राजस्थान के रींगस में 14 सितंबर से शुरू हो रहा वार्षिक लक्खी मेला, सुरक्षा और सुविधाओं की व्यापक तैयारियां पूरी राजस्थान के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध रींगस भैरूं बाबा मंदिर में आठ दिवसीय लक्खी मेला 14 सितंबर से प्रारंभ होगा। भक्तों के भारी आगमन को देखते हुए प्रशासन ने स्वच्छता, यातायात, सुरक्षा और चिकित्सा की व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित रींगस के सुप्रसिद्ध भैरूं बाबा मंदिर में आठ दिवसीय वार्षिक लक्खी मेले का आयोजन 14 सितंबर से होने जा रहा है। इस धार्मिक आयोजन को भव्य और सुगम बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति ने व्यापक स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। मेले के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए पवित्र जोहड़ी में स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं को पहले से अधिक बेहतर किया जा रहा है। दूर-दराज से आने वाले भक्तों के लिए सुलभ दर्शन व्यवस्था सुनिश्चित करने के साथ-साथ पुलिस बल को वाहनों की आवाजाही के लिए स्पष्ट यातायात मार्ग तय करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासनिक व्यवस्थाएं और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं मेला परिसर तथा पवित्र जोहड़ी क्षेत्र में व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। आवारा पशुओं के प्रवेश पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है और पार्किंग के लिए अलग स्थान चिन्हित किए गए हैं। नगर पालिका प्रशासन को परिसर में निरंतर सफाई अभियान चलाने, अस्थाई दुकानों के लिए स्थान आवंटित करने तथा आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए चिकित्सा शिविर स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मेले के शुरू होने से पहले ही हरियाणा, दिल्ली, पंजाब जैसे पड़ोसी राज्यों के साथ-साथ राजस्थान के अलवर, अजमेर और जयपुर जिलों से श्रद्धालुओं का आगमन प्रारंभ हो गया है। खाटूश्याम जी के मुख्य धाम के निकट स्थित होने के कारण रींगस का यह मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। 557 वर्ष पुराना इतिहास और आकाशवाणी का अद्भुत रहस्य रींगस कस्बे में स्थापित भैरूं बाबा का यह पावन धाम लगभग 557 वर्ष प्राचीन माना जाता है। इस स्थान से जुड़ी एक गहरी जनश्रुति और 550 साल पुराना रहस्य है। मान्यता के अनुसार, एक बार रात्रि पूजा संपन्न करने के बाद भैरव बाबा की मूर्ति को जिस स्थान पर रखा गया था, वह वहां ऐसे स्थापित हो गई कि अत्यधिक प्रयास के बाद भी उसे हिलाया न जा सका। इसके तुरंत बाद एक दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने इस स्थान को भैरव बाबा के स्थायी धाम के रूप में घोषित कर दिया। इसी ऐतिहासिक महत्व के कारण कालाष्टमी और वार्षिक लक्खी मेले जैसे विशेष अवसरों पर यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु नतमस्तक होने पहुंचते हैं। शिव के पांचवें रुद्रावतार और ब्रह्महत्या से मुक्ति की गाथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी के पांचवें मुख द्वारा भगवान शिव की आलोचना की गई, तब महादेव ने अपने पांचवें रुद्रावतार के रूप में भैरव रूप धारण किया। काल भैरव ने अपने तीक्ष्ण नाखून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें मुख को पृथक कर दिया था। इस घटना के पश्चात उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा। इस महापाप के प्रायश्चित और दोष निवारण हेतु भैरव बाबा ने तीनों लोकों की पदयात्रा की। लोकमान्यताओं के अनुसार, पृथ्वी लोक पर उनकी यह पावन यात्रा रींगस की भूमि से ही प्रारंभ हुई थी। मंडोर के गुर्जर प्रतिहार पूर्वज और स्थापना की प्राचीन कथा मंदिर के पुजारी के अनुसार, उनके गुर्जर प्रतिहार वंशज मूल रूप से जोधपुर के मंडोर क्षेत्र में निवास करते थे और पशुपालन का कार्य करते थे। उनके पास पत्थर की एक गोलाकार मूर्ति थी, जिसे वे भैरूं बाबा का स्वरूप मानकर सदैव अपनी झोली में साथ रखते थे। गायों को चराते समय वे जिस भी तालाब या जलाशय के किनारे विश्राम करते, वहां उस मूर्ति को निकालकर भक्तिभाव से पूजन करते थे और यात्रा आगे बढ़ाने से पूर्व पुनः झोली में रख लेते थे। मंडोर से यात्रा करते हुए वे रींगस पहुंचे और एक तालाब के तट पर रात्रि विश्राम के लिए ठहरे। प्रातःकाल जब उन्होंने नित्य पूजा के बाद मूर्ति को उठाने का प्रयास किया, तो वह स्थान से टस से मस नहीं हुई। उसी क्षण आकाशवाणी हुई कि जिस स्थान से ब्रह्महत्या के प्रायश्चित के लिए पृथ्वी यात्रा आरंभ हुई थी, बाबा पुनः उसी पावन स्थान पर आ चुके हैं और अब यहीं निवास करेंगे। इसके पश्चात पूर्वजों ने वहीं अपना डेरा जमा लिया और नियमित पूजा-अर्चना आरंभ कर दी। 