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  "type": "article",
  "title": "अंतरिक्ष में लेजर से बिजली पहुंचाने का पहला बड़ा प्रयोग, स्पेसएक्स रॉकेट से उड़ेगा प्रोटोटाइप सैटेलाइट",
  "summary": "फ्लोरिडा का स्टार्टअप स्टार कैचर कक्षा में तैरते दूसरे सैटेलाइट पर लेजर बीम के जरिए सौर ऊर्जा भेजने की ऐतिहासिक तैयारी में जुटा है, जिससे उपग्रहों को भारी बैटरी के बिना लगातार पावर मिल सकेगी।",
  "content": "धरती की कक्षा में चक्कर काट रहे उपग्रहों को बिजली देने के लिए अब अंतरिक्ष में ही लेजर पावर ग्रिड तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। फ्लोरिडा के जैक्सनविले स्थित एक उभरता हुआ स्टार्टअप, स्टार कैचर, सूर्य की किरणों को केंद्रित कर लेजर बीम की मदद से दूसरे उपग्रहों के सौर पैनलों तक ऊर्जा पहुंचाने का काम शुरू करने जा रहा है। कंपनी अपने प्रोटोटाइप सिस्टम को इसी सप्ताह स्पेसएक्स के एक रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजने की अंतिम तैयारियों में जुटी है। इस मिशन का मुख्य मकसद कक्षा में मौजूद एक अन्य उपग्रह तक बिना किसी तार या केबल के लेजर के जरिए ऊर्जा का सफल संचरण करना है।\n\nअगर यह प्रयोग उम्मीद के मुताबिक सफल रहता है, तो मानव इतिहास में पहली बार ऐसा होगा जब अंतरिक्ष में तैरती दो पूरी तरह अलग-अलग और स्वतंत्र वस्तुओं के बीच लेजर द्वारा बिजली भेजी जाएगी। अंतरिक्ष से सौर ऊर्जा एकत्र करने और वितरित करने का यह सपना बिल्कुल नया नहीं है। मशहूर विज्ञान कथा लेखक आइजैक असिमोव ने वर्ष 1941 में लिखी अपनी एक साइंस फिक्शन रचना में इस विचार की रूपरेखा रखी थी, जिसके बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 1970 के दशक में इस पर गंभीर तकनीकी अध्ययन भी किया था। उस दौर में अंतरिक्ष में भारी-भरकम हार्डवेयर और उपकरण भेजना इतना खर्चीला था कि अंतरिक्ष में ऊर्जा पैदा कर उसे किसी अन्य जगह भेजना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता था। मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर द साइंस ऑफ लाइट की शोधकर्ता हनिएह फत्ताही का कहना है कि अब रॉकेट प्रक्षेपण की लागत में भारी गिरावट आने के कारण ऐसी कक्षीय ऊर्जा परियोजनाएं वास्तविक रूप लेती दिख रही हैं।\n\nअंतरिक्ष में पावर ग्रिड का नया ढांचा\nमौजूदा समय में उपग्रहों को अपनी सभी ऊर्जा जरूरतें खुद ही पूरी करनी पड़ती हैं। स्टार कैचर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक एंड्रयू रश का कहना है कि अंतरिक्ष में कोई साझा बिजली ग्रिड नहीं है और वहां जाने वाला हर मिशन एक तरह से कैंपिंग ट्रिप की तरह अपने सारे संसाधन खुद ढोता है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए कंपनी ने एक खास ढांचा तैयार किया है, जिसे वह पावर नोड्स कहती है। ये नोड्स एक ही समय में सौर ऊर्जा संयंत्र और अदृश्य बिजली लाइन दोनों की तरह कार्य करते हैं।\n\nइस तकनीक में कंपनी के सैटेलाइट लेंसों के एक बड़े समूह के जरिए सूरज की रोशनी को सोखते हैं। इसके बाद इस धूप को प्रकाश की उन चुनिंदा तरंग दैर्ध्य में परिष्कृत किया जाता है, जिनके बारे में कंपनी का दावा है कि वे सामान्य धूप की तुलना में 10 गुना तक अधिक ऊर्जा प्रदान कर सकती हैं। इस सांद्रित ऊर्जा को एक सटीक लेजर बीम में बदलकर जरूरतमंद उपग्रहों की दिशा में छोड़ दिया जाता है, जो एक पारदर्शी और वायरलेस संचरण तार जैसा काम करती है। एंड्रयू रश के मुताबिक, इससे सैटेलाइट संचालकों को अधिक काम करने का समय मिलेगा और उनकी कमाई में उल्लेखनीय इजाफा होगा।