बिना कानों के कैसे सुनती हैं तंबाकू हॉर्नवर्म की इल्लियां, वैज्ञानिकों ने खोली अनोखी पहेली वैज्ञानिकों ने एक अनोखे अध्ययन में पता लगाया है कि तंबाकू हॉर्नवर्म की इल्लियां बिना कान के भी शिकारियों की आहट कैसे भांप लेती हैं। इस शोध से अत्याधुनिक और किफायती माइक्रोफोन तकनीक विकसित करने में मदद मिल सकती है। तंबाकू हॉर्नवर्म की इल्लियों को देखने से ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि उनके पास कान जैसी कोई संरचना होती है। इसके बावजूद ये जीव तौलिए जैसे शिकारी ततैया की मौजूदगी को भांपने में पूरी तरह सक्षम होते हैं। जीव विज्ञानियों और इंजीनियरों की एक टीम इस बात का पता लगाने में जुटी है कि आखिर ये इल्लियां बिना किसी पारंपरिक कान के अपनी इस खास संवेदनशीलता का इस्तेमाल कैसे करती हैं। इस दिशा में चल रहे अध्ययन बताते हैं कि ये इल्लियां अपने शरीर पर मौजूद बेहद बारीक और अत्यधिक संवेदनशील बालों के जरिए ध्वनि सुनने का काम करती हैं। प्रकृति के इस अनूठे रहस्य को सुलझाने से जीवों की इन जटिल जैविक प्रणालियों की गहरी समझ हासिल होगी। इसके साथ ही इस खोज का इस्तेमाल नए और किफायती माइक्रोफोन उपकरणों के डिजाइन तैयार करने में भी किया जा सकता है। इन इल्लियों के शरीर पर उगने वाले बाल इतने नाजुक और संवेदनशील होते हैं कि उनके अध्ययन के लिए पूरी तरह शांत माहौल की आवश्यकता पड़ती है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों को अपने इस शोध के लिए दुनिया के सबसे शांत स्थानों में गिने जाने वाले एक विशेष कमरे का सहारा लेना पड़ा। अनेकोइक चैंबर के भीतर का अनोखा प्रयोग अनेकोइक चैंबर के भीतर होने वाली हर गतिविधि उसी कमरे तक सीमित रहती है क्योंकि उसकी डिजाइनिंग ही कुछ इस तरह की जाती है। इस प्रकार के चैंबर दुनिया के सबसे शांत स्थानों में शामिल होते हैं, जिन्हें किसी भी प्रकार की बाहरी और अवांछित आवाज को पूरी तरह रोकने के लिए विशेष रूप से तैयार किया जाता है। इस फ्लोटिंग चैंबर को भारी-भरकम स्टील के弹 springs यानी स्प्रिंग्स के सहारे हवा में टिकाया जाता है ताकि वह जमीन के संपर्क में बिल्कुल न आ सके। इस तरह के अलगाव से यह कमरा बाहरी दुनिया के किसी भी कंपन या शोरगुल से पूरी तरह सुरक्षित रहता है. शोधकर्ताओं ने इसी विशेष चैंबर के भीतर इल्लियों की प्रतिक्रियाओं का बारीकी से अध्ययन किया। पूरे एक साल तक हर रोज एक इल्ली को एक प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया जाता था और फिर अलग-अलग तीव्रताओं के कंपन उस प्लेटफॉर्म की ओर भेजे जाते थे। प्लेटफॉर्म से गुजरने वाले कंपन और उसकी सटीक हलचल को मापने के लिए एक विशेष उपकरण का इस्तेमाल किया गया जिसे एक्सेलेरोमीटर कहा जाता है। कंपन के जवाब में कई बार इल्लियां हवा में कूदती हुई दिखाई दीं, तो कभी वे अपनी शारीरिक ताकत के चलते झटके खाकर सिहर उठती थीं। इन लगातार अवलोकनों के जरिए वैज्ञानिकों ने उस खास थ्रेशहोल्ड यानी सीमा का पता लगा लिया जिसके नीचे जाने पर इल्लियां कंपन के प्रति प्रतिक्रिया देना बंद कर देती थीं। यदि कंपन उस निश्चित तीव्रता से कम होता था, तो इल्ली के शरीर पर किसी भी प्रकार की हलचल या प्रतिक्रिया नजर नहीं आती थी। इस स्पष्ट पैटर्न को देखने के बाद शोधकर्ताओं ने उसी अनेकोइक चैंबर के भीतर एक नया परीक्षण करने का फैसला किया, लेकिन इस बार उत्तेजना के रूप में सीधे कंपन की जगह हवा में तैरने वाली ध्वनि का प्रयोग किया गया। इस प्रयोग के पीछे मूल विचार यह था कि यदि इल्लियां कंपन की तुलना में ध्वनि के प्रति अधिक संवेदनशील साबित होती हैं, तