संतान की दीर्घायु के लिए जितिया व्रत में अवश्य करें इन पावन आरतियों का गान जीवित्पुत्रिका व्रत में संतान के उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और लंबी उम्र की कामना के साथ सूर्यदेव तथा जितिया माता की स्तुति का विशेष विधान है। सनातन परंपरा में संतानों के कल्याण, लंबी उम्र और सुरक्षित भविष्य के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले उपवासों में जीवित्पुत्रिका व्रत का स्थान बेहद प्रमुख है। लोक व्यवहार में जितिया के नाम से विख्यात यह कठिन अनुष्ठान पूरी तरह निर्जला रहकर संपन्न किया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 3 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। इस विशेष दिन पर माताएं पूरे नियम और संयम का पालन करते हुए अपनी संतानों के जीवन में खुशहाली और आरोग्य की मंगलकामना करती हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में स्तुति और आरती को पूजा का सबसे फलदायी अंग माना गया है, क्योंकि इसके माध्यम से अनजाने में हुई भूलचूक का परिहार होता है और साधना पूर्ण मानी जाती है। जीवित्पुत्रिका व्रत की धार्मिक महत्ता और परंपरा पंचांग के अनुसार हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर इस उपवास का विधान बनता है। पुत्र और पुत्री दोनों के मंगलमय जीवन, रोगमुक्ति और हर प्रकार के विघ्नों से रक्षा के उद्देश्य से माताएं अन्न और जल का पूर्ण त्याग करके यह साधना करती हैं। कठोर तप की इस प्रक्रिया के पश्चात विधिवत पूजन, कथा श्रवण और अंत में भक्तिभाव से आरती गाने का नियम है। ऐसी लोक मान्यता है कि विधिपूर्वक पूजनोपरांत आरती करने से मातृशक्ति को देवी और प्रत्यक्ष देवता सूर्य का अमोघ आशीष प्राप्त होता है। सूर्यदेव की पावन वंदना और स्तुति जीवित्पुत्रिका अनुष्ठान के दौरान भगवान भास्कर की आराधना का विधान अत्यंत आवश्यक माना जाता है। प्रत्यक्ष देव सूर्य समस्त जगत को ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं, इसलिए संतानों की जीवन रक्षा हेतु उनकी आरती गाई जाती है। इस स्तुति में कश्यप नंदन और अदिति नंदन के रूप में पूजित भुवन भास्कर के स्वरूप का गुणगान किया जाता है। सात अश्वों वाले दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर जो समस्त संसार के तिमिर और अज्ञान का नाश करते हैं, वे ही अपने भक्तों के कष्टों को हरने वाले हैं। दिव्य रश्मियों के स्वामी दिवाकर जीवन के समस्त पापों और संतापों को दूर कर आरोग्य प्रदान करते हैं। नेत्र रोगों और पृथ्वी के ताप का शमन करने वाले सूर्यदेव से भक्त तत्वज्ञान की प्राप्ति और संतान के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करते हैं। जितिया माता और राजा जीमूतवाहन का स्मरण पूजा अनुष्ठान के दूसरे चरण में जितिया महारानी की आरती की जाती है, जिनका संबंध धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन की पावन कथा से जुड़ा है। देवी जितिया समस्त जीवों का पालन करने वाली और मातृत्व की रक्षा करने वाली मानी जाती हैं। इस स्तुति में यह भाव प्रकट किया जाता है कि माता की कृपा से संतानों को लंबी आयु और निरोगी काया की प्राप्ति होती है। जिस घर में श्रद्धापूर्वक यह वंदना होती है, वहां सुख, समृद्धि और शांति का स्थायी वास होता है। संकटमोचिनी देवी अपने आराधकों के परिवार को हर विपदा से सुरक्षित रखती हैं और राजा जीमूतवाहन के त्याग व सत्यनिष्ठा की स्मृति को जनमानस में जागृत करती हैं। पूजा समापन पर प्रार्थना का विधान अनुष्ठान के अंतिम चरण में जब पूजन सामग्री अर्पित हो जाए, तब दोनों आरतियों का सस्वर पाठ करके भगवान को नमन करना चाहिए। अपनी संतानों के सिर पर दोनों हाथ रखकर या