सावन में देवघर की यात्रा का गुप्त नियम: बाबा बैद्यनाथ के बाद इन 5 मंदिरों के दर्शन क्यों हैं अनिवार्य सावन के पवित्र महीने में लाखों शिवभक्त जल लेकर देवघर पहुंचते हैं, लेकिन प्राचीन धार्मिक परंपराओं के अनुसार बाबा बैद्यनाथ के साथ-साथ प्रांगण में स्थित पांच अन्य प्रमुख मंदिरों में मत्था टेकने के बाद ही यह तीर्थयात्रा पूरी मानी जाती है। सावन के पावन महीने में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु और कांवरिया जल लेकर देवघर पहुंचते हैं। बाबा बैद्यनाथ पर जलाभिषेक करने के लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है और पूरा शहर शिव के जयकारों से गूंज उठता है। हालांकि कई नए श्रद्धालुओं को इस बात की पूरी जानकारी नहीं होती कि केवल मुख्य ज्योतिर्लिंग पर जल चढ़ाने और दर्शन करके लौट जाने से यह पवित्र यात्रा पूर्ण नहीं होती। देवघर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और तीर्थपुरोहितों के अनुसार आपकी बोलबम यात्रा का पूरा फल तभी मिलता है जब आप मंदिर परिसर में मौजूद पांच अन्य प्रमुख मंदिरों में भी पूरी श्रद्धा के साथ दर्शन और पूजन करते हैं। ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ का अद्भुत संगम बाबा बैद्यनाथ धाम का हिंदू धर्म में एक अद्वितीय और बहुत ही खास स्थान है। यह न केवल भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है बल्कि इसे एक बेहद जाग्रत शक्तिपीठ का दर्जा भी प्राप्त है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे तब इसी स्थान पर माता सती का हृदय गिरा था। हृदय गिरने की इसी महान घटना के कारण देवघर के इस पवित्र धाम को हृदयपीठ के नाम से जाना जाता है। साथ ही भक्तों की हर मुराद पूरी करने की वजह से इसे मनोकामना लिंग भी कहा जाता है। यात्रा को पूर्ण करने वाले पांच प्रमुख मंदिर इस तीर्थयात्रा को संपूर्ण बनाने के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक विज्ञान छिपा है। बाबा बैद्यनाथ मंदिर के जाने-माने तीर्थपुरोहित प्रमोद श्रृंगारी बताते हैं कि देवघर आने वाले हर शिवभक्त को एक निश्चित क्रम में इन पांच मंदिरों के दर्शन जरूर करने चाहिए। उनके अनुसार केवल बाबा के दर्शन से यात्रा का एक हिस्सा ही पूरा होता है। जब तक भक्त इन पांच शक्तियों के दरबार में अपनी हाजिरी नहीं लगाते तब तक उनका अनुष्ठान अधूरा ही माना जाता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर इन मंदिरों का इतना अधिक महत्व क्यों है। शिव और शक्ति का मिलन: मां पार्वती मंदिर मुख्य ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के तुरंत बाद सबसे पहले मां पार्वती के मंदिर में माथा टेकने की परंपरा है। चूंकि यह धाम एक शिव-शक्ति ज्योतिर्लिंग है इसलिए यहां शिव के साथ शक्ति की आराधना बेहद जरूरी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां माता सती साक्षात मां दुर्गा के रूप में मां पार्वती के मंदिर में विराजमान हैं। तीर्थपुरोहित बताते हैं कि शिव और शक्ति दोनों का आशीर्वाद एक साथ मिलने से भक्त के जीवन में अपार सुख, गहरी शांति और वैवाहिक जीवन में सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि बाबा से आशीर्वाद लेने के बाद मां पार्वती के दर्शन करना अनिवार्य माना गया है। रक्षा का अभेद्य कवच: मां संध्या मंदिर मंदिर परिसर में स्थित मां संध्या का मंदिर भी अपने आप में एक विशेष और रहस्यमयी आध्यात्मिक महत्व रखता है। पुरानी कथाओं के अनुसार जब माता सती का हृदय इस पावन भूमि पर आकर गिरा था तब उसकी सुरक्षा का जिम्मा मां कामाख्या ने लिया था। मां कामाख्या ही नीलचक्र पर विराजमान होकर मां संध्या के रूप में देवघर पहुंचीं और यहीं स्थापित हो गईं। तब से लेकर आज तक मां संध्या को इस शक्तिपीठ की सबसे बड़ी रक्षक शक्ति के रूप में पूजा जाता है। बाबा और मां पार्वती के बाद भक्त यहां आकर अपने और अपने परिवार की सुरक्षा तथा आध्यात्मिक कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं। शत्रुओं और रोगों का नाश: मां बगला मंदिर देवघर के इस विशाल प्रांगण में मां बगला का मंदिर भी स्थित है