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  "title": "भरतपुर के गांवों में हर आषाढ़ में लौट आती है यह पीली रहस्यमयी चिड़िया, खजूर के पेड़ पर बसाती है अपना आशियाना",
  "summary": "राजस्थान के भरतपुर जिले में हर साल आषाढ़ के महीने में एक दुर्लभ पीली चिड़िया गांवों में दिखाई देती है, जो सिर्फ खजूर के पेड़ों पर ही अपना घोंसला बनाती है.",
  "content": "राजस्थान के भरतपुर जिले के गांवों में मानसून की शुरुआत के साथ ही एक अनोखी चिड़िया की चर्चा शुरू हो जाती है. साल के बाकी ग्यारह महीनों में यह पक्षी कहीं नजर नहीं आता, लेकिन आषाढ़ का महीना लगते ही अचानक गांव-गांव में दिखने लगता है. इसी वजह से ग्रामीणों ने इसे अपनी बोली में आषाढ़ की चिड़िया नाम दे दिया है.\n\nगौरैया जैसी शक्ल, लेकिन पीले रंग की अलग पहचान\nआकार और बनावट में यह चिड़िया आम गौरैया से मिलती जुलती है, इसलिए पहली नजर में कोई इसे खास पक्षी नहीं समझेगा. लेकिन इसके पंखों पर चढ़ी हल्की पीली आभा इसे भीड़ से अलग कर देती है. इसका शांत स्वभाव भी लोगों को भाता है और जैसे ही यह चिड़िया किसी गांव में दिखाई देती है, आसपास के लोग इसे देखने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं.\n\nखजूर के ऊंचे पेड़ों पर बनता है सुरक्षित घोंसला\nइस चिड़िया की सबसे दिलचस्प आदत इसका घोंसला बनाने का तरीका है. यह मुख्य रूप से खजूर के पेड़ों को ही अपना ठिकाना बनाती है और वहीं करीने से सजा हुआ सुंदर घोंसला तैयार करती है. खजूर के पेड़ लंबे और मजबूत होते हैं, जिससे ऊंचाई पर बना घोंसला जमीन के शिकारियों से सुरक्षित रहता है. इसके घोंसले सिर्फ मजबूत ही नहीं होते, बल्कि बनावट में भी इतने आकर्षक होते हैं कि देखने वाले तारीफ किए बिना नहीं रहते.\n\nआषाढ़ में ही क्यों आती है यह चिड़िया\nदरअसल यह पूरा मौसम इस चिड़िया के प्रजनन का समय होता है. आषाढ़ के दौरान ही यह खजूर के पेड़ों पर घोंसले बनाकर अंडे देती है. कुछ समय बाद जब बच्चे बड़े होने लगते हैं, तो यह चिड़िया उन्हें लेकर वहां से आगे कहीं और निकल जाती है. यही कारण है कि साल के बाकी महीनों में इसे ढूंढना लगभग नामुमकिन हो जाता है, यह सिर्फ आषाढ़ के मौसम से ही जुड़ी नजर आती है.\n\nप्रकृति प्रेमियों के लिए खास आकर्षण\nभरतपुर के गांवों में हर साल आने वाली यह हल्के पीले रंग की दुर्लभ चिड़िया प्रकृति प्रेमियों के बीच खासी दिलचस्पी का विषय बनी रहती है. इसका खूबसूरत रंग और करीने से बना घोंसला तो आकर्षक है ही, लेकिन इसकी मौसमी मौजूदगी और अचानक आना-जाना इसे और भी रहस्यमयी बना देता है. गांव वाले बताते हैं कि यह चिड़िया हर साल कुछ ही हफ्तों के लिए लौटती है और फिर अपनी सुंदरता की यादें छोड़कर गायब हो जाती है.\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: मानसून के मौसम में प्रकृति और पक्षियों में दिलचस्पी रखने वाले लोग इस तरह की मौसमी और दुर्लभ चिड़ियों को पहचानकर प्रकृति के इस चक्र को करीब से समझ सकते हैं.\n• भरतपुर में: स्थानीय ग्रामीणों और पक्षी प्रेमियों के पास आषाढ़ के महीने में खजूर के पेड़ों वाले इलाकों में जाकर इस दुर्लभ पीली चिड़िया को देखने का मौका रहता है, जो साल में सिर्फ कुछ हफ्तों के लिए ही मिलता है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह चिड़िया साल में कब दिखाई देती है?\nयह चिड़िया साल भर में केवल आषाढ़ के महीने में ही दिखाई देती है.\n\n2. इसे आषाढ़ की चिड़िया क्यों कहा जाता है?\nक्योंकि यह साल के बाकी महीनों में गायब रहती है और सिर्फ आषाढ़ महीने में नजर आती है, इसी वजह से ग्रामीणों ने इसका यह नाम रखा है.\n\n3. यह चिड़िया अपना घोंसला कहां बनाती है?\nयह मुख्य रूप से खजूर के पेड़ों पर ही अपना सुंदर और सलीकेदार घोंसला बनाती है.\n\n4. यह चिड़िया देखने में कैसी लगती है?\nयह आम गौरैया जैसी दिखती है, लेकिन इसका हल्का पीला रंग इसे अलग पहचान देता है.\n\n5. यह चिड़िया खजूर के पेड़ पर ही घोंसला क्यों बनाती है?\nखजूर के लंबे और मजबूत पेड़ों की ऊंचाई घोंसले को जमीन के शिकारियों से सुरक्षा देती है.\n\n6. अंडे देने के बाद यह चिड़िया कहां चली जाती है?\nअंडे देने और बच्चों के थोड़ा बड़ा होने के बाद यह चिड़िया अपने बच्चों के साथ वहां से किसी और जगह चली जाती है.\n\n7. यह चिड़िया किस इलाके में देखी जाती है?\nराजस्थान के भरतपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में यह चिड़िया आषाढ़ के महीने में देखी जाती है.",
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  "category": "विज्ञान",
  "publishedAt": "2026-07-21",
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    "आषाढ़ की चिड़िया",
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    "पीली चिड़िया",
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