# संतान की दीर्घायु का पर्व अहोई अष्टमी: पहली बार उपवास रख रहीं माताओं के लिए जरूरी दिशा-निर्देश और समय

> कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर संतान के कल्याण और लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखा जाता है। इस अवसर पर पूजा की समय-सारणी, चंद्रोदय और आवश्यक पारंपरिक सावधानियों का पालन करना आवश्यक माना गया है।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-10-31 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/sntana-ki-dirghayu-ka-parva-ahoi-ashtami-pahali-bara-upavasa-rakha-rahin-mataon-ke-lie-jaruri-disha-nirdesha-aura-samaya-53971 · **Language:** Hindi
**Tags:** अहोई अष्टमी, अहोई अष्टमी 2026, अहोई माता, कार्तिक माह, अष्टमी तिथि, निर्जला व्रत, पूजा मुहूर्त

संतान के सुखी जीवन, दीर्घायु और समृद्धि की कामना के साथ माताओं द्वारा किया जाने वाला अहोई अष्टमी का पावन उपवास हर वर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह अनुष्ठान अत्यंत कठोर तपस्या के समान माना जाता है, जिसमें महिलाएं पूरे दिन बिना जल ग्रहण किए निर्जला उपवास का पालन करती हैं। शाम के समय अहोई माता की विधिवत आराधना के पश्चात आकाश में तारों के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य समर्पित करने के साथ उपवास खोला जाता है। कई स्थानों पर स्थानीय मान्यताओं के अनुसार व्रती महिलाएं चंद्र देव को अर्घ्य देकर ही पारण संपन्न करती हैं। वर्ष 2026 में यह पवित्र व्रत 1 नवंबर को मनाया जाएगा। यदि कोई महिला पहली बार इस तप का संकल्प ले रही है, तो पूजा की समय-सारणी और आचार-संहिता के नियमों को समझना बहुत महत्वपूर्ण है।

## शुभ मुहूर्त और तिथियों का सटीक समय
पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से होगी। इस पावन तिथि का समापन अगले दिन यानी 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर होगा। उपासना और अनुष्ठान के लिए निर्धारित विशेष शुभ काल शाम 5 बजकर 36 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में अहोई माता की उपासना करना सर्वश्रेष्ठ फलदायी बताया गया है।

## तारों के दर्शन और चंद्रोदय की समय-सारणी
अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ की भांति ही कठिन नियमों से बंधा होता है। इस दिन सांझ ढलने पर आकाश में तारों को देखने का अनुकूल समय शाम 6 बजे रहेगा। जो महिलाएं तारों को देखकर अपना उपवास खोलती हैं, वे इस समय अर्घ्य दे सकती हैं। वहीं चंद्रमा को अर्घ्य देकर पारण करने वाली माताओं के लिए चंद्रोदय का समय रात 11 बजकर 40 मिनट पर दर्ज किया जाएगा। आकाश में स्पष्ट दर्शन और जल अर्पण से पूर्व अन्न या जल का एक घूंट भी लेना वर्जित माना गया है।

## पहली बार व्रत रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण आचार नियम
इस व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ पारंपरिक वर्जनाओं और नियमों का सख्ती से पालन करने की सलाह दी जाती है। व्रत के दौरान दिन के समय सोने से पूरी तरह बचना चाहिए, क्योंकि साधना काल में निद्रा को निषेध माना गया है। वस्त्रों के चयन में भी विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए; काले रंग के कपड़े भूलकर भी धारण न करें और केवल शुभ व मांगलिक रंगों के वस्त्र ही पहनें। इसके अलावा, उपवास के दिन चाकू, कैंची अथवा किसी भी धारदार या नुकीली वस्तु के उपयोग से दूर रहना आवश्यक है।

