राधाष्टमी के बिना अधूरा रहता है जन्माष्टमी का उपवास, जानिए क्या है द्वापर युग से जुड़ी परंपरा मथुरा में कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद राधाष्टमी का पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी के व्रत के बिना भगवान कृष्ण का उपवास अधूरा माना जाता है। उत्तर प्रदेश का मथुरा शहर भगवान श्री कृष्ण की पावन लीलाओं का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस नगरी में प्रतिदिन देश और दुनिया के कोने-कोने से श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन और उनकी अलौकिक लीलाओं का अनुभव करने के लिए आते हैं। द्वापर युग से जुड़ी तमाम पौराणिक मान्यताएं और ऐतिहासिक स्थल आज भी यहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। इसी पावन भूमि पर भगवान कृष्ण की प्रिय राधा रानी भी अपनी विशेष महिमा के साथ विराजमान हैं। सनातन परंपराओं के जानकारों के अनुसार, श्री कृष्ण जन्माष्टमी का मुख्य पर्व संपन्न होने के ठीक पंद्रह दिनों के अंतराल के बाद राधाष्टमी का उत्सव बहुत धूमधाम से आयोजित किया जाता है। मथुरा और ब्रज में जन्मोत्सव की अनूठी परंपरा भारत की सनातन संस्कृति में हर पर्व और परंपरा का एक गहरा आध्यात्मिक महत्व होता है। योगीराज श्री कृष्ण की जन्मस्थली होने के कारण मथुरा का पूरी दुनिया में एक विशिष्ट स्थान है। कंस के कारागार में भगवान ठाकुर जी का जन्म हुआ था, और उस ऐतिहासिक घटना से जुड़े तमाम साक्ष्य आज भी इस क्षेत्र में मौजूद हैं। आज के समय में भी द्वापर युग के उस महान जन्मोत्सव की परंपरा को ब्रज के स्थानीय निवासी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते आ रहे हैं। इस पूरे उत्सव क्रम में नियमों और विधानों का पालन करना बेहद जरूरी माना जाता है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। जन्माष्टमी और राधाष्टमी का अटूट धार्मिक संबंध भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव पर उपवास रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक अन्य नियम का पालन करना भी अनिवार्य बताया गया है। परंपराओं के अनुसार, यदि कोई भक्त जन्माष्टमी का व्रत रखता है, तो उसे राधाष्टमी का उपवास भी अवश्य रखना चाहिए। ऐसा न करने पर जन्माष्टमी का व्रत अधूरा मान लिया जाता है। पंडित गौरांग शर्मा के अनुसार, हिंदू धर्म ग्रंथों और लोक मान्यताओं में इन दोनों त्योहारों के बीच एक बहुत गहरा और अटूट रिश्ता बताया गया है। दोनों ही दिव्य स्वरूपों की महिमा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, जिसे विशेष तिथियों और धार्मिक विधानों के माध्यम से समझा जा सकता है। तिथियों का अनूठा मेल और प्राकट्य का रहस्य पंडित गौरांग शर्मा ने विस्तार से बताया कि श्री कृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ठीक मध्यरात्रि के समय हुआ था। इसके ठीक पंद्रह दिन पश्चात भाद्रपद महीने के ही शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दोपहर के वक्त श्री राधा रानी का प्राकट्य माना जाता है। इन दोनों ही महान पर्वों की तिथि में एक अद्भुत समानता यह है कि दोनों ही बार अष्टमी तिथि का संयोग बनता है, केवल पक्षों का अंतर रहता है, जिसमें एक कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष होता है। मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति राधाष्टमी का व्रत नहीं करता है, उसका कृष्ण पक्ष का जन्माष्टमी व्रत अधूरा ही रह जाता है। धार्मिक आस्थाओं में तो यहां तक कहा गया है कि केवल एक बार राधाष्टमी का उपवास रखने का पुण्य कई लाख कृष्ण जन्माष्टमी व्रत रखने के बराबर होता है। इसका आप पर असर यह धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी उन सभी श्रद्धालुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखते हैं। • भारत में: सनातन परंपराओं का पालन करने वाले सभी भक्तों को जन्माष्टमी के साथ-साथ राधाष्टमी का व्रत रखने का विधान समझना चाहिए ताकि उनके अनुष्ठान पूरे हो सकें। • मथुरा में: ब्रज क्षेत्र और मथुरा के स्थानीय निवासियों के लिए इन दोनों पर्वों के बीच के अंतर और नियमों का पालन करना उनकी पारंपरिक आस्था से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसा क्यों हुआ इन दोनों त्योहारों की तिथियों और व्रतों के बीच का यह संबंध प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथों और लोक मान्यताओं पर आधारित है। • तिथि का संयोग: भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था, जबकि राधा रानी का प्राकट्य ठीक पंद्रह दिन बाद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ। • धार्मिक मान्यता: ग्रंथों के अनुसार दोनों स्वरूपों का संबंध इतना गहरा है कि एक के बिना दूसरे का अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता है। सवाल-जवाब 1. राधाष्टमी का पर्व कृष्ण जन्माष्टमी के कितने दिन बाद मनाया जाता है? राधाष्टमी का पर्व कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद मनाया जाता है। 2. श्री कृष्ण का जन्म किस पक्ष और तिथि में हुआ था? श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में हुआ था। 3. श्री राधा रानी का प्राकट्य कब हुआ था? श्री राधा रानी का प्राकट्य भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दोपहर के समय हुआ था। 4. पंडित गौरांग शर्मा के अनुसार कौन सा व्रत अधूरा माना जाता है? राधाष्टमी का व्रत न रखने पर व्यक्ति का कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत अधूरा माना जाता है। https://trendkia.com/religion/radhashtami-ke-bina-adhura-rahata-hai-janmashtami-ka-upavasa-janie-kya-hai-dvapara-yuga-se-juri-parnpara-33016 TrendKia — Har trend, sabse pehle.