पुरी जगन्नाथ मंदिर में विग्रहों के 'सुना बेशा' के लिए बनेंगे नए सोने के आभूषण, प्रबंध समिति ने दी मंजूरी पुरी के प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के 'सुना बेशा' श्रृंगार के लिए सोने के नए आभूषण तैयार किए जाएंगे। मंदिर प्रबंध समिति की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है, जिसके लिए रत्न भंडार की 3D मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्ड का उपयोग किया जाएगा। ओडिशा के पुरी स्थित प्रसिद्ध 12वीं सदी के श्री जगन्नाथ मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के विशेष 'सुना बेशा' श्रृंगार के लिए सोने के आभूषणों का एक नया सेट तैयार किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव को श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति ने अपनी हालिया बैठक में मंजूरी दे दी है। गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि सदियों पुरानी परंपरा को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए इन दिव्य आभूषणों का एक अतिरिक्त सेट बनाना आवश्यक है। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के मुख्य प्रशासक अरविंद पाढ़ी ने इस फैसले की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि इस कार्य को पूरी तरह पारंपरिक और पारदर्शी तरीके से संपन्न किया जाएगा। अत्याधुनिक तकनीक से सुरक्षित रखा गया है आभूषणों का मूल स्वरूप नए आभूषणों के निर्माण में पारंपरिक डिजाइनों की शुद्धता और उनके मूल आकार को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मंदिर प्रशासन के लिए इस कार्य को करना आसान होगा क्योंकि उनके पास पहले से ही सभी आभूषणों के विस्तृत विवरण और नक्शे उपलब्ध हैं। हाल ही में जब रत्न भंडार के भीतर रखे बहुमूल्य सामानों की सूची तैयार करने का काम चल रहा था, तब सभी आभूषणों की गहन वीडियोग्राफी कराई गई थी। इसके साथ ही, अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए इन आभूषणों की 3D मैपिंग भी की गई थी। इस पूरी प्रक्रिया में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के 'सुना बेशा' के दौरान पहने जाने वाले आभूषणों को भी शामिल किया गया था। इस डिजिटल दस्तावेज के तैयार होने से आभूषणों के आकार, उनकी नक्काशी, वजन और उनके धार्मिक महत्व की हर एक छोटी जानकारी सुरक्षित हो गई है। इसी रिकॉर्ड के आधार पर नए गहनों का निर्माण कराया जाएगा ताकि वे बिल्कुल मूल आभूषणों की तरह ही दिखें। विशेषज्ञ स्वर्णकारों की टीम और दानदाताओं का सहयोग इस भव्य और धार्मिक कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए मंदिर प्रशासन एक विशेष तकनीकी समिति का गठन करने जा रहा है। यह समिति पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगी और इसके कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी। समिति का मुख्य काम देश के सबसे अनुभवी और कुशल स्वर्णकारों का चयन करना होगा, जो देवताओं के इन पवित्र आभूषणों को उनकी गरिमा के अनुकूल आकार दे सकें। जहां तक इस परियोजना के बजट का सवाल है, मंदिर प्रशासन अपने स्वयं के वित्तीय संसाधनों से इस खर्च को वहन करने के लिए तैयार है। हालांकि, इसके साथ ही देश-विदेश के श्रद्धालुओं और इच्छुक संगठनों को भी इस नेक काम में योगदान देने का अवसर दिया जाएगा। मंदिर प्रशासन ने निर्णय लिया है कि जो भी व्यक्ति या संस्था इस विशेष कार्य के लिए स्वेच्छा से दान देना चाहते हैं, उनसे सहयोग स्वीकार किया जाएगा। क्या है 'सुना बेशा' की महिमा और इसका समृद्ध इतिहास 'सुना बेशा' भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहनों का सबसे भव्य और आकर्षक अनुष्ठान माना जाता है, जिसमें तीनों विग्रहों को सोने के भारी-भरकम आभूषणों से पूरी तरह सजाया जाता है। यह दिव्य श्रृंगार वर्ष में पांच विशेष अवसरों पर आयोजित किया जाता है। इनमें से चार बार यह धार्मिक अनुष्ठान मंदिर के गर्भगृह के भीतर आयोजित होता है, जबकि वर्ष में एक बार इसे रथों के ऊपर भव्य रूप से संपन्न किया जाता है। जिन पांच अवसरों पर यह आयोजन होता है, उनमें जुलाई महीने में होने वाली रथयात्रा के बाद की बहुदा एकादशी शामिल है, जब तीनों भगवान रथों पर विराजमान होते हैं। इसके अलावा जनवरी में पौष पूर्णिमा, अक्टूबर में दशहरा, नवंबर में कार्तिक पूर्णिमा और मार्च में डोला पूर्णिमा के पावन अवसरों पर श्रद्धालु भगवान के इस अनुपम रूप के दर्शन करते हैं। मंदिर के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1460 में गजपति