# दुर्गा पूजा से पहले वेश्यालय की मिट्टी जुटाने की अनोखी परंपरा और प्रतिमा निर्माण के नियम

> दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग किया जाता है। मूर्तिकला की इस पूरी प्रक्रिया में कई पारंपरिक रस्में और अनुष्ठान निभाए जाते हैं।

**Type:** article · **Category:** धर्म · **Published:** 2026-10-17 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/religion/unique-brothel-soil-rituals-and-idol-making-traditions-ahead-of-durga-puja-48738 · **Language:** Hindi
**Tags:** दुर्गा पूजा, कुम्हारटोली, पुण्य माटी, मूर्ति निर्माण, चक्षुदान, कोलकाता

दुर्गा पूजा का यह पावन उत्सव षष्ठी तिथि से शुरू होकर विजयादशमी तक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि का यह पर्व पूरे देश में अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं के साथ जीवंत हो उठता है, जबकि दुर्गा पूजा मुख्य तौर पर पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और ओडिशा जैसे पूर्वी राज्यों में विशेष धूमधाम से आयोजित की जाती है। इस भव्य आयोजन के दौरान अक्सर यह चर्चा होती है कि मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण करने में वेश्यालय के आंगन की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इस मिट्टी को मांगते समय कौन-कौन सी खास रस्में पूरी की जाती हैं और प्रतिमा तैयार करने की पूरी विधि क्या होती है।

## विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का मिश्रण
मां दुर्गा की इन भव्य और सजीव मूर्तियों को गढ़ने में मूर्तिकार महीनों की कठिन मेहनत करते हैं। वे किसी एक मिट्टी का उपयोग करने के बजाय अलग-अलग गुणों वाली कई खास मिट्टियों का मिश्रण तैयार करते हैं। आधुनिक समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इको-फ्रेंडली मूर्तियों का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है, ताकि उत्सव के समापन के बाद जलाशयों को प्रदूषण से बचाया जा सके। इस मिश्रण में मुख्य रूप से गंगा की मिट्टी जिसे कैटल माटी कहा जाता है, दोआश माटी, पुण्य माटी और बेलर माटी का उपयोग किया जाता है।

मूर्ति निर्माण की परंपरा के अनुसार वेश्यालय के आंगन या चौखट से लाई जाने वाली मिट्टी को पुण्य माटी का नाम दिया गया है। इस खास मिट्टी को गंगा नदी की मिट्टी, गाय के गोबर और गोमूत्र के साथ मिलाकर मूर्ति का आधार तैयार किया जाता है। प्राचीन रीति-रिवाजों के अनुसार कोई पुजारी या खुद मूर्तिकार वेश्यालय जाते हैं और वहां के निवासियों से आशीर्वाद या उपहार के रूप में इस मिट्टी की मांग करते हैं। मिट्टी प्राप्त करने के पश्चात शगुन के रूप में उन्हें वस्त्र, श्रृंगार का सामान और कुछ आर्थिक राशि भी भेंट की जाती है।

## वेश्यालय की मिट्टी के पीछे की पौराणिक कथा
वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को लेकर यह गहरी मान्यता है कि वहां रहने वाले लोग समाज के कृत्रिम नियमों से परे अपने सारे पुण्य, कर्म और पवित्रता को पीछे छोड़ देते हैं, इसलिए वहां की मिट्टी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इस अनूठी प्रथा के माध्यम से समाज के इन हाशिए पर खड़े लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का मानवीय उद्देश्य भी छिपा है। एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कुछ वेश्याओं ने मिलकर एक गंभीर रूप से पीड़ित कुष्ठ रोगी की बहुत सेवा-सुश्रुषा की थी। वह कुष्ठ रोगी कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव थे। उन महिलाओं की निष्ठा और सेवा से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें वरदान दिया था कि आज के बाद से उनके आंगन की मिट्टी के बिना मां दुर्गा की कोई भी प्रतिमा पूर्ण नहीं मानी जाएगी और उसी समय से यह परंपरा चली आ रही है।

## चैत्र संक्रांति से शुरू होता है मूर्तिकला का कार्य
कोलकाता के उत्तरी हिस्से में स्थित लगभग 300 साल पुरानी प्रसिद्ध पारंपरिक बस्ती कुम्हारटोली को कला, आस्था और अर्थशास्त्र का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां मूर्तियां बनाने की प्रक्रिया उत्सव शुरू होने से कई महीने पहले यानी बंगाली वर्ष के अंतिम दिन चैत्र संक्रांति के दिन एक विशेष अनुष्ठान के साथ आरंभ हो जाती है। सबसे पहले मजबूत बांस और पुआल की सहायता से देवी का मूल ढांचा खड़ा किया जाता है, जिसे काठामो के नाम से पुकारा जाता है। इस ढांचे को अतिरिक्त मजबूती देने के लिए सुंदरबन से मंगवाए गए विशेष पुआल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे मजबूत जूट की रस्सियों से कसा जाता है। कुम्हारटोली की यह संपूर्ण मूर्तिकला टेराक्रूडा तकनीक पर आधारित है, जिसका सीधा अर्थ धूप में सुखाई गई बिना पकी कच्ची मिट्टी के प्रयोग से है।