जो कि अत्यंत प्राचीन और सिद्ध माना गया है। तीर्थपुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार पवित्र देवी पुराण में मां बगला का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है और उन्हें बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की अधिष्ठात्री माता का दर्जा दिया गया है। ऐसी गहरी धार्मिक मान्यता है कि मां बगला की सच्चे मन से पूजा करने पर जीवन की हर शत्रु बाधा तुरंत दूर हो जाती है। भक्त यहां आकर गंभीर रोगों से मुक्ति, जीवन के सभी दुखों और संकटों के नाश तथा हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करने का विशेष आशीर्वाद मांगते हैं। भय और संकट से मुक्ति: मां काली मंदिर प्राचीन हिंदू ग्रंथों में देवघर के बैद्यनाथधाम को चिताभूमि भी कहा गया है। श्मशान और चिताभूमि की सबसे प्रमुख अधिष्ठात्री देवी होने के नाते यहां मां काली का स्थान बहुत ही खास और शक्तिशाली माना जाता है। वैसे तो धार्मिक नियम यह भी कहते हैं कि परिसर में किसी भी अन्य पूजा को शुरू करने से पहले मां काली का स्मरण करना सबसे शुभ होता है। सावन के महीने में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है क्योंकि लोगों का यह अटूट विश्वास है कि मां काली अपने उपासकों के हर तरह के भय, संकट और जीवन की तमाम नकारात्मक शक्तियों को जड़ से खत्म कर देती हैं और उन्हें असीम साहस प्रदान करती हैं। सुख और समृद्धि का द्वार: लक्ष्मी-नारायण मंदिर इस संपूर्ण यात्रा का अंतिम लेकिन बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव है लक्ष्मी-नारायण मंदिर। तीर्थपुरोहित प्रमोद श्रृंगारी बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि खुद भगवान विष्णु ने अपने हाथों से बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। इसी गहरे संबंध के कारण मंदिर प्रांगण में स्थित भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के इस मंदिर की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। बाबा बैद्यनाथ और सभी देवियों के दर्शन के बाद श्रद्धालु अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं। वे यहां अपने जीवन में भौतिक सुख, अपार समृद्धि, वैभव और पूरे परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। शिव के साथ-साथ श्री हरि विष्णु का यह आशीर्वाद तीर्थयात्रा को पूरी तरह से फलदायी बना देता है। इसका आप पर असर • भारत में: जो श्रद्धालु सावन में अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए तीर्थयात्रा की योजना बना रहे हैं, उन्हें अपने दर्शन के समय में इन पांच अतिरिक्त मंदिरों के लिए भी समय निकालना होगा। • देवघर में: इस प्राचीन परंपरा के कारण सावन के दौरान मुख्य मंदिर के साथ-साथ इन पांचों मंदिरों के आसपास भारी भीड़ और स्थानीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि देखी जाती है। सवाल-जवाब 1. बैद्यनाथ धाम को शक्तिपीठ क्यों कहा जाता है? पौराणिक कथाओं के अनुसार इस स्थान पर माता सती का हृदय गिरा था, जिस कारण यह ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ एक जाग्रत शक्तिपीठ भी है। 2. बाबा बैद्यनाथ के बाद किन पांच मंदिरों के दर्शन जरूरी हैं? तीर्थयात्रा को पूर्ण करने के लिए मां पार्वती, मां संध्या, मां बगला, मां काली और लक्ष्मी-नारायण मंदिर के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है। 3. मां संध्या मंदिर का क्या महत्व है? जब माता सती का हृदय गिरा था, तब उसकी रक्षा के लिए मां कामाख्या ने मां संध्या का रूप लिया था; भक्त यहां सुरक्षा और कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं। 4. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना किसने की थी? प्राचीन ग्रंथों और तीर्थपुरोहितों के अनुसार, बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं भगवान विष्णु के हाथों हुई थी। https://trendkia.com/religion/savana-men-deoghar-ki-yatra-ka-gupta-niyama-baba-baidyanath-ke-bada-ina-5-mndiron-ke-darshana-kyon-hain-anivarya-9804 TrendKia — Har trend, sabse pehle.