राजवंश के महान राजा कपिलेंद्र देव के शासनकाल के दौरान हुई थी। नए आभूषणों के निर्माण का मुख्य उद्देश्य इस सदियों पुराने अनुष्ठान के लिए आभूषणों का एक वैकल्पिक सेट तैयार रखना है, ताकि मूल आभूषणों के ऐतिहासिक और धार्मिक मूल्य से कोई समझौता किए बिना इस परंपरा को अनंत काल तक सुरक्षित रखा जा सके। इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक निर्णय से जगन्नाथ संस्कृति से जुड़े लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था मजबूत होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस परंपरा को बिना किसी व्यवधान के सहेज कर रखा जा सकेगा। • श्रद्धालुओं के लिए: भगवान के दिव्य और भव्य सोने के रूप के दर्शन अब और भी अधिक नियमित तथा सुचारू रूप से हो सकेंगे। मूल आभूषणों के पुराने होने या खराब होने की स्थिति में भी यह नई व्यवस्था अनुष्ठानों को जारी रखेगी। • दानदाताओं के लिए अवसर: देश-विदेश के श्रद्धालु और संस्थाएं इस पावन कार्य में सीधे तौर पर सोने या वित्तीय सहायता के रूप में अपना योगदान दे सकते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा इसके लिए पारदर्शी दान प्रक्रिया शुरू की जाएगी। • विरासत का संरक्षण: नई तकनीक और डिजिटल मैपिंग के माध्यम से सदियों पुरानी नक्काशी और डिजाइनों को सुरक्षित कर लिया गया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य में भी कलाकृतियों का मूल स्वरूप कभी नष्ट नहीं होगा। ऐसा क्यों हुआ यह निर्णय मंदिर के आभूषणों के ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखने और अत्यधिक उपयोग के कारण होने वाली संभावित क्षति से मूल आभूषणों को बचाने के लिए लिया गया है। इसके अलावा, हाल ही में हुई प्रशासनिक और तकनीकी प्रगति ने भी इस प्रक्रिया को आसान बना दिया है। • वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था: 'सुना बेशा' के दौरान भारी-भरकम आभूषणों को बार-बार बाहर निकालने और वापस रखने से उनके टूटने या घिसने का खतरा रहता है। एक अतिरिक्त सेट तैयार होने से मूल ऐतिहासिक आभूषणों पर पड़ने वाला दबाव कम होगा। • तकनीकी सुलभता: रत्न भंडार के हालिया इन्वेंट्री कार्य के दौरान आभूषणों की उच्च तकनीक वाली 3D मैपिंग और वीडियोग्राफी की गई थी। इस डिजिटल रिकॉर्ड की उपलब्धता ने आभूषणों के सटीक प्रतिरूप तैयार करना संभव बना दिया है। • प्रशासनिक निर्णय: मंदिर प्रबंध समिति की बैठक में गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव की अध्यक्षता में सर्वसंमति से यह निर्णय लिया गया ताकि देवताओं के श्रृंगार की प्राचीन परंपरा को निरंतरता दी जा सके। सवाल-जवाब 1. भगवान जगन्नाथ के नए आभूषणों के निर्माण का निर्णय किसने लिया? यह निर्णय गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव की अध्यक्षता में हुई श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति की बैठक में लिया गया है। 2. नए आभूषणों के निर्माण के लिए फंड कहां से आएगा? इसका खर्च मुख्य रूप से श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन अपने आंतरिक संसाधनों से उठाएगा, साथ ही इच्छुक भक्तों और संस्थाओं से दान भी स्वीकार किया जाएगा। 3. क्या नए आभूषणों का डिजाइन पुराने वाले से अलग होगा? नहीं, नए आभूषण पूरी तरह से मूल आभूषणों के समान होंगे, क्योंकि इन्हें रत्न भंडार की इन्वेंट्री के दौरान किए गए 3D मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर तैयार किया जाएगा। 4. क्या नए आभूषणों के निर्माण के लिए कोई विशेष टीम बनाई जाएगी? हाँ, आभूषणों के निर्माण की निगरानी करने और अत्यधिक कुशल पारंपरिक स्वर्णकारों का चयन करने के लिए एक विशेष तकनीकी समिति का गठन किया जाएगा। 5. साल में कितनी बार और कब-कब 'सुना बेशा' अनुष्ठान होता है? यह अनुष्ठान साल में पांच बार होता है: रथयात्रा के बाद जुलाई में बहुदा एकादशी पर रथों के ऊपर, तथा जनवरी में पौष पूर्णिमा, अक्टूबर में दशहरा, नवंबर में कार्तिक पूर्णिमा और मार्च में डोला पूर्णिमा को मंदिर के अंदर। 6. पुरी मंदिर में 'सुना बेशा' की यह परंपरा कब और किसने शुरू की थी? ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस भव्य स्वर्ण श्रृंगार की शुरुआत वर्ष 1460 में तत्कालीन गजपति राजा कपिलेंद्र देव के शासनकाल के दौरान हुई थी। https://trendkia.com/religion/puri-jagannath-temple-men-vigrahon-ke-suna-besha-ke-lie-banenge-nae-sone-ke-abhushana-prabndha-samiti-ne-di-mnjuri-39352 TrendKia — Har trend, sabse pehle.