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  "title": "सर्वपितृ अमावस्या पर बना शनिश्चरी योग, 10 अक्टूबर को इन 5 प्रमुख जगहों पर दीप जलाने से मिलेगा पितरों और शनिदेव का आशीष",
  "summary": "आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को शनिवार के दिन पड़ रही है, जिससे शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है। शाम के समय पांच तय स्थानों पर दीपक प्रज्वलित करने से पितृ दोष से राहत और शनिदेव की कृपा मिलने की धार्मिक मान्यता है।",
  "content": "आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि यानी अमावस्या को सनातन परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह विशेष तिथि 10 अक्टूबर को पड़ रही है। इस दिन श्राद्ध पक्ष का समापन होता है और परिवारजन श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान के जरिए अपने पूर्वजों को आदरपूर्वक विदाई देते हैं। इस बार की तिथि बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि सर्वपितृ अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है। शनिवार के दिन पड़ने की वजह से यह शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग भी बना रही है। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर, जब यह दोनों योग एक साथ आते हैं, तब पूर्वजों के स्मरण के साथ-साथ कर्मफल दाता शनिदेव की आराधना का फल भी कई गुना बढ़ जाता है।\n\nपितरों की विदाई की बेला यानी सूर्यास्त के बाद शाम के समय दीप प्रज्वलन का विशेष विधान माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दीपदान करने से पितरों के गमन का मार्ग आलोकित होता है, उन्हें शांति मिलती है और परिवार पर शनिदेव के साथ-साथ पितरों की कृपा बरसती है। यदि इस पावन संयोग पर सही विधि और निश्चित स्थानों पर दीप प्रज्वलित किए जाएं, तो जीवन के कष्ट दूर होते हैं। आइए जानते हैं वे पांच प्रमुख स्थल जहां दीप जलाना अत्यंत फलदायी बताया गया है।\n\nपीपल के वृक्ष के नीचे दीप प्रज्वलन\nधार्मिक मान्यताओं में पीपल के पेड़ को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसमें देवताओं और पूर्वजों दोनों का वास माना जाता है। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या की संध्या बेला में पीपल के वृक्ष की जड़ के समीप सरसों के तेल का एक दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय मन ही मन अपने पूर्वजों का स्मरण करें और उनसे कुशलता की प्रार्थना करें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय से पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है और उनका मंगलकारी आशीर्वाद पूरे कुल को मिलता है।\n\nदक्षिण दिशा की तरफ अर्पित करें दीप\nहिंदू धर्मग्रंथों में दक्षिण दिशा को यमराज और पितरों का निवास स्थान बताया गया है। मान्यता है कि पितृ पक्ष की समाप्ति पर पूर्वज इसी दिशा से अपने लोक के लिए प्रस्थान करते हैं। इसलिए शाम के समय घर की चौखट के बाहर अथवा किसी स्वच्छ और सुरक्षित स्थान पर दक्षिण मुखी दीपक जलाना चाहिए। यह दीप जलाकर परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और सुरक्षा की कामना की जाती है, जिससे पूर्वज प्रसन्न होकर विदा लेते हैं।\n\nशनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक\nक्योंकि इस बार सर्वपितृ अमावस्या शनिवार को है, इसलिए शनिश्चरी अमावस्या का संयोग अपने आप में चमत्कारी माना जा रहा है। इस दिन किसी निकटतम शनि मंदिर में जाकर शनिदेव के सम्मुख सरसों के तेल का दीपक अर्पित करना बेहद शुभकारी होता है। दीप प्रज्वलित करने के बाद शनिदेव से जीवन में आ रही बाधाओं, कष्टों और संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करनी चाहिए। इससे शनि की ढैय्या, साढ़ेसाती या अन्य ग्रहों के दुष्प्रभावों में कमी आने की मान्यता है।