1669 ईस्वी की प्राचीन छतरी और पारंपरिक प्रसाद की प्रथा रींगस के इस ऐतिहासिक मंदिर का तीसरी बार जीर्णोद्धार वर्ष 2013 में प्रारंभ किया गया था। प्राचीन समय में यह मंदिर चारों तरफ से श्मशान भूमि से घिरा हुआ था और खुले प्रांगण के रूप में स्थित था। मंदिर प्रांगण के बाहर सती माता की एक प्राचीन छतरी विद्यमान है, जिस पर 1669 ईस्वी अंकित है। यह शिलालेख मंदिर की प्राचीनता और इसके ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्रमाणित करता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, भैरव बाबा को पुआ-पापड़ी, बाटी-बाकले तथा लौंग-पतासे का विशेष भोग अर्पित करने की प्रथा आज भी पूर्ण श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। इसका आप पर असर सीकर के रींगस क्षेत्र में आयोजित होने वाले आठ दिवसीय लक्खी मेले का प्रभाव श्रद्धालुओं, यात्रियों और स्थानीय निवासियों पर सीधा पड़ेगा। • भारत भर के यात्रियों के लिए: दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के विभिन्न जिलों से आने वाले श्रद्धालुओं को 14 सितंबर से सुगम दर्शन और पवित्र जोहड़ी में स्वच्छ स्नान की बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। • सीकर और रींगस में: मेला अवधि के दौरान रींगस क्षेत्र में यातायात के मार्ग परिवर्तित रहेंगे। स्थानीय निवासियों को निर्धारित पार्किंग और वाहनों की नई व्यवस्था का पालन करना होगा। • स्थानीय अर्थव्यवस्था पर: आठ दिनों तक चलने वाले इस मेले से रींगस के स्थानीय छोटे दुकानदारों, परिवहन चालकों और खान-पान के कारोबारियों के व्यापार में तेजी आएगी। • स्वास्थ्य और स्वच्छता पर: नगर पालिका द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान और चिकित्सा शिविरों से मेला क्षेत्र में सुरक्षा और प्राथमिक उपचार की त्वरित सुविधा उपलब्ध रहेगी। ऐसा क्यों हुआ रींगस में भैरूं बाबा के लक्खी मेले का आयोजन गहरी धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक परंपरा के कारण प्रतिवर्ष विशाल पैमाने पर होता है। • पौराणिक महत्व: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव द्वारा ब्रह्मा जी के पांचवें मुख का छेदन करने के बाद ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति के लिए उनकी पृथ्वी यात्रा रींगस से ही प्रारंभ हुई थी। • अद्भुत स्थापना कथा: मंडोर के गुर्जर प्रतिहार पूर्वजों द्वारा लाई गई मूर्ति रींगस तालाब के किनारे स्वतः स्थापित हो गई थी और आकाशवाणी द्वारा इस स्थान को स्थायी धाम घोषित किया गया था। • खाटूश्याम जी से समीपता: खाटूश्याम धाम के अति निकट होने के कारण यहां आने वाले श्रद्धालु भैरूं बाबा का आशीर्वाद लेना अपनी धार्मिक यात्रा का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। सवाल-जवाब 1. रींगस का लक्खी मेला कब से शुरू हो रहा है? यह आठ दिवसीय वार्षिक लक्खी मेला 14 सितंबर से रींगस के भैरूं बाबा मंदिर में शुरू हो रहा है। 2. रींगस स्थित भैरूं बाबा का मंदिर कितना पुराना है? यह मंदिर लगभग 557 वर्ष पुराना माना जाता है, जिसके प्रांगण के बाहर 1669 ईस्वी की प्राचीन सती माता की छतरी स्थित है। 3. मेले के दौरान श्रद्धालुओं के लिए क्या व्यवस्थाएं की गई हैं? प्रशासन ने पवित्र जोहड़ी की सफाई, नए यातायात रूट, पार्किंग स्थल, आवारा पशुओं पर रोक, अस्थाई दुकानों और चिकित्सा शिविरों के विशेष प्रबंध किए हैं। 4. भैरूं बाबा को किस विशेष प्रसाद का भोग लगाया जाता है? भैरव बाबा को पारंपरिक रूप से पुआ-पापड़ी, बाटी-बाकले और लौंग-पतासे का भोग चढ़ाने की प्रथा है। 5. रींगस धाम से जुड़ी मुख्य पौराणिक मान्यता क्या है? मान्यता है कि ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति के लिए भगवान शिव के पांचवें रुद्रावतार भैरव बाबा ने अपनी पृथ्वी लोक की यात्रा रींगस से ही प्रारंभ की थी। https://trendkia.com/religion/rajasthan-ke-ringas-men-14-sitnbara-se-shuru-ho-raha-varshika-lakkhi-mela-suraksha-aura-suvidhaon-ki-vyapaka-taiyariyan-puri-31507 TrendKia — Har trend, sabse pehle.