\n\nपेलोड का वजन घटेगा और नई तकनीक को जगह मिलेगी\nअंतरिक्ष अभियानों में वजन एक बेहद संवेदनशील और महंगा कारक है। जब किसी वस्तु को कक्षा में भेजने के लिए प्रति किलोग्राम हजारों डॉलर का खर्च आता है, तब भारी बैटरियों का आकार घटाकर उनकी जगह उपयोगी वैज्ञानिक उपकरणों को लगाना अंतरिक्ष अभियानों की दिशा बदल सकता है। मिसाल के तौर पर, अंतरिक्ष में स्थापित किए जाने वाले डेटा सेंटरों के लिए भारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है और बैटरियों का वजन कम होने पर वहां अधिक संख्या में जीपीयू लगाए जा सकते हैं।\n\nस्टार कैचर के इस दृष्टिकोण को बाजार में काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। कंपनी ने इस साल की शुरुआत में 65 मिलियन डॉलर के पूंजी निवेश की घोषणा की थी। इसके साथ ही उसे यूनाइटेड स्टेट्स स्पेस फोर्स से 30 मिलियन डॉलर का वित्तीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। व्यावसायिक स्तर पर कंपनी ने संभावित खरीदारों के साथ 40 आशय पत्र दर्ज किए हैं और 10 दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते भी पूरे कर लिए हैं। अंतरिक्ष आधारित उद्योगों का भविष्य कितना उज्ज्वल माना जा रहा है, इसका प्रमाण यह भी है कि इसी स्पेसएक्स मिशन पर गूगल का भी पहला अंतरिक्ष आधारित डेटा सेंटर प्रयोग भेजा जा रहा है।\n\nप्रोटोस्टार के जरिए कक्षा में ट्रैकिंग का परीक्षण\nइस सप्ताह जो सैटेलाइट लॉन्च किया जा रहा है, उसका नाम प्रोटोस्टार रखा गया है। यह उन बड़े उपग्रहों का एक छोटा प्रोटोटाइप संस्करण है, जिन्हें स्टार कैचर भविष्य में पूरी दुनिया के लिए तैनात करने की योजना बना रही है। एंड्रयू रश को उम्मीद है कि दशक के अंत से पहले उनकी कंपनी कक्षा में व्यावसायिक स्तर पर बिजली वितरण की विश्वसनीय सेवाएं देने लगेगी। यह पहला मौका होगा जब जमीन पर परखे गए सभी अलग-अलग घटक अंतरिक्ष के कठोर वातावरण में एक साथ मिलकर काम करेंगे।\n\nइस मिशन के तहत कंपनी अपनी स्वचालित ट्रैकिंग तकनीक का उपयोग करते हुए ठीक उसी समय लॉन्च हो रहे एक स्वतंत्र क्यूबसैट की ओर ऊर्जा की किरण भेजेगी। एंड्रयू रश ने बताया कि इस प्रदर्शन का एक अहम हिस्सा यह नापना है कि जैसे-जैसे क्यूबसैट प्रोटोस्टार से दूर जाता है, वह कितनी मात्रा में बिजली ग्रहण करता है, और फिर इस वास्तविक आंकड़े की तुलना अपने कंप्यूटर मॉडलों से करना है। इससे पहले कंपनी ने उपग्रहों को ट्रैक करने की अपनी प्रणाली का अंतरिक्ष में सीमित परीक्षण किया था, जबकि जमीन पर उसने डार्पा द्वारा बनाए गए पुराने रिकॉर्ड को तोड़ते हुए लेजर से पावर बीमिंग का एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया था।\n\nजमीनी रिकॉर्ड से अंतरिक्ष की चुनौतियों तक का सफर\nधरती पर किए गए उस सफल परीक्षण में कंपनी ने बाजार में सामान्य रूप से उपलब्ध सौर पैनलों पर 1 किलोवाट से अधिक बिजली सफलतापूर्वक भेजी थी, जो एक साधारण माइक्रोवेव ओवन को चलाने के लिए काफी है। हालांकि बड़े संचार उपग्रहों या भारी डेटा सेंटरों को चलाने के लिए आवश्यक बिजली की तुलना में यह मात्रा अभी काफी कम है। लेकिन एंड्रयू रश का मानना है कि जमीन पर मिली इस सफलता ने ही उन्हें कक्षा में वास्तविक प्रयोग करने का भरोसा दिया है। उनके अनुसार, स्टार कैचर अभी घिसटकर चलने वाले दौर में है और जल्द ही खड़े होकर दौड़ने की तैयारी कर रहा है।