\n\nघर के मुख्य द्वार पर जलाएं मंगल दीप\nसर्वपितृ अमावस्या की शाम को घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर दीपक रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। विदाई के समय जब पितर प्रस्थान करते हैं, तो चौखट पर प्रज्वलित दीपक उनके मार्ग को प्रकाशित करता है। धार्मिक विश्वास है कि मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से घर के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं और पूर्वज घर-परिवार को अपना आशीर्वाद देकर जाते हैं।\n\nतुलसी के पौधे के समीप गाय के घी का दीप\nशाम के समय घर के आंगन या बालकनी में स्थित तुलसी के पौधे के पास शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। इस दौरान भगवान विष्णु और पितरों का ध्यान करें। तुलसी जी को श्रीहरि की प्रिय माना गया है, इसलिए वहां दीप जलाने से घर का वातावरण शांत और पवित्र बनता है। मान्यता है कि इस उपाय को करने से पितृ दोष के नकारात्मक प्रभावों से राहत मिलती है और जीवन की कई उलझनें सुलझ जाती हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह दुर्लभ संयोग उन श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है जो पितृ विदाई के साथ शनिदेव की शांति के उपाय करना चाहते हैं।\n\n• पूजा का समय: 10 अक्टूबर को शाम के समय निश्चित 5 स्थानों पर दीप प्रज्वलित करने का विधान है। सूर्यास्त के तुरंत बाद दीपदान करने से अनुष्ठान का पूर्ण फल मिलता है।\n• आवश्यक सामग्री: पीपल और शनि मंदिर के लिए सरसों का तेल तथा तुलसी के लिए गाय का घी आवश्यक होगा। समय रहते पर्याप्त मिट्टी के दीपक और बाती की व्यवस्था कर लें।\n• दिशा और स्थान: दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा मानकर घर के बाहर सुरक्षित स्थान पर दीप रखें। आग की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखते हुए ही दीपों को स्थापित करें।\n• दोष निवारण: यह दिन पितृ दोष और शनि के दुष्प्रभावों से राहत पाने का उत्तम अवसर है। श्रद्धालु बिना किसी जटिल विधि के केवल दीपदान के माध्यम से शांति की प्रार्थना कर सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसर्वपितृ अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या का एक साथ आना पंचांग की विशिष्ट खगोलीय और तिथीय गणना का परिणाम है।\n\n• शनिवार का संयोग: आश्विन मास की अमावस्या तिथि का प्रारंभ और समापन इस वर्ष शनिवार के दिन हो रहा है। शनिवार के दिन अमावस्या पड़ने के कारण इसे स्वतः ही शनिश्चरी अमावस्या की संज्ञा दी जाती है।\n• पितृ पक्ष का समापन: हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों की विदाई का दिन माना जाता है। इसी दिन लोग उन पूर्वजों का भी श्राद्ध करते हैं जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती।\n• दीपदान की परंपरा: शास्त्रों में मान्यता है कि पितृ पक्ष के समापन पर पूर्वज अपने लोक लौटते हैं, इसलिए उनके मार्ग को आलोकित करने के लिए संध्या के समय दीप प्रज्वलित किए जाते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सर्वपितृ अमावस्या 2026 में किस तारीख को है?\nसर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी, जो आश्विन मास की अमावस्या तिथि है।\n\n2. इस दिन शनिश्चरी अमावस्या का संयोग क्यों बन रहा है?\nक्योंकि 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जा रहा है।\n\n3. पीपल के पेड़ के नीचे कौन सा दीपक जलाना चाहिए?\nपीपल के वृक्ष के नीचे शाम के समय सरसों के तेल का दीपक जलाकर पितरों का स्मरण करने का विधान है।\n\n4. दक्षिण दिशा में दीपक क्यों रखा जाता है?\nदक्षिण दिशा को यम और पितरों की दिशा माना गया है, और इसी दिशा से पूर्वज विदा होते हैं, इसलिए वहां दीप जलाया जाता है।\n\n5. तुलसी के पास कौन सा तेल या घी जलाना चाहिए?\nतुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए।",
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  "category": "धर्म",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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