# साल में केवल एक बार दिखते हैं पाताल बाबा, बासुकीनाथ के इस शिवलिंग की उम्र करीब 300 साल

> देवघर से करीब 60 किलोमीटर दूर दुमका जिले के बासुकीनाथधाम में शिवगंगा तालाब की गहराई में स्थापित पाताल बाबा का शिवलिंग साल में सिर्फ एक बार, सावन से पहले तालाब खाली होने पर दिखाई देता है।

**Category:** धर्म · **Published:** 2026-06-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/sala-men-kevala-eka-bara-dikhate-hain-patala-baba-basukinatha-ke-isa-shivalinga--180

झारखंड के देवघर में विराजमान बाबा बैद्यनाथधाम देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है। यहां प्रत्येक वर्ष लाखों भक्त भगवान शिव की आराधना के लिए पहुंचते हैं। लोगों की आस्था है कि बाबा बैद्यनाथ मनोकामना लिंग हैं, अर्थात सच्चे हृदय से की गई हर प्रार्थना यहां स्वीकार होती है। इसी विश्वास के चलते देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु बाबाधाम पहुंचकर जलार्पण और पूजन करते हैं। परंतु बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि बाबाधाम की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक भक्त दुमका जिले के बासुकीनाथधाम जाकर शिव का दर्शन नहीं कर लेते।

बाबाधाम से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर बसा बासुकीनाथधाम बाबा बैद्यनाथ के दरबार को संपूर्ण करने वाला तीर्थ माना जाता है। यहां के पुरोहितों का कहना है कि जो भक्त बाबाधाम में पूजा के बाद बासुकीनाथ में भी जलार्पण करते हैं, उनकी मनोकामनाएं निश्चित रूप से पूरी होती हैं। यही कारण है कि सावन हो या साधारण दिन, बड़ी तादाद में श्रद्धालु दोनों धामों के दर्शन के लिए आते हैं। बासुकीनाथ मंदिर की अपनी विशिष्ट धार्मिक महत्ता है और यहां की अनेक परंपराएं लोगों की श्रद्धा से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

बासुकीनाथधाम के परिसर में एक पवित्र शिवगंगा तालाब भी मौजूद है। मंदिर में पूजा-अर्चना से पूर्व भक्त इसी तालाब में स्नान कर स्वयं को पावन मानते हैं। इसी शिवगंगा की गहराई में एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जिसे लोग आदरपूर्वक पाताल बाबा के नाम से पुकारते हैं। यह शिवलिंग सामान्य दिनों में पूरी तरह जल में डूबा रहता है, इसी वजह से सालभर इसके दर्शन संभव नहीं हो पाते। यही कारण है कि पाताल बाबा के दर्शन को अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।

हर साल सावन आरंभ होने से पहले ज्येष्ठ माह में एक खास परंपरा निभाई जाती है। इस अवसर पर बासुकीनाथधाम के पुरोहित, गांव के लोग और प्रशासन मिलकर शिवगंगा तालाब का पानी बाहर निकालते हैं और उसकी सफाई करते हैं। जैसे ही तालाब का जलस्तर घटता है, वर्षों से जलमग्न रहने वाले पाताल बाबा के दर्शन भक्तों को होते हैं। इस घड़ी का लोग पूरे वर्ष इंतजार करते हैं। केवल इस दुर्लभ दृश्य को निहारने के लिए दूर-दूर से शिवभक्त बासुकीनाथ पहुंचते हैं।

हाल ही में लंबी प्रतीक्षा के बाद जब एक बार फिर पाताल बाबा के दर्शन हुए, तो श्रद्धालुओं में जबरदस्त उमंग देखने को मिली। वैदिक मंत्रों के उच्चारण के बीच मंदिर के पुजारियों ने षोडशोपचार विधि से शिव का विशेष पूजन कराया और भव्य श्रृंगार किया। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच भक्त शिवगंगा कुंड में उतरकर जलार्पण करते दिखे। कई भक्तों का कहना था कि पता नहीं अगली बार ऐसा सुअवसर कब मिले, इसलिए इस बार के दर्शन और पूजन का विशेष महत्व है। कुंड के चारों ओर भक्ति, श्रद्धा और हर-हर महादेव के जयघोष से समूचा माहौल भक्तिमय हो उठा।

पाताल बाबा को लेकर स्थानीय लोगों और भक्तों के बीच एक बेहद दिलचस्प मान्यता भी प्रचलित है। स्थानीय तीर्थपुरोहित लम्बोदर मिश्रा बताते हैं कि यह स्वयंभू शिवलिंग करीब 300 वर्ष पूर्व प्रकट हुआ था। आश्चर्य की बात यह है कि वर्षों तक जल में डूबे रहने के बावजूद बाबा पर अर्पित बिल्वपत्र, फूल, अबीर और अन्य पूजन सामग्री पूरी तरह सुरक्षित नजर आती है। जब शिवगंगा का जल निकाला जाता है और पाताल बाबा के दर्शन होते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो अभी-अभी उनका श्रृंगार किया गया हो। भक्त इसे भगवान शिव की दिव्य कृपा और चमत्कार मानते हैं। यही वजह है कि बासुकीनाथ के पाताल बाबा आज करोड़ों शिवभक्तों की आस्था के बड़े केंद्र बने हुए हैं।

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