संतान की दीर्घायु का महापर्व जीवित्पुत्रिका: घरों में गूंज रहे पारंपरिक लोकगीत, जानें पूजा विधान और गीतों के बोल जीवित्पुत्रिका व्रत पर माताएं बच्चों की लंबी उम्र और सलामती के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। इस पावन अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत पूजा की संपूर्ण विधि और मातृत्व की मंगलकामनाओं को दर्शाते हैं। संतान की लंबी आयु, निरोगी काया और खुशहाल भविष्य की मंगलकामना के साथ मनाया जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत आस्था का बेहद कठिन पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र अनुष्ठान 3 अक्टूबर को पड़ रहा है, जिस दौरान माताएं पूरे नियम और निष्ठा के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। इस धार्मिक उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता इसके पारंपरिक लोकगीत हैं, जो पूजा की शुरुआत से लेकर पारण तक हर घर और आंगन में गूंजते हैं। इन लोकगीतों के माध्यम से महिलाएं भगवान जीमूतवाहन से अपने बच्चों के सुरक्षित जीवन की विनती करती हैं और पर्व की सदियों पुरानी विधियों को सहेजती हैं। मातृत्व की प्रार्थना और व्रत की विधि समेटे पारंपरिक बोल जितिया से जुड़े पारंपरिक लोकगीतों में केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि तीन दिवसीय अनुष्ठान का पूरा ब्योरा समाया होता है। जब महिलाएं समूह में बैठकर इन गीतों को गाती हैं, तो उसमें पारिवारिक परंपराएं, सास से नियमों की सीख और भाईचारे की मिठास साफ दिखाई देती है। पहले प्रमुख लोकगीत में पूजा के विभिन्न चरणों और संस्कारों का सजीव वर्णन मिलता है जुग जुग जिए मोर बबुआ दुलरुवा, जिउत वहांन देवता से करब हम अरजिया। इस गीत के माध्यम से व्रती महिलाएं बताती हैं कि जितिया का उपवास कितना कठिन और महत्वपूर्ण होता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर निर्जला रहकर भगवान की उपासना की जाती है। गीत के बोल सप्तमी के नहाय-खाय से लेकर नवमी के पारण तक की हर रस्म को उजागर करते हैं। इसमें सप्तमी पर गंगा स्नान, नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी और नेनुआ के पत्तों पर पकवान बनाकर चील और सियारिन को भोग लगाने की रस्म का उल्लेख मिलता है। इसके साथ ही भोर में सरगही की परंपरा, अष्टमी की शाम को कथा सुनने का विधान और पूजन के लिए सोने की जिउतिया मंगवाने की आत्मीय भावनाएं भी इन पंक्तियों में बड़े सुंदर ढंग से पिरोई गई हैं। संतान की सफलता और आशीर्वाद का भावुक संदेश जितिया के गीतों का दूसरा पहलू मां और बच्चे के अगाध प्रेम और भावनात्मक लगाव को दर्शाता है। दूसरे पारंपरिक गीत में मां अपने बेटे की नजर उतारने, उसे बुरी नजर से बचाने और जीवन में सफलता पाने की दिल से दुआ मांगती है चंदा जैसन चमके ई मुखड़ा तोहार हो, जुग जुग जिय ए बबुआ हमार हो। गीत की इन कड़ियों में मां की कामना है कि उसके आंचल का फूल कभी न मुरझाए और संतान पर कभी कोई आंच न आए। व्रती महिला भगवान जीमूतवाहन से प्रार्थना करती है कि उसकी अपनी उम्र भी बच्चे को लग जाए और कोई भी बीमारी या संकट उसे छू तक न सके। इसके अलावा बच्चा खूब पढ़-लिखकर नाम कमाए और जीवन की किसी भी परेशानी से कभी न डरे, यह प्रेरणा भी गीतों में दी जाती है। पूरा आंगन बच्चे की मौजूदगी से ही जगमगाता है, इसलिए मां कठिन निर्जला व्रत रखकर ईश्वर से केवल संतान के कल्याण का आशीर्वाद मांगती है। इसका आप पर असर जीवित्पुत्रिका व्रत और इसके पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करने वाले परिवारों के लिए यह समय विशेष धार्मिक तैयारी का है। • भारत में: व्रत रखने वाली महिलाओं को 3 अक्टूबर 2026 की निर्धारित तिथि के अनुसार अपने निर्जला उपवास और पूजा सामग्री की व्यवस्था समय रहते पूरी करनी होगी। कठिन नियमों के चलते महिलाओं को स्वास्थ्य और खानपान के समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। • पारंपरिक अनुष्ठान: इस पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीत नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और पूजन विधि से जोड़े रखने में मदद करते हैं। परिवार के बुजुर्ग इन गीतों के माध्यम से अगली पीढ़ी को व्रत की सही रीतियां सिखा सकते हैं। • खानपान और खरीदारी: सप्तमी के नहाय-खाय से लेकर नवमी के पारण तक विशेष पारंपरिक अनाजों और सब्जियों की मांग स्थानीय बाजारों में बढ़ जाती है। व्रतियों को नोनी साग, मड़ुआ आटा और पूजा सामग्री की खरीदारी पहले से कर लेनी चाहिए। • पारिवारिक सामंजस्य: यह महापर्व परिवारों को एकजुट करने और बच्चों के कल्याण के लिए सामूहिक रूप से प्रार्थना करने का पावन अवसर देता है। महिलाएं मिलकर कथा सुनती हैं और गीतों के जरिए पारिवारिक सौहार्द को मजबूत करती हैं। ऐसा क्यों हुआ जीवित्पुत्रिका व्रत के दौरान इन पारंपरिक लोकगीतों को गाने और सुनने की सदियों पुरानी परंपरा का गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक आधार है। • आस्था और मान्यता: धार्मिक विश्वास के अनुसार भगवान जीमूतवाहन की आराधना करने से संतानों पर आने वाले संकट टलते हैं और उन्हें लंबी आयु का वरदान मिलता है। माताएं अपने बच्चों के कल्याण और रक्षा की भावना से प्रेरित होकर यह कठोर तप करती हैं। • मौखिक परंपरा का संरक्षण: प्राचीन काल में धार्मिक नियमों को याद रखने के लिए गीतों को माध्यम बनाया गया, जिससे सप्तमी से नवमी तक की पूरी पूजा विधि गीतों में सुरक्षित हो गई। इसी कारण आज भी नहाय-खाय, सरगही और पारण के नियम गीतों के रूप में जीवित हैं। • कठिन उपवास में संबल: लगभग 24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला रहने के दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करती हैं ताकि ध्यान ईश्वर में लगा रहे। यह संगीतमय माहौल कठिन शारीरिक उपवास को सरल और उत्साहवर्धक बना देता है। सवाल-जवाब 1. वर्ष 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत किस तारीख को मनाया जा रहा है? वर्ष 2026 में जीवित्पुत्रिका यानी जितिया का पावन व्रत 3 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। 2. जितिया व्रत मुख्य रूप से किस कामना के लिए रखा जाता है? यह कठिन व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से रखती हैं। 3. जितिया पर्व के दौरान किस देवता की मुख्य रूप से पूजा-अर्चना की जाती है? इस महापर्व के दौरान भगवान जीमूतवाहन की विशेष पूजा की जाती है और उनसे संतान की सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है। 4. जितिया के पारंपरिक लोकगीतों में किन प्रमुख रस्मों का उल्लेख मिलता है? गीतों में सप्तमी के नहाय-खाय, नोनी साग और मड़ुआ रोटी का भोजन, चील-सियारिन को भोग, अष्टमी की कथा और नवमी के पारण का उल्लेख मिलता है। https://trendkia.com/religion/sntana-ki-dirghayu-ka-mahaparva-jivitputrika-gharon-men-gunja-rahe-parnparika-lokagita-janen-puja-vidhana-aura-giton-ke-bola-42063 TrendKia — Har trend, sabse pehle.