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  "type": "article",
  "title": "भाद्रपद पूर्णिमा से ऋषि तर्पण के साथ आरंभ हुआ पितृपक्ष, जानिए तिथियां और नियम",
  "summary": "सनातन संस्कृति में पूर्वजों की आराधना का सोलह दिवसीय अनुष्ठान भाद्रपद पूर्णिमा और ऋषि तर्पण के साथ शुरू हो गया है। इसके अगले दिन यानी सत्ताइस सितंबर से पहला श्राद्ध कर्म किया जाएगा।",
  "content": "भारतीय सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का सोलह दिवसीय पवित्र काल आरंभ हो चुका है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर ऋषि तर्पण के साथ इस विशेष अनुष्ठान की नींव रखी जाती है। हालांकि पारंपरिक नियमों के अनुसार पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले अनुष्ठानों की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। इस वर्ष सत्ताइस सितंबर को पहला श्राद्ध कर्म संपन्न किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन सोलह दिनों में पूर्वज अपनी देव योनि से पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने वंशजों से जल व अन्न की कामना रखते हैं।\n\nऋषि तर्पण का महत्व और विधान\nपूर्णिमा के दिन सीधे तौर पर पूर्वजों के लिए नहीं बल्कि सप्तऋषियों के नाम से जल अर्पित किया जाता है। धार्मिक विधान के अनुसार ऋषि तर्पण के बिना पितृ तर्पण कभी भी पूर्ण या सफल नहीं माना जाता है। इस पहले दिन किए जाने वाले अनुष्ठान को किसी नदी, तालाब या प्राकृतिक जलस्रोत के निकट करना उत्तम माना जाता है। यदि आसपास ऐसा कोई जलस्रोत उपलब्ध न हो, तो घर के आंगन या छत पर नल अथवा हैंडपंप के पास बैठकर भी यह विधान पूरा किया जा सकता है। तर्पण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि शरीर पर सिलाई किया हुआ वस्त्र बिल्कुल न हो। स्नान के पश्चात गीले वस्त्रों की स्थिति में ही ऋषि और पितरों के निमित्त जल देने का नियम है। जल अर्पित करते समय हाथ में सफेद पुष्प, काले तिल और कुश रखना अनिवार्य माना गया है। इसके अलावा तर्पण कर्म में केवल सफेद रंग के फूलों का ही उपयोग करना चाहिए, अन्य किसी रंग के पुष्प वर्जित माने गए हैं।\n\nतिथियों की गणना और पूर्णिमा व्रत\nपंचांग के अनुसार इस वर्ष पूर्णिमा तिथि पच्चीस सितंबर की रात ग्यारह बजकर छह मिनट पर शुरू हुई और छब्बीस सितंबर की रात दस बजकर अठारह मिनट तक रही। शास्त्रों के जानकारों के अनुसार जिस शाम को पूर्णिमा तिथि का विस्तार रहता है, उसी दिन व्रत और पूर्णिमा मानी जाती है। इसी कारण छब्बीस सितंबर को ही पूर्णिमा का व्रत रखा गया। रात दस बजकर अठारह मिनट के बाद आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि का प्रवेश हो गया और इसके साथ ही श्राद्ध पक्ष की आधिकारिक शुरुआत मानी गई। प्रतिपदा तिथि का समापन सत्ताइस सितंबर की रात आठ बजकर अट्ठावन मिनट पर होगा। इस प्रकार पूर्वजों की शांति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों की मुख्य श्रृंखला सत्ताइस सितंबर दिन रविवार से आगे बढ़ेगी।\n\nपितृपक्ष की अवधि और पिंडदान का विधान\nपितृपक्ष की पूरी अवधि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक चलती है। इस कालखंड में पूर्वजों की तृप्ति के लिए घरों में विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान और तर्पण किए जाते हैं। पिंडदान का इस पूरे पखवाड़े में अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधान के साथ पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने से समस्त पितृ दोषों से मुक्ति मिल जाती है। श्राद्ध की तिथियों का निर्धारण अंग्रेजी कैलेंडर के आधार पर न होकर पूरी तरह हिंदू पंचांग की तिथियों के अनुसार होता है। जिस हिंदी तिथि पर किसी परिजन का गोवंश या निधन हुआ हो, उसी तिथि पर पितृ पक्ष के दौरान उनका श्राद्ध किया जाता है। यदि किसी को अपने परिजन की मृत्यु की सटीक तिथि ज्ञात न हो, तो स्थानीय पंचांग और परिवार की ज्येष्ठ परंपराओं के अनुसार तिथि तय की जाती है।\n\nदस अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या\nइस सोलह दिवसीय अनुष्ठान का समापन दस अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। यह पितृ पक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु की कोई भी तिथि परिवार के सदस्यों को ज्ञात नहीं होती, उनके निमित्त इसी अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की प्राचीन परंपरा है। यदि किसी कारणवश परिवारजन अपनी निर्धारित तिथि पर श्राद्ध संपन्न नहीं कर पाते हैं, तो वे भी सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर अपने पूर्वजों का तर्पण कर सकते हैं।\n\nदिशा और पूजन सामग्री के विशेष नियम\nश्राद्ध पक्ष के दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुख करके ही पूर्वजों को जल अर्पित किया जाता है। इस संपूर्ण अनुष्ठान में संकल्प, जल तर्पण, पिंडदान, शुद्ध सात्विक भोजन पकाना, तथा गाय, कौवे और कुत्ते के लिए भोजन का अंश अलग निकालना मुख्य रूप से शामिल होता है। जल में काले तिल, जौ और कुशा घास मिलाकर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह रखकर तर्पण देने की परंपरा है। इसके साथ ही प्रत्येक पूर्वज की पुण्यतिथि पर उनके नाम से पिंडदान किया जाता है।