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  "type": "article",
  "title": "सिरोही का अद्भुत महालक्ष्मी मंदिर, जहां विराजमान हैं पौने सात फीट ऊंची प्रतिमा और उत्कीर्ण हैं 41 हजार मंत्र",
  "summary": "राजस्थान के सिरोही में स्थित श्री विजयपताका पार्श्वनाथ महालक्ष्मी धाम अपनी अनूठी विशेषताओं के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में महालक्ष्मी की विशाल प्रतिमा के साथ-साथ दिन में तीन रूप बदलने वाले भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन होते हैं।",
  "content": "सिरोही जिला मुख्यालय से लगभग 3 से 4 किलोमीटर की दूरी पर कांडला हाईवे के पास स्थित श्री विजयपताका पार्श्वनाथ महालक्ष्मी धाम क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में शुमार है। इस पवित्र तीर्थ स्थल पर संभवतः राजस्थान प्रदेश की सबसे बड़ी माता महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला, मनमोहक नक्काशी और शांत आध्यात्मिक परिवेश के कारण देश-विदेश के श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां भगवान पार्श्वनाथ और माता महालक्ष्मी के दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं।\n\n500 साल पुराना ऐतिहासिक महत्व\nस्थानीय निवासी रमेश कुमार के अनुसार, इस धार्मिक स्थल का इतिहास पांच सौ वर्ष से अधिक पुराना है। मंदिर परिसर से प्राप्त शिलालेखों से संकेत मिलता है कि इसका इतिहास विक्रम संवत 1500 के समय से जुड़ा हुआ है। समय-समय पर जैन आचार्यों के मार्गदर्शन और सानिध्य में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया जाता रहा है। वर्तमान समय में श्री मीठालाल पूनमचंद चैरिटेबल ट्रस्ट के आर्थिक और प्रबंधकीय सहयोग से इस धाम को एक भव्य और विशाल स्वरूप प्रदान किया गया है।\n\nमहालक्ष्मी की अनूठी और विशाल प्रतिमा\nइस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित माता महालक्ष्मी की प्रतिमा है, जो 81 इंच यानी पौने सात फीट ऊंची है और इसे एक ही अखंड पत्थर को तराशकर तैयार किया गया है। इसके अलावा, परिसर में भगवान पार्श्वनाथ की 71 इंच ऊंची सफेद संगमरमर की अत्यंत मनमोहक प्रतिमा भी विराजमान है। धनतेरस और दीपावली के पावन पर्व पर महालक्ष्मी पूजन के विशेष अवसर पर देश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन करने आते हैं। कई श्रद्धालु इस अवसर पर माता को सोने और चांदी के बहुमूल्य आभूषण भी अर्पित करते हैं।\n\nदिन में तीन रूप बदलते हैं भगवान पार्श्वनाथ\nश्रद्धालुओं के बीच भगवान पार्श्वनाथ की इस पावन प्रतिमा को लेकर एक बेहद खास मान्यता प्रचलित है। भक्तों का मानना है कि यह प्रतिमा दिन के अलग-अलग पहर में तीन अलग-अलग रूपों में नजर आती है। सुबह के समय इसके दर्शन एक बालक के रूप में होते हैं, दोपहर के वक्त यह युवा रूप में प्रतीत होती है और शाम ढलने पर इसके बुजुर्ग रूप में दर्शन होने की मान्यता जुड़ी हुई है।\n\nमंत्रों से सजी दीवारें और अन्य देवी-देवता\nमंदिर की दीवारों और संगमरमर के पत्थरों पर कुल 41 हजार बार ॐ, ह्रींकार और ॐ अरहम जैसे पवित्र मंत्र उकेरे गए हैं। इसके अलावा भगवान पार्श्वनाथ की मुख्य प्रतिमा के चारों तरफ 18 फीट लंबा ह्रीं मंत्र भी खूबसूरती से बनाया गया है। मंदिर परिसर के भीतर ही श्रद्धालुओं को भगवान आदिनाथ, भगवान महावीर स्वामी, माता अंबिका और श्रीयंत्र के भी दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है। यहां प्रत्येक दिन सुबह 9 बजे विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।