अंतरिक्ष में सफेद बौने तारे अब सिर्फ सफेद नहीं, खगोलविदों ने खोजे गुलाबी और हरे रंग के मृत तारे खगोलविदों के एक नए अध्ययन से सामने आया है कि अंतरिक्ष में मृत तारे केवल नीले या सफेद नहीं चमकते, बल्कि भारी घनत्व और ग्रहों के मलबे के कारण वे गुलाबी, हरे और बैंगनी रंगों में भी बदलते हैं। ब्रह्मांड में जब सूर्य के बराबर द्रव्यमान वाले तारे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचते हैं, तो उनका स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। ऐसे तारे पहले एक विशाल लाल दानव यानी रेड जाइंट का रूप लेते हैं और धीरे-धीरे अपनी बाहरी गैसीय परतों को अंतरिक्ष में बिखेर देते हैं। इस प्रक्रिया से दूरबीनों में खूबसूरत दिखने वाले ग्रहीय नीहारिका यानी प्लैनेटरी नेबुला का निर्माण होता है। जब यह पूरी गैस छंट जाती है, तब केंद्र में एक बेहद सघन अवशेष बचता है, जिसे सफेद बौना तारा यानी वाइट ड्वार्फ कहा जाता है। यह खगोलीय पिंड आकार में लगभग हमारी पृथ्वी जितना ही होता है, लेकिन इसका द्रव्यमान सूर्य के बराबर समाया रहता है। रंगों की नई दुनिया और दशकों पुरानी धारणा शुरुआती दौर में जब वैज्ञानिकों ने इन अवशेष तारों को देखना शुरू किया था, तब उनका तापमान अत्यधिक गर्म था। उस भयंकर गर्मी की वजह से वे सफेद से लेकर हल्के नीले रंग में चमकते नजर आए, जिसके आधार पर खगोल विज्ञान में उन्हें सफेद बौना नाम दिया गया। हालांकि, आरएएस टेक्निक्स एंड इंस्ट्रूमेंट्स जर्नल में प्रकाशित एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने इस पुरानी मान्यता को चुनौती दी है। शोध के अनुसार, इन ठंडे पड़ रहे तारों का संसार केवल श्वेत रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इनमें से कई तारे गुलाबी, हल्के हरे और गहरे बैंगनी रंग की अनोखी आभा बिखेर रहे हैं। सघन वायुमंडल और रासायनिक तत्वों की भूमिका वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि तारों के इस विचित्र रंग-रूप के पीछे उनका अत्यधिक घनत्व सबसे बड़ा कारण है। जैसे-जैसे ये तारे ठंडे होते जाते हैं, उनके वायुमंडल का घनत्व लगभग 1 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर तक पहुंच जाता है। साधारण तौर पर यह घनत्व पानी के घनत्व के बराबर लगता है, लेकिन किसी खगोलीय पिंड के वायुमंडल के लिहाज से यह बेहद सघन स्थिति है, जो सूर्य के बाहरी वायुमंडल की तुलना में करीब दस लाख गुना ज्यादा घनी है। इस अत्यधिक दबाव और सघनता के माहौल में जब कार्बन, कैल्शियम और सोडियम जैसे सूक्ष्म तत्व चारों ओर मौजूद घने हीलियम प्लाज्मा के साथ परस्पर क्रिया करते हैं, तो वे प्रकाश के अलग-अलग रंगों को सोखने लगते हैं। इसके चलते तारे से बाहर निकलने वाली रोशनी का स्पेक्ट्रम पूरी तरह बदल जाता है। प्राचीन ग्रहों के मलबे का खिंचाव तारों के रंगों में इस बदलाव की दूसरी बड़ी वजह उनके