तेलंगाना के इस अनोखे तीर्थ में है 123 फीट ऊंची कुमारस्वामी की प्रतिमा, नाग बांबी पर हिंदू-मुस्लिम दोनों टेकते हैं माथा तेलंगाना के नवुलूरू गांव में कार्तिक मास के दौरान भगवान कुमारस्वामी के 123 फीट ऊंचे भव्य मंदिर और स्वयंभू नाग बांबी के दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग समान आस्था के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के धार्मिक गलियारों में इन दिनों कार्तिक मास की रौनक अपने चरम पर है। हिंदू परंपराओं के अनुसार कार्तिक महीने को साधना, पूजा-पाठ और आराधना के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। इस पूरे महीने में भगवान शिव, उनके परिवार के सदस्यों और नाग देवताओं की पूजा करने की विशेष परंपरा है। इसी का परिणाम है कि तेलंगाना के नवुलूरू गांव में स्थित एक विशेष तीर्थ स्थल पर सुबह से लेकर शाम तक भक्तों का तांता लगा हुआ है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह देखते ही बनता है, क्योंकि इस क्षेत्र में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है। 123 फीट ऊंची भगवान कुमारस्वामी की विशाल प्रतिमा इस तीर्थ स्थल की सबसे बड़ी और प्रमुख आकर्षण भगवान कुमारस्वामी की 123 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कुमारस्वामी महादेव शिव और माता पार्वती के सुपुत्र हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में श्रद्धालु इन्हें कार्तिकेय, मुरुगन, स्कंद और सुब्रह्मण्य स्वामी जैसे विभिन्न नामों से पूरे आदर और भक्ति भाव के साथ पूजते हैं। नवुलूरू में स्थापित यह विशालकाय प्रतिमा अपनी अद्भुत कला और भव्यता के कारण दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। कार्तिक मास के पवित्र अवसर पर इस巨大 प्रतिमा के प्रांगण में विशेष धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और भव्य दीपदान का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। नागेंद्र स्वामी की स्वयंभू बांबी और उसकी मान्यताएं इस भव्य प्रतिमा के बिल्कुल नजदीक ही नागेंद्र स्वामी की एक स्वयंभू बांबी मौजूद है, जिसका भक्तों के बीच बहुत गहरा आध्यात्मिक महत्व है। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं का ऐसा विश्वास है कि यह नाग बांबी किसी मनुष्य द्वारा नहीं बनाई गई बल्कि यह अपने आप प्रकट हुई है। खासकर कार्तिक मास और नागुल चविती के पावन पर्व के दौरान इस पवित्र बांबी की पूजा करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने वाले दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और उनके घर-परिवार में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। महिलाएं बड़ी संख्या में पारंपरिक अनुष्ठानों का पालन करते हुए इस बांबी पर दूध, फल और फूल अर्पित करती हैं तथा अपने परिवार की खुशहाली और सदस्यों की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द और एकता का अनूठा केंद्र नवुलूरू के इस पावन और प्रतिष्ठित स्थल की सबसे बड़ी और खास विशेषता यहां का अनोखा सामाजिक और धार्मिक भाईचारा है। इस पवित्र नाग बांबी और मंदिर परिसर में केवल हिंदू समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी पूरी श्रद्धा, विश्वास और सम्मान के साथ आकर सिर झुकाते हैं। आपसी मेल-मिलाप, सौहार्द और एकता का यह जीवंत दृश्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण देता है कि सच्ची भक्ति और आस्था किसी भी प्रकार के मजहब की मोहताज नहीं होती। कार्तिक मास की वजह से इस पूरे परिसर का वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो चुका है, जहां हर हर महादेव और सुब्रह्मण्य स्वामी के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज रहा है। मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों की सुविधा, सुचारू व्यवस्था और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर सभी आवश्यक पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी को भी किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। इसका आप पर असर इस तीर्थ स्थल पर उमड़ने वाली भारी भीड़ और स्थानीय आयोजनों से क्षेत्र के धार्मिक पर्यटन को बड़ा बढ़ावा मिल रहा है। • धार्मिक पर्यटन में वृद्धि: कार्तिक मास के दौरान नवुलूरू गांव में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने से स्थानीय व्यापार और परिवहन सेवाओं को गति मिलती है। • सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश: हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों द्वारा समान आस्था दिखाने से समाज में आपसी भाईचारा और मजबूत होता है। • स्थानीय सुरक्षा और प्रबंधन: तीर्थयात्रियों की भारी संख्या को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और प्रबंधकों को सुरक्षा तथा यातायात के कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं। • संतान सुख और समृद्धि की मान्यता: विशेष पर्वों पर महिलाएं पारंपरिक अनुष्ठान कर परिवार की खुशहाली के लिए मनोकामनाएं मांगती हैं। ऐसा क्यों हुआ कार्तिक मास को हिंदू धर्म में विशेष रूप से पवित्र माना जाता है, जिसके कारण इस दौरान मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर भक्तों की संख्या में भारी वृद्धि होती है। प्राचीन मान्यताओं और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण लोग इस अवधि में विशेष अनुष्ठान करते हैं। • कार्तिक मास का धार्मिक महत्व: इस पूरे महीने में भगवान शिव, कार्तिकेय और नाग देवताओं की पूजा करने का विधान है, जिससे विशेष फल की प्राप्ति होती है। • स्वयंभू बांबी की मान्यता: स्थानीय लोगों की अटूट आस्था है कि नागेंद्र स्वामी की यह बांबी स्वतः प्रकट हुई थी, जो इसे अत्यंत चमत्कारी बनाती है। • सांस्कृतिक परंपराएं: दक्षिण भारत में नागुल चविती और कार्तिक मास के दौरान संतान प्राप्ति और पारिवारिक कल्याण के लिए अनुष्ठान करने की पुरानी परंपरा है। • स्थानीय सौहार्द: नवुलूरू गांव की साझी संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं सभी धर्मों के लोगों को इस स्थान से जोड़ती हैं। सवाल-जवाब 1. यह तीर्थ स्थल कहाँ स्थित है? यह पावन तीर्थ स्थल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना क्षेत्र के नवुलूरू गांव में स्थित है। 2. यहाँ भगवान कुमारस्वामी की प्रतिमा कितनी ऊंची है? यहाँ स्थापित भगवान कुमारस्वामी की विशालकाय प्रतिमा 123 फीट ऊंची है। 3. कार्तिक मास का इस स्थान से क्या संबंध है? कार्तिक मास को पूजा-पाठ के लिए पवित्र माना जाता है और इस दौरान यहाँ विशेष पूजा तथा दीपदान का आयोजन होता है। 4. नाग बांबी की पूजा का क्या महत्व है? यहाँ की स्वयंभू नाग बांबी की पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 5. इस स्थान की सामाजिक विशेषता क्या है? इस पवित्र स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग पूरी आस्था के साथ सिर झुकाते हैं, जो आपसी सौहार्द का प्रतीक है। https://trendkia.com/religion/telangana-village-draws-massive-crowds-with-123-foot-murugan-statue-and-snake-anthill-57967 TrendKia — Har trend, sabse pehle.