\n\nश्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाएं और भोजनशाला\nदीपावली और धनतेरस के मेलों तथा विशेष पूजा-अर्चना के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए यहां पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। तीर्थ परिसर के भीतर ही लगभग 108 वातानुकूलित कमरों से सुसज्जित एक विशाल धर्मशाला बनाई गई है, इसके साथ ही शुद्ध सात्विक जैन भोजन के लिए भोजनशाला भी संचालित होती है। यहां सुबह 8 से 9 बजे तक नवकारसी, सुबह 11:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक भोजन तथा शाम 5 से 6 बजे तक चौविहार की उत्तम व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है।\n\nइसका आप पर असर\nइस धार्मिक स्थल से जुड़े धार्मिक आयोजनों और पर्यटन का स्थानीय अर्थव्यवस्था तथा श्रद्धालुओं की यात्रा पर सीधा प्रभाव पड़ता है।\n\n• भारत में: देश भर से आने वाले जैन श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह स्थान दीवाली और धनतेरस के दौरान विशेष आस्था का केंद्र बनता है। इससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय यात्रा व्यवस्थाएं सक्रिय होती हैं।\n• सिरोही में: सिरोही और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय निवासियों तथा व्यापारियों को बड़े आयोजनों के दौरान आने वाले तीर्थयात्रियों के कारण व्यावसायिक लाभ मिलता है। मंदिर परिसर की धर्मशाला और भोजनशाला से आगंतुकों को ठहरने व भोजन की सुविधा मिलती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह मंदिर सदियों पुरानी परंपराओं, जैन आचार्यों के सानिध्य और ट्रस्ट के प्रयासों के कारण इस स्वरूप में विकसित हुआ है।\n\n• ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मंदिर के शिलालेखों के अनुसार इसका इतिहास विक्रम संवत 1500 यानी 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है।\n• संरक्षण और जीर्णोद्धार: जैन आचार्यों के मार्गदर्शन और श्री मीठालाल पूनमचंद चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से इस धार्मिक स्थल का समय-समय पर विस्तार किया गया है।\n• विशेष शिल्पकारी: मंदिर की दीवारों पर हजारों मंत्रों का उत्कीर्णन और एक ही पत्थर से महालक्ष्मी की 81 इंच ऊंची प्रतिमा का निर्माण इसकी अनूठी धार्मिक परंपरा को दर्शाता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. श्री विजयपताका पार्श्वनाथ महालक्ष्मी धाम कहाँ स्थित है?\nयह मंदिर सिरोही जिला मुख्यालय से लगभग 3 से 4 किलोमीटर दूर कांडला हाईवे के पास स्थित है।\n\n2. माता महालक्ष्मी की प्रतिमा की ऊंचाई कितनी है?\nमाता महालक्ष्मी की प्रतिमा 81 इंच ऊंची है और इसे एक ही पत्थर से तैयार किया गया है।\n\n3. भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा से जुड़ी क्या मान्यता है?\nमान्यता है कि भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा दिन में तीन अलग-अलग रूपों—सुबह बालक, दोपहर में युवा और शाम को बुजुर्ग रूप में दिखाई देती है।\n\n4. मंदिर की दीवारों पर कौन से मंत्र लिखे गए हैं?\nमंदिर की दीवारों और संगमरमर पर 41 हजार बार ॐ, ह्रींकार और ॐ अरहम जैसे मंत्र उकेरे गए हैं।\n\n5. श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए क्या व्यवस्था है?\nतीर्थ परिसर में लगभग 108 वातानुकूलित कमरों वाली धर्मशाला और एक सात्विक जैन भोजनशाला की व्यवस्था है।",
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  "publishedAt": "2026-11-07",
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