अपने प्राचीन सौरमंडलों का नष्ट होना है। जब कोई तारा अपने शुरुआती दौर में फूलकर लाल दानव बनता है, तो उसके सबसे नजदीकी ग्रह जलकर पूरी तरह खाक हो जाते हैं। इसके बाद बचे हुए अन्य दूरस्थ ग्रह और विशेष रूप से लाखों क्षुद्रग्रह यानी एस्टेरॉयड आपस में टकराने लगते हैं और धीरे-धीरे मृत तारे की ओर खिंचे चले आते हैं। इन बिखर चुके खगोलीय पिंडों और चट्टानों के टुकड़े जब उस सफेद बौने तारे के वायुमंडल में समा जाते हैं, तो वायुमंडल की रासायनिक संरचना बदल जाती है। किस तत्व से कौन सा रंग उभरता है पृथ्वी पर किसी शौकिया खगोलविद की साधारण दूरबीन से देखने पर कोई भी सफेद बौना तारा केवल एक बेहद मद्धम बिंदु जैसा ही नजर आता है। लेकिन अगर किसी अंतरिक्ष यान से इनके बिल्कुल पास जाकर देखा जाए, तो इनका नजारा बेहद भव्य और रंगीन होगा • गुलाबी और बैंगनी तारे: जिन सफेद बौनों के वायुमंडल में कार्बन की प्रचुर मात्रा जमा हो जाती है, वे आम तौर पर गुलाबी या बैंगनी रंग में दिखाई देते हैं। • पीले और हरे रंग के तारे: गणनाओं से पता चलता है कि जब किसी तारे का वायुमंडल टूटे हुए क्षुद्रग्रहों या अन्य चट्टानी पिंडों के मलबे से भर जाता है, तो वह पीली और कुछ मामलों में हरी चमक दिखाने लगता है। • हल्के नीले तारे: सबसे ठंडे हो चुके सफेद बौने अक्सर बेबी ब्लू यानी हल्के नीले रंग में चमकते हैं, जिसका कारण उनके अत्यधिक सघन वायुमंडल में हाइड्रोजन और हीलियम के परमाणुओं की होने वाली निरंतर टक्कर है। आकाशगंगा का पहला ज्ञात हरा तारा और अन्य उदाहरण इस अध्ययन में कुछ तारों के बेहद स्पष्ट और अनोखे उदाहरण दर्ज किए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख तारा डब्ल्यूडी जे1330+6435 है, जिसका तापमान करीब 4,000 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। इस तारे ने अपने पुराने ग्रहीय तंत्र से भारी मात्रा में चट्टानी मलबा सोख लिया है, जिसके कारण इसके वायुमंडल में कैल्शियम, लिथियम और सोडियम की भारी मौजूदगी हो गई है। इन तत्वों के मेल से इस तारे का रंग हल्का पीला-हरा यानी चार्टरूज दिखता है, जिससे यह हमारी पूरी आकाशगंगा में खोजा गया पहला ज्ञात हरा तारा बन गया है। इसी प्रकार, डब्ल्यूडी जे1011+2845 नामक सफेद बौने तारे के वायुमंडल में कार्बन का भारी भंडार मौजूद है। इसका लगभग सारा विकिरण 600 नैनोमीटर से अधिक की तरंग दैर्ध्य पर केंद्रित रहता है, जिससे यह गहरे सैल्मन-गुलाबी रंग में चमकता है। वहीं, डब्ल्यूडी जे902-2010 नामक तारा रंगों के स्पेक्ट्रम में बबलगम गुलाबी रंग की आभा बिखेरता है। अध्ययन के आंकड़े और पिछली वैज्ञानिक चूक इन रंगीन खोजों के बावजूद खगोलविदों का कहना है कि इन तारों का मूल नाम बदलने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ब्रह्मांड में अधिकांश सफेद बौने तारे वास्तव में सफेद ही हैं। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से 65 प्रकाश वर्ष के दायरे में मौजूद कुल 152 सफेद बौने तारों की विस्तृत जांच की। इनमें से केवल 5 तारों में ही यह असामान्य रंगीन चमक पाई गई। इसका सीधा गणितीय अर्थ यह है कि अंतरिक्ष में लगभग 30 में से सिर्फ 1 सफेद बौना तारा ही असामान्य रंगों में चमकता है। वैज्ञानिकों ने लंबे समय तक यह मान रखा था कि सफेद बौने तारे मुख्य रूप से नीले ही होते हैं, लेकिन अब साफ हुआ है कि यह सोच रात के आसमान के अवलोकन में पक्षपातपूर्ण नमूनों का परिणाम थी। सबसे ज्यादा गर्म तारे आमतौर पर सबसे ज्यादा चमकदार होते हैं और इसी वजह से उन्हें ब्रह्मांड में अत्यधिक दूरी से भी आसानी से देखा जा सकता है। चूंकि उन्हें खोजना और अध्ययन करना सरल था, इसलिए पुराने खगोलीय अध्ययनों में नीले तारों की संख्या जरूरत से ज्यादा दर्ज होती रही। पृथ्वी के सबसे नजदीक मौजूद पड़ोसी तारा सामान्य आंखों से रात के आकाश में सबसे नजदीकी सफेद बौने तारे को सीधे तौर पर देख पाना संभव नहीं है, लेकिन इसकी दिशा पहचानी जा सकती है। पृथ्वी के आसमान का सबसे चमकीला तारा सीरियस है, और सीरियस बी उसी का साथी तारा है। सर्दियों के मौसम में सीरियस तारे को पूर्वी क्षितिज के ऊपर तेज चमक के साथ आसानी से देखा जा सकता है। सीरियस बी उन सामान्य और शांत सफेद बौनों की श्रेणी में आता है, जिसका तापमान लगभग 25,000 केल्विन के आसपास रहता है और इसी कारण यह हल्के नीले रंग में दिखाई देता है। इसका आप पर असर तारों के रंगों और उनके रासायनिक व्यवहार में हुआ यह नया खगोलीय खुलासा आम लोगों और विज्ञान प्रेमियों के लिए ब्रह्मांड के विकास और ग्रहों के भविष्य को समझने का नया नजरिया देता है। • ब्रह्मांडीय समझ: अंतरिक्ष प्रेमियों और छात्रों के लिए यह खोज दिखाती है कि पाठ्यपुस्तकों में दी गई पारंपरिक धारणाएं नई तकनीकों के साथ बदलती हैं। इससे तारों के वास्तविक स्वरूप और ग्रहों के विनाश के बाद के अवशेषों को समझने में मदद मिलती है। • ग्रहों का भविष्य: यह अध्ययन हमें हमारे अपने सौरमंडल के सुदूर भविष्य की एक झलक दिखाता है। जब अरबों साल बाद सूर्य एक सफेद बौना बनेगा, तब पृथ्वी और आसपास के क्षुद्रग्रहों का क्या हाल हो सकता है, यह शोध उसे स्पष्ट करता है। • आसमान निहारने वालों के लिए: शौकिया खगोलविद अब सर्दियों की रातों में पूर्वी क्षितिज पर सीरियस तारे को देखकर उसके साथी सफेद बौने तारे सीरियस बी की मौजूदगी की कल्पना बेहतर तरीके से कर सकते हैं। हालांकि इसे नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन इसकी स्थिति पहचानना आसान हो जाता है। • वैज्ञानिक शोध का दायरा: दूरबीनों की पुरानी तकनीकी सीमाओं से बने पूर्वाग्रहों को दूर करने में यह खोज मदद करेगी। अब शोधकर्ता केवल चमकदार नीले तारों पर केंद्रित रहने के बजाय ठंडे और अनोखे रंगों वाले अवशेष तारों पर भी ध्यान देंगे। ऐसा क्यों हुआ सफेद बौने