\n\nअंतरिक्ष में लेजर के इस्तेमाल का यह पहला प्रयास नहीं है। वर्ष 2023 में अमेरिकी नौसेना अनुसंधान प्रयोगशाला ने 100 दिनों तक चलने वाला एक प्रयोग पूरा किया था, जिसमें अंतरिक्ष लेजर से ऊर्जा उत्पन्न की गई थी। हालांकि वह प्रयोग केवल एक ही यूनिट के भीतर सीमित था और लेजर बीम 5 फीट से भी कम दूरी तय कर पाई थी। इसके अलावा वह लेजर केवल 11 प्रतिशत की दक्षता पर काम कर रहा था। शोधकर्ता हनिएह फत्ताही बताती हैं कि लेजर तकनीक को व्यावसायिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए इस तरह की कम दक्षता की बाधा को पार करना होगा। साथ ही जटिल ट्रैकिंग सिस्टम को मजबूत बनाना, अत्यधिक गर्मी का सटीक प्रबंधन करना और अंतरिक्ष के शून्य और भीषण ठंड में उपकरणों का कई वर्षों तक टिके रहना साबित करना जरूरी होगा।\n\nवैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष से सौर ऊर्जा धरती तक लाने के लिए माइक्रोवेव तरंगों पर भी काम किया है, जिसमें कैलटेक के शोधकर्ताओं ने उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए थे। यद्यपि माइक्रोवेव ज्यादा ऊर्जा ला सकते हैं, लेकिन उन्हें धरती पर पकड़ने के लिए बेहद विशाल रिसीवर की जरूरत पड़ती है, जबकि लेजर बहुत छोटे लक्ष्य पर भी सटीक वार कर सकता है। एंड्रयू रश का मानना है कि जैसे-जैसे कक्षा में बुनियादी ढांचे का विस्तार होगा, अंतरिक्ष में अधिक सक्षम और भारी उद्योगों को स्थापित करना सस्ता होता जाएगा, और यह प्रयास दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेटों की तरह अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए युगांतरकारी साबित होगा।\n\nइसका आप पर असर\nअंतरिक्ष में वायरलेस बिजली वितरण प्रणाली विकसित होने से उपग्रहों की लागत घटेगी और मौसम पूर्वानुमान, संचार व जीपीएस सेवाओं की विश्वसनीयता में सुधार देखने को मिलेगा।\n\n• उपग्रह सेवाओं पर असर: उपग्रहों को भारी बैटरियों की जगह अधिक आधुनिक ट्रांसपोंडर और सेंसर लगाने की छूट मिलेगी। इसके चलते आम उपभोक्ताओं के लिए मोबाइल नेटवर्क कवरेज, टीवी ब्रॉडकास्टिंग और इंटरनेट सेवाएं पहले से अधिक निर्बाध हो सकेंगी।\n• अंतरिक्ष मिशनों की लागत: रॉकेट से उपग्रह भेजने का खर्च कम होगा क्योंकि ऊर्जा भंडारण के लिए भारी वजन नहीं ढोना पड़ेगा। इसका सीधा लाभ अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसियों और वाणिज्यिक कंपनियों को अपनी सेवाएं सस्ती करने में मिलेगा।\n• क्लाउड और डेटा प्रोसेसिंग: कक्षा में डेटा सेंटर स्थापित होने से जटिल कंप्यूटिंग और वैज्ञानिक गणनाएं तेजी से संभव हो सकेंगी। धरती के बाहर सर्वर चलने से भू-स्थानिक डेटा और प्राकृतिक आपदाओं की चेतावनी मिलने की गति तेज होगी।\n• भविष्य की ऊर्जा तकनीक: वायरलेस पावर ट्रांसमिशन के सफल परीक्षणों से भविष्य में धरती के दूरदराज इलाकों में भी बिजली पहुंचाने के नए रास्ते खुलेंगे। यह अनुसंधान आने वाले दशकों में सौर ऊर्जा के उपयोग की पूरी परिभाषा बदल सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nरॉकेट प्रक्षेपण की लागत में आई भारी कमी और उपग्रहों पर अधिक शक्ति वाले उपकरणों की बढ़ती मांग ने अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा ग्रिड बनाने की इस नई परियोजना को जन्म दिया है।