\n\nप्रमुख श्राद्ध तिथियों की पूरी सारणी\nइस वर्ष पितृपक्ष के दौरान आने वाली सभी प्रमुख तिथियां इस प्रकार रहेंगी\n\n• 26 सितंबर, शनिवार: इस दिन पूर्णिमा श्राद्ध संपन्न किया गया।\n• 27 सितंबर, रविवार: इस दिन प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।\n• 28 सितंबर, सोमवार: इस दिन द्वितीया तिथि का श्राद्ध रहेगा।\n• 29 सितंबर, मंगलवार: इस दिन तृतीया श्राद्ध और महाभरणी का पर्व रहेगा।\n• 30 सितंबर, बुधवार: इस दिन चतुर्थी और पंचमी तिथि का संयुक्त श्राद्ध रहेगा।\n• 1 अक्टूबर, गुरुवार: इस दिन षष्ठी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।\n• 2 अक्टूबर, शुक्रवार: इस दिन सप्तमी तिथि का श्राद्ध रहेगा।\n• 3 अक्टूबर, शनिवार: इस दिन अष्टमी तिथि का श्राद्ध संपन्न होगा।\n• 4 अक्टूबर, रविवार: इस दिन नवमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।\n• 5 अक्टूबर, सोमवार: इस दिन दशमी तिथि का श्राद्ध रहेगा।\n• 6 अक्टूबर, मंगलवार: इस दिन एकादशी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।\n• 7 अक्टूबर, बुधवार: इस दिन द्वादशी और मघा श्राद्ध दोनों रहेंगे।\n• 8 अक्टूबर, गुरुवार: इस दिन त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।\n• 9 अक्टूबर, शुक्रवार: इस दिन चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध रहेगा।\n• 10 अक्टूबर, शनिवार: इस दिन सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा।\n\nइसका आप पर असर\nपितृपक्ष के दौरान सनातन परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने वाले परिवारों की दैनिक दिनचर्या में विशेष बदलाव आता है। इस अवधि में लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में तर्पण, पिंडदान और विशेष सात्विक भोजन की व्यवस्था करते हैं।\n\n• भारत में: देश भर में सनातन अनुयायी इस सोलह दिवसीय कालखंड के दौरान अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि में लोग अपने घरों में सात्विक भोजन पकाते हैं और ब्राह्मण भोज व दान-पुण्य करते हैं।\n• धार्मिक नियम: इस अवधि में बाल और नाखून कटवाने तथा नए वस्त्र या आभूषण खरीदने जैसे मांगलिक कार्यों को वर्जित माना जाता है। लोग अपने दैनिक खानपान में भी सात्विकता और अनुशासन बनाए रखते हैं।\n• पारिवारिक परंपरा: प्रत्येक परिवार अपने पारंपरिक पंचांग और पूर्वजों की तिथि के अनुसार तर्पण और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करता है। इससे पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जुड़ाव मजबूत होता है।\n• दान और परोपकार: इन दिनों गाय, कौवे, कुत्ते और जरूरतमंदों के लिए भोजन का अंश अलग निकाला जाता है। इससे समाज में गरीबों और बेसहारा जीवों के प्रति सेवा भाव को बढ़ावा मिलता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपितृपक्ष और ऋषि तर्पण का यह विधान प्राचीन सनातन वैदिक परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। इन धार्मिक अनुष्ठानों का मुख्य उद्देश्य अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करना और उनके ऋण से मुक्त होना है।\n\n• ऋषि तर्पण की अनिवार्यता: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सप्तऋषियों के आशीर्वाद के बिना पितरों का तर्पण पूर्ण नहीं माना जाता है, इसलिए पूर्णिमा के दिन सबसे पहले ऋषियों का स्मरण किया जाता है।\n• वंशजों का कर्तव्य: धार्मिक विश्वास के अनुसार पितृ लोक से आत्माएं इस अवधि में अपने वंशजों के बीच आती हैं और जल व अन्न ग्रहण करने की अपेक्षा रखती हैं।\n• पितृ दोष मुक्ति: विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण करने से जन्मकुंडली में मौजूद पितृ दोष शांत होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।\n• तिथि निर्धारण का आधार: अंग्रेजी कैलेंडर के बजाय चंद्र मास और पंचांग की तिथियों का पालन करने से यह सुनिश्चित होता है कि अनुष्ठान सटीक खगोलीय और धार्मिक समय पर हो।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पितृपक्ष की शुरुआत कब से हुई है?\nपितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा और ऋषि तर्पण के साथ हुई है, जबकि पहला श्राद्ध सत्ताइस सितंबर को होगा।\n\n2. भाद्रपद पूर्णिमा पर किसका तर्पण किया जाता है?\nभाद्रपद पूर्णिमा के दिन पूर्वजों के बजाय सप्तऋषियों के नाम का तर्पण किया जाता है।\n\n3. पहला श्राद्ध कर्म किस तिथि को किया जाएगा?\nपहला श्राद्ध कर्म आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि यानी सत्ताइस सितंबर को किया जाएगा।\n\n4. पितृपक्ष का समापन कब होगा?\nपितृपक्ष का समापन दस अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा।\n\n5. तर्पण के समय किस रंग के फूलों का प्रयोग करना चाहिए?\nतर्पण के समय केवल सफेद रंग के फूलों का प्रयोग करना चाहिए, अन्य रंगों के फूल वर्जित हैं।\n\n6. श्राद्ध की तिथियां किस आधार पर तय होती हैं?\nश्राद्ध की तिथियां अंग्रेजी कैलेंडर के बजाय हिंदू पंचांग और परिजनों की मृत्यु की तिथि के आधार पर तय की जाती हैं।",
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  "category": "धर्म",
  "publishedAt": "2026-09-26",
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