उनके उज्ज्वल भविष्य का मन में ध्यान धरकर माताएं यह कामना करती हैं कि उनके बच्चे सदा सन्मार्ग पर चलें और दीर्घायु हों। श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण से की गई यह आरती न केवल पूजा को पूर्णता प्रदान करती है, बल्कि परिवार के माहौल को भी सकारात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है। इसका आप पर असर यह पर्व पारिवारिक सुख, संतानों के स्वास्थ्य और पारंपरिक लोक संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। • धार्मिक नियम: इस वर्ष यह अनुष्ठान 3 अक्टूबर 2026 को पूरे विधि-विधान से संपन्न किया जाना तय है। व्रती महिलाओं को आश्विन अष्टमी की समयावधि में निर्जला उपवास का संकल्प बनाए रखना होता है। • पारिवारिक कल्याण: पूजा के अंत में सूर्यदेव और जितिया माता की स्तुति से अनुष्ठान को पूर्णता मिलती है। लोक मान्यताओं के अनुसार इससे बच्चों की दीर्घायु और घर-परिवार में शांति की प्राप्ति होती है। • सांस्कृतिक महत्व: सामूहिक रूप से गाई जाने वाली ये आरतियां लोक परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों को जीवंत रखती हैं। नई पीढ़ी को भी इन आध्यात्मिक अनुष्ठानों और त्याग की भावना से जुड़ने का अवसर मिलता है। • अनुष्ठान का अनुशासन: निर्जला व्रत के कठोर नियमों के कारण महिलाओं को मानसिक और शारीरिक संयम बरतना पड़ता है। पूजा के उपरांत ही पारण के साथ इस कठिन व्रत का समापन किया जाता है। ऐसा क्यों हुआ जीवित्पुत्रिका व्रत और उसकी आरतियों का गान सनातन धर्म की उस सुदीर्घ परंपरा का हिस्सा है, जहां माताएं संतानों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानती हैं। • धार्मिक पृष्ठभूमि: आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को धर्मशास्त्रों में संतानों के कल्याणार्थ साधना के लिए विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। मान्यता है कि इस तिथि पर प्रत्यक्ष देव सूर्य और कुलदेवियों की कृपा सहजता से प्राप्त होती है। • पौराणिक संदर्भ: यह पर्व धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन के महान त्याग और परोपकार की स्मृतियों से जुड़ा है। कथाओं के अनुसार उनके सत्य और तप के कारण ही संतानों की संकटों से रक्षा का यह विधान शुरू हुआ। • आरती का विधान: पूजा परंपरा में आरती को समापन का आवश्यक चरण माना गया है ताकि विधि में हुई किसी भी अनजानी कमी को सुधारा जा सके। सूर्यदेव को प्रत्यक्ष ऊर्जादाता मानकर उनका आभार प्रकट करने के लिए यह वंदना की जाती है। सवाल-जवाब 1. वर्ष 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत किस तिथि को रखा जाएगा? साल 2026 में जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। 2. जितिया व्रत किस हिंदू महीने और पक्ष में मनाया जाता है? यह पावन उपवास प्रतिवर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को संपन्न किया जाता है। 3. जीवित्पुत्रिका व्रत में किस प्रकार का उपवास रखा जाता है? इस पर्व पर माताएं अपनी संतानों के दीर्घ जीवन के लिए अन्न और जल का त्याग कर निर्जला व्रत रखती हैं। 4. जितिया व्रत की पूजा के समापन पर किनकी आरतियां गाई जाती हैं? पूजा संपन्न होने के पश्चात प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव और जितिया माता की पावन आरतियों का गान किया जाता है। 5. जितिया व्रत की पौराणिक कथा किस धर्मात्मा राजा से जुड़ी है? यह पावन व्रत और इसकी महिमा सत्यवादी व परोपकारी राजा जीमूतवाहन की कथा से संबंधित है। https://trendkia.com/religion/sntana-ki-dirghayu-ke-lie-jitiya-vrat-men-avashya-karen-ina-pavana-aratiyon-ka-gana-41975 TrendKia — Har trend, sabse pehle.