\n\n• प्रक्षेपण लागत में गिरावट: दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेटों के आगमन से हार्डवेयर को कक्षा में ले जाने का प्रति किलोग्राम खर्च काफी नीचे आ गया है। इस वित्तीय बदलाव के चलते दशकों पुराना सैद्धांतिक विचार अब पहली बार व्यावसायिक दृष्टि से लाभकारी बन पाया है।\n• कक्षा में बिजली की कमी: पारंपरिक उपग्रह केवल अपनी सीमित सौर प्लेटों और भारी बैटरियों पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता सीमित हो जाती है। कक्षा में तैरता हुआ एक साझा बिजली ग्रिड इस मजबूरी को खत्म कर पेलोड के लिए अधिक स्थान उपलब्ध कराता है।\n• जमीनी परीक्षणों की सफलता: स्टार्टअप ने जमीन पर 1 किलोवाट बिजली बीम करने का रिकॉर्ड कायम कर अपनी तकनीक की बुनियादी व्यवहार्यता साबित कर दी थी। इसी भरोसे के दम पर अमेरिकी अंतरिक्ष बल से अनुदान और निवेशकों से जरूरी वित्तीय सहायता जुटाने में मदद मिली।\n• अंतरिक्ष डेटा सेंटरों की जरूरत: गूगल जैसी बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां अंतरिक्ष में सर्वर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रोसेसर स्थापित करने की तैयारी कर रही हैं। इन भारी-भरकम कंप्यूटरों को चलाने के लिए सामान्य सौर प्लेटों की तुलना में कई गुना अधिक सांद्रित ऊर्जा की आवश्यकता होती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. स्टार कैचर का यह मिशन वास्तव में क्या करने जा रहा है?\nयह मिशन अंतरिक्ष में लेजर बीम का उपयोग करके एक उपग्रह से दूसरे स्वतंत्र उपग्रह तक सौर ऊर्जा से बनी बिजली भेजने का पहला परीक्षण करेगा।\n\n2. इस प्रयोग को अंतरिक्ष में किस रॉकेट की मदद से भेजा जा रहा है?\nइस परीक्षण प्रणाली और प्रोटोटाइप सैटेलाइट को स्पेसएक्स के रॉकेट की मदद से कक्षा में प्रक्षेपित किया जा रहा है।\n\n3. प्रोटोस्टार सैटेलाइट का क्या कार्य होगा?\nप्रोटोस्टार एक छोटा प्रोटोटाइप उपग्रह है, जो साथ में छूटने वाले क्यूबसैट की ओर लेजर बीम से ऊर्जा भेजकर ट्रैकिंग और बिजली ग्रहण करने की क्षमता नापेगा।\n\n4. लेजर से ऊर्जा भेजने की तकनीक सामान्य धूप से कितनी बेहतर है?\nकंपनी के अनुसार, प्रकाश तरंगों को परिष्कृत कर लेजर के रूप में केंद्रित करने से यह सामान्य धूप की तुलना में 10 गुना तक अधिक ऊर्जा दे सकती है।\n\n5. जमीन पर किए गए परीक्षण में कंपनी ने कितनी बिजली ट्रांसफर की थी?\nकंपनी ने धरती पर सामान्य सौर पैनलों की ओर 1 किलोवाट से अधिक बिजली भेजी थी, जो एक माइक्रोवेव ओवन को चलाने जितनी होती है।\n\n6. अंतरिक्ष में लेजर ऊर्जा संचरण के सामने मुख्य तकनीकी चुनौतियां क्या हैं?\nमुख्य चुनौतियों में सिस्टम की ऊर्जा दक्षता बढ़ाना, लेजर की अत्यधिक गर्मी को नियंत्रित करना और अंतरिक्ष के भीषण ठंड भरे शून्य में वर्षों तक सटीक ट्रैकिंग बनाए रखना शामिल है।",
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  "category": "विज्ञान",
  "publishedAt": "2026-09-29",
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    "अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी",
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