तारों के असामान्य रंगों में चमकने के पीछे उनका भयंकर घनत्व और उनके आसपास मौजूद प्राचीन ग्रहों का विनाश मुख्य कारण है। अत्यधिक दबाव और बाहरी मलबे के मिलने से इन मृत तारों की भौतिक और रासायनिक स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। • अत्यधिक वायुमंडलीय घनत्व: जब तारे ठंडे होते हैं, तो उनके वायुमंडल का घनत्व पानी जितना यानी सूर्य के मुकाबले करीब दस लाख गुना ज्यादा हो जाता है। यह सघन हीलियम प्लाज्मा में मौजूद तत्वों को व्यापक स्पेक्ट्रम पर प्रकाश सोखने के लिए मजबूर करता है। • ग्रहों और क्षुद्रग्रहों का मलबा: लाल दानव चरण में नजदीकी ग्रहों के नष्ट होने के बाद दूर स्थित क्षुद्रग्रह आपस में टकराकर तारे की ओर खिंचते हैं। इन चट्टानी अवशेषों में मौजूद कैल्शियम, सोडियम, लिथियम और कार्बन तारे के वायुमंडल में घुलकर उसकी रंगत बदल देते हैं। • अवलोकन में पुरानी चूक: खगोलविद पहले मानते थे कि ऐसे तारे केवल नीले होते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि गर्म और चमकीले तारे दूर से भी आसानी से दिख जाते थे। 65 प्रकाश वर्ष के दायरे में 152 तारों की ताजा जांच से पहली बार रंगीन तारों की वास्तविक उपस्थिति साबित हुई है। सवाल-जवाब 1. सफेद बौना तारा क्या होता है? सूर्य के समान द्रव्यमान वाले तारे जब जीवन के अंत में अपनी बाहरी गैस छोड़ देते हैं, तो केंद्र में पृथ्वी के आकार और सूर्य के द्रव्यमान वाला एक सघन अवशेष बचता है, जिसे सफेद बौना कहते हैं। 2. वैज्ञानिकों को सफेद बौने तारों में कौन से नए रंग मिले हैं? शोधकर्ताओं ने पाया है कि कुछ ठंडे सफेद बौने तारे असामान्य रूप से गुलाबी, हल्के हरे, पीले और बैंगनी रंगों में चमकते हैं। 3. तारे का रंग बदलने की मुख्य वजह क्या है? तारे के वायुमंडल का अत्यधिक घनत्व और उसमें टूटे हुए क्षुद्रग्रहों तथा ग्रहों के मलबे से मिले कार्बन, कैल्शियम और सोडियम जैसे तत्व इसके रंग को बदल देते हैं। 4. आकाशगंगा में खोजा गया पहला हरा तारा कौन सा है? डब्ल्यूडी जे1330+6435 नामक तारा हमारी आकाशगंगा का पहला ज्ञात हरा तारा है, जो कैल्शियम, लिथियम और सोडियम की मौजूदगी के कारण चार्टरूज रंग में दिखता है। 5. ब्रह्मांड में रंगीन सफेद बौने तारे कितने आम हैं? अध्ययन के अनुसार 65 प्रकाश वर्ष के भीतर जांचे गए 152 तारों में से केवल 5 में असामान्य रंग मिले, यानी लगभग 30 में से 1 सफेद बौना ही रंगीन होता है। 6. पृथ्वी के सबसे पास मौजूद सफेद बौने तारे का क्या नाम है? सीरियस बी पृथ्वी के सबसे पास मौजूद प्रमुख सफेद बौना तारा है, जो सीरियस तारे का साथी है और करीब 25,000 केल्विन तापमान पर हल्का नीला चमकता है। https://trendkia.com/science/antariksha-men-sapheda-baune-tare-aba-sirpha-sapheda-nahin-khagolavidon-ne-khoje-gulabi-aura-hare-rnga-ke-mrita-tare-53890 TrendKia — Har trend, sabse pehle.