नान से दुख-कष्ट दूर होते हैं तथा चर्मरोग व आंखों की समस्याएं ठीक होती हैं। 4. किन प्रमुख धार्मिक ग्रंथों में इस धाम का उल्लेख मिलता है? इस स्थल का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के नवें स्कंध के तीसरे अध्याय, देवी पुराण, कालिका पुराण और सुख सागर में मिलता है। 5. क्या इस मंदिर को किसी सरकारी संस्था द्वारा मान्यता प्राप्त है? हां, इस प्राचीन मंदिर को पुरातत्व विभाग द्वारा एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में दर्ज किया गया है। 6. मां भगवती अमृत कुंड पर किस रूप में विराजमान हैं? मां भगवती अपने गणों सहित अमृत कुंड की रक्षा के लिए एक पवित्र शिला के रूप में साक्षात स्वयंभू रूप में विराजमान हैं। https://trendkia.com/religion/pauranika-kathaon-men-darja-amethi-ke-kalikan-dham-ki-anokhi-dastana-maharshi-chyavana-aura-sukanya-ki-tapobhumi-para-sthita-hai-c-46347 TrendKia — Har trend, sabse pehle.