मूर्ति को एक ठोस और सुंदर आकार देने के लिए मिट्टी का लेपन कई अलग-अलग चरणों में पूरा किया जाता है। प्रतिमाओं के निर्माण में वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक दोनों दृष्टियों से मुख्य रूप से तीन प्रकार की मिट्टियों का उपयोग किया जाता है। एंटेल माटी एक बेहद चिपचिपी और सख्त काली मिट्टी होती है, जिसे पानी में घोलकर सबसे पहले पुआल के ढांचे पर थापा जाता है ताकि पुआल की सारी दरारें अच्छे से भर जाएं और मूर्ति को एक मजबूत आधार मिल सके। इसके बाद गंगा माटी का उपयोग किया जाता है जो नदी के तल की बेहद कोमल और चिकनी मिट्टी होती है। इसका लेप देवी के सुंदर शरीर को अंतिम रूप देने और उनकी त्वचा को कोमलता प्रदान करने के वास्ते किया जाता है।

## चक्षुदान और पारंपरिक शृंगार शैलियां
मिट्टी पूरी तरह सूख जाने के बाद मूर्तिकार इन प्रतिमाओं को चमकीले और आकर्षक रंगों से सजाते हैं। इस पूरी निर्माण प्रक्रिया के दौरान देवी की आंखें कपड़े की पट्टी से ढकी रहती हैं। महालया के पवित्र दिन, जो पितृ पक्ष के समापन और देवी पक्ष के आगमन का संकेत देता है, कुशल कारीगर शंख की गूंज के बीच देवी की आंखें उकेरते हैं। चक्षुदान के नाम से जानी जाने वाली इस अत्यंत पवित्र प्रक्रिया के माध्यम से ही यह माना जाता है कि प्रतिमा में प्राणों का संचार हो गया है।

माता की प्रतिमा के शृंगार में ऐतिहासिक रूप से दो प्रमुख शैलियों का दबदबा रहा है। पहली शैली शोला साज कहलाती है, जो दलदली इलाकों में उगने वाले सफेद जलीय पौधे के भीतरी स्पंजी हिस्से से तैयार की जाती है और यह पूरी तरह से प्राकृतिक तथा बायोडिग्रेडेबल होती है। दूसरी लोकप्रिय शैली डाक का साज है, जिसकी शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान हुई थी जब रईस जमींदार अपनी मूर्तियों को अलौकिक रूप से सजाने के लिए जर्मनी से डाक के जरिए विशेष चांदी के वर्क और महीन धागे मंगवाया करते थे।

## सवाल-जवाब

### 1. दुर्गा पूजा की प्रतिमा बनाने में किस प्रकार की मिट्टी का उपयोग किया जाता है?
प्रतिमा बनाने के लिए गंगा की मिट्टी यानी कैटल माटी, दोआश माटी, पुण्य माटी और बेलर माटी का मिश्रण उपयोग किया जाता है।

### 2. पुण्य माटी किसे कहा जाता है?
वेश्यालय के आंगन या चौखट से लाई जाने वाली मिट्टी को पुण्य माटी कहा जाता है।

### 3. वेश्यालय की मिट्टी उपयोग करने के पीछे क्या पौराणिक कथा है?
मान्यता है कि वेश्याओं द्वारा भगवान शिव के कुष्ठ रोगी रूप की सेवा करने से प्रसन्न होकर उन्होंने वरदान दिया था कि उनके आंगन की मिट्टी के बिना दुर्गा प्रतिमा पूर्ण नहीं होगी।

### 4. मूर्तिकला की प्रक्रिया किस दिन से शुरू होती है?
मूर्तिकला की प्रक्रिया बंगाली वर्ष के अंतिम दिन यानी चैत्र संक्रांति के अवसर पर विशेष अनुष्ठान के साथ शुरू होती है।

### 5. चक्षुदान की रस्म कब निभाई जाती है?
महालया के पवित्र दिन कारीगर शंख की ध्वनि के बीच देवी की आंखें उकेरते हैं, जिसे चक्षुदान कहा जाता है।

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