पूजा के समय पारंपरिक अहोई अष्टमी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि मान्यता है कि बिना कथा पाठ के इस अनुष्ठान का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यदि घर की दीवार पर पारंपरिक रूप से अहोई माता का चित्र उकेरना संभव न हो, तो बाजार से उपलब्ध अहोई माता के कैलेंडर या चित्र को स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन किया जा सकता है। शाम को अर्घ्य देने के उपरांत केवल सात्विक आहार ग्रहण करके ही पारण पूरा करना चाहिए।

## इसका आप पर असर
अहोई अष्टमी के अवसर पर व्रत रखने वाली माताओं को पूजा मुहूर्त और उपवास के कड़े नियमों के अनुसार अपनी दिनचर्या निर्धारित करनी होगी।

- **दैनिक दिनचर्या पर प्रभाव:** पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण न करने के कारण शारीरिक ऊर्जा का संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा। कामकाजी और गृहिणी महिलाओं को घरेलू कार्यों की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए ताकि भारी श्रम से बचा जा सके।
- **पूजा का समय प्रबंधन:** शाम 5 बजकर 36 मिनट से शाम 6 बजकर 54 मिनट के बीच पूजा सामग्री तैयार रखना जरूरी है। परिवार के सदस्यों को शाम 6 बजे तारों के दर्शन के समय अर्घ्य की थाली समय पर व्यवस्थित करनी होगी।
- **सात्विक भोजन की तैयारी:** पारण के समय केवल सात्विक भोजन ग्रहण करने का नियम होने के कारण तामसिक खाद्य पदार्थों से परहेज करना होगा। उपवास खोलने के लिए शुद्ध घी व बिना प्याज-लहसुन का भोजन पहले से तैयार रखा जाना चाहिए।
- **पारंपरिक सावधानियां:** व्रत रखने वाली महिलाओं को दिन भर धारदार वस्तुओं के उपयोग और दिन में सोने से बचना होगा। वस्त्रों के चयन में भी काले रंग का पूरी तरह त्याग कर मांगलिक रंगों की व्यवस्था पहले से कर लें।

## ऐसा क्यों हुआ
अहोई अष्टमी का अनुष्ठान सनातन परंपरा में माताओं द्वारा अपनी संतानों के कल्याण, आरोग्य और दीर्घायु के लिए निष्ठापूर्वक रखा जाता है।

- **धार्मिक और पौराणिक पृष्ठभूमि:** हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि संतान सुरक्षा के पूजन के लिए समर्पित मानी गई है। इस दिन अहोई माता की आराधना कर परिवार के वंश और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का आशीष मांगा जाता है।
- **कठोर निर्जला संकल्प का कारण:** करवा चौथ की भांति इस व्रत में माताओं का अटूट स्नेह और समर्पण झलकता है। शाम को तारों अथवा चंद्र देव के दर्शन कर अर्घ्य देने के बाद ही व्रत की पूर्णता स्वीकार की जाती है।
- **कथा और पारण के नियम:** मान्यताओं के अनुसार व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब विधिपूर्वक व्रत कथा सुनी जाए। कथा श्रवण और सात्विक पारण के बिना यह साधना अधूरी मानी जाती है।

## सवाल-जवाब

### 1. वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत किस तारीख को रखा जाएगा?
वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का पावन उपवास 1 नवंबर को रखा जाएगा।

### 2. अहोई अष्टमी 2026 के लिए पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
पूजा का शुभ मुहूर्त 1 नवंबर की शाम 5 बजकर 36 मिनट से शाम 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा।

### 3. अष्टमी तिथि कब शुरू होकर कब समाप्त होगी?
अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी।

### 4. तारों के दर्शन और चंद्रोदय का समय क्या रहेगा?
तारों को देखने का सांझ समय शाम 6 बजे रहेगा, जबकि चंद्रोदय रात 11 बजकर 40 मिनट पर होगा।

### 5. अहोई अष्टमी के दिन किन बातों की मनाही होती है?
इस दिन दिन में सोना, काले कपड़े पहनना और चाकू या कैंची जैसी धारदार चीजों का इस्तेमाल करना वर्जित माना गया है।

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