# राजस्थान के झुंझुनूं में खेत और मकानों की खुदाई से मिलीं दुर्लभ जैन प्रतिमाएं, खरतरगच्छ मंदिर में सुरक्षित है सदियों की विरासत

> झुंझुनूं के जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ मंदिर में करीब 976 वर्ष पुरानी आदमकद मूर्ति और 1887 के सिक्के सहित जिले भर की खुदाई से निकलीं अनमोल धार्मिक प्रतिमाएं श्रद्धा का केंद्र बनी हुई हैं.

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-10-31 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/rajasthan-ke-jhunjhunu-men-kheta-aura-makanon-ki-khudai-se-milin-durlabha-jain-pratimaen-kharataragachha-mndira-men-surakshita-hai-53865 · **Language:** Hindi
**Tags:** झुंझुनूं, जैन मंदिर, भगवान महावीर, खरतरगच्छ संघ, पुरातत्व, राजस्थान

राजस्थान के शेखावाटी इलाके में स्थित झुंझुनूं की धरती से समय-समय पर प्राचीन आस्था और कला के अनूठे प्रमाण सामने आते रहे हैं. कभी किसी गांव में खेत जोतते किसान के हल की नोक से जमीन के भीतर दबी पावन मूर्ति बाहर आ गई, तो कभी किसी पुराने मकान की नींव खोदते वक्त सदियों पुरानी नक्काशीदार प्रतिमा मिल गई. अलग-अलग दौर में और अलग-अलग इलाकों से निकली ये तमाम ऐतिहासिक धरोहरें आज झुंझुनूं स्थित जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ मंदिर में पूरी श्रद्धा के साथ स्थापित हैं. इस मंदिर परिसर में कदम रखते ही 976 साल पुरानी भगवान महावीर स्वामी की विशाल प्रतिमा से लेकर सैकड़ों वर्ष पुरानी लाल पत्थर की कलाकृतियां उस दौर की समृद्ध परंपरा की गवाही देती नजर आती हैं.

## खुदाई से निकली भगवान महावीर स्वामी की 976 वर्ष पुरानी प्रतिमा
मंदिर परिसर का सबसे प्रमुख आकर्षण भगवान महावीर स्वामी की करीब सात फीट ऊंची आदमकद प्रतिमा है. इस पावन मूर्ति पर विक्रम संवत 1105 दर्ज है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह करीब 976 साल पुरानी है. इस कलाकृति में भगवान महावीर स्वामी की मुख्य पांच फीट की प्रतिमा के साथ परिग्रह का भी बहुत सुंदर और विस्तृत निर्माण किया गया है. यह दुर्लभ प्रतिमा बड़ का बालाजी मंदिर के समीप स्थित एक श्रावक के मकान में खुदाई कार्य के दौरान प्राप्त हुई थी. उस काल के शिल्पकारों द्वारा पत्थरों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी और अद्भुत शिल्पकला आज भी देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है.

## पौसाल से लाकर स्थापित की गईं लाल पत्थर की तीन मूर्तियां
मंदिर के गर्भगृह में लाल पत्थर से तराशी गई तीन बेहद प्राचीन प्रतिमाएं भी सुशोभित हैं, जिन्हें करीब 800 वर्ष पुराना आंका गया है. इन तीनों में भगवान पार्श्वनाथ मूलनायक के रूप में मध्य में विराजमान हैं. उनके दायीं दिशा में भगवान ऋषभनाथ और बायीं ओर भगवान महावीर स्वामी की मनोहारी प्रतिमा स्थापित की गई है. वर्तमान मंदिर का निर्माण होने से पहले ये तीनों मूर्तियां श्रीमालों के मोहल्ले में मौजूद एक पौसाल में रखी हुई थीं. उस पौसाल में विचरण करने वाले जैन मुनि और संत प्रवास किया करते थे. कालांतर में जब मंदिर की व्यवस्था बनी, तब पूरे विधि-विधान के साथ इन्हें मंदिर में लाकर विराजित किया गया.

## जीर्णोद्धार के दौरान वेदी के नीचे मिले 1887 के सिक्के और पूजन सामग्री
साल 2004 में मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान इतिहास से जुड़ा एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया. जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ संघ के सह सचिव सुशील जैन के अनुसार, उस समय मूर्तियों को अस्थायी रूप से हटाकर वेदियों का नए सिरे से निर्माण कराया जा रहा था. इसी प्रक्रिया में जब भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के नीचे की वेदी को खोदा गया, तो वहां से एक प्राचीन तांबे का सिक्का, तांबे का कलश, साबुत चावल, शुद्ध घी, चीनी और पूजन से संबंधित अन्य वस्तुएं बरामद हुईं. उस सिक्के पर साफ तौर पर वर्ष 1887 अंकित था. यह संपूर्ण सामग्री मूल रूप से उस समय रखी गई थी जब वेदी और प्रतिमा की स्थापना हुई थी. मंदिर की दूसरी मंजिल का निर्माण कार्य भी करीब 137 वर्ष पूर्व पूरा किया गया था.

## नरहड़ और नांगल की जमीन से निकलीं अष्टधातु व पत्थर की प्रतिमाएं
जिले के अन्य गांवों से भी जमीन के नीचे छिपी अमूल्य प्रतिमाएं बाहर निकली हैं. मंदिर में स्थापित भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा पर विक्रम संवत 1031 उत्कीर्ण है. इसके अलावा मंदिर में अष्टधातु की छह अन्य दुर्लभ प्रतिमाएं भी पूजी जाती हैं. इनमें से भगवान पार्श्वनाथ, भगवान शांतिनाथ और एक अन्य प्रतिमा नरहड़ (चिड़ावा) क्षेत्र में जमीन से प्राप्त हुई थीं. वहीं भगवान मल्लीनाथ की भव्य प्रतिमा उदयपुरवाटी तहसील के नांगल गांव के एक खेत से मिली थी. नांगल में जब एक किसान खेत में हल चला रहा था, तभी हल टकराने पर जमीन के भीतर से यह पावन मूर्ति प्रकट हुई. मूर्ति के साथ ही चंदन घिसने वाला चकला और दो नक्काशीदार खंभे भी जमीन से निकले थे. आश्चर्य की बात यह रही कि भूमि से निकलते समय प्रतिमा की उंगलियों पर चंदन और केसर के ताजे लेप के स्पष्ट निशान मौजूद थे.

## शेखावाटी की गौरवशाली शिल्पकला और संस्कृति का जीवंत केंद्र
झुंझुनूं के इस एकलौते मंदिर में जिले के अलग-अलग कोनों से मिले कई ऐतिहासिक अवशेष एक जगह सुरक्षित रखे गए हैं. इनमें से कई मूर्तियों का निर्माण 9वीं और 10वीं सदी का माना जाता है, जबकि कई मूर्तियों पर विक्रम संवत की स्पष्ट तिथियां खुदी हुई हैं. यह पूरा संग्रह इस बात को प्रमाणित करता है कि शेखावाटी की धरा पर प्राचीन काल से ही जैन धर्म, मूर्तिकला और स्थापत्य का अत्यधिक विकसित केंद्र रहा है. कई पीढ़ियों के इतिहास और आस्था को अपने आंचल में समेटे यह मंदिर आज भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं दोनों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है.

## इसका आप पर असर
यह समाचार राजस्थान के गौरवशाली इतिहास, धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को नया महत्व प्रदान करता है.

- **भारत में:** देशभर के पुरातत्व प्रेमियों और तीर्थयात्रियों के लिए यह मंदिर 9वीं और 10वीं सदी की मूर्तिकला को देखने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है. यहां आकर श्रद्धालु भारत की प्राचीन धातु व पाषाण शिल्प परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं.
- **झुंझुनूं में:** स्थानीय निवासियों और जिले भर के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि अलग-अलग गांवों की जमीन से निकली अमूल्य धरोहरें एक ही सुरक्षित स्थान पर संजोई गई हैं. इससे क्षेत्र में सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और आने वाली पीढ़ियां अपने ऐतिहासिक अतीत से सीधे जुड़ पाती हैं.

## ऐसा क्यों हुआ
झुंझुनूं के विभिन्न क्षेत्रों में सदियों पुरानी जैन मूर्तियों का जमीन के भीतर मिलना और उनका इस मंदिर में सुरक्षित होना ऐतिहासिक परिस्थितियों की देन है.

- **प्राचीन काल में मूर्तियों को भूमिगत करना:** शेखावाटी क्षेत्र में मध्यकाल के दौरान बाहरी हमलों या राजनीतिक अस्थिरता के समय धार्मिक प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के लिए प्रायः जमीन या कुओं में दबा दिया जाता था. यही कारण है कि सदियों बाद खेतों में जुताई या मकान निर्माण के समय ये मूर्तियां अचानक सतह पर आ जाती हैं.
- **समृद्ध जैन व्यापारिक केंद्र:** नरहड़, चिड़ावा और उदयपुरवाटी जैसे इलाके सदियों पहले समृद्ध व्यापारिक मार्ग और श्रावकों के प्रमुख केंद्र रहे थे, जहां बड़े पैमाने पर मंदिरों और पौसालों का निर्माण हुआ था. आर्थिक संपन्नता के कारण यहां 10वीं और 11वीं सदी में उच्च कोटि की नक्काशीदार प्रतिमाएं प्रतिष्ठित की गई थीं.
- **2004 का व्यवस्थित जीर्णोद्धार:** खरतरगच्छ संघ द्वारा जब 2004 में मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल की गई, तब वेदी के नीचे 1887 की स्थापना सामग्री सुरक्षित मिली. इस तरह के संरक्षण प्रयासों ने जिले भर से मिली लावारिस मूर्तियों को एक सुरक्षित धार्मिक छत प्रदान की.

## सवाल-जवाब

### 1. झुंझुनूं के खरतरगच्छ मंदिर में सबसे पुरानी प्रतिमा कौन सी है?
मंदिर में भगवान महावीर स्वामी की करीब 976 साल पुरानी सात फीट ऊंची प्रतिमा है, जिस पर विक्रम संवत 1105 अंकित है.

### 2. भगवान महावीर की 976 वर्ष पुरानी प्रतिमा कहां से मिली थी?
यह प्रतिमा बड़ का बालाजी मंदिर के निकट स्थित एक श्रावक के मकान की खुदाई के दौरान मिली थी.

### 3. मंदिर की वेदी की खुदाई में 1887 का क्या सामान निकला था?
वर्ष 2004 के जीर्णोद्धार के दौरान भगवान पार्श्वनाथ की वेदी के नीचे से वर्ष 1887 का एक सिक्का, कलश, घी, चावल और चीनी मिली थी.

### 4. नांगल गांव के खेत से कौन सी प्रतिमा निकली थी?
नांगल गांव में एक किसान के खेत की जुताई के दौरान भगवान मल्लीनाथ की प्रतिमा, चंदन घिसने का चकला और दो खंभे जमीन से निकले थे.

### 5. नरहड़ इलाके से किस प्रकार की प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं?
नरहड़ (चिड़ावा) की जमीन से अष्टधातु की प्रतिमाएं मिली थीं, जिनमें भगवान पार्श्वनाथ और भगवान शांतिनाथ की मूर्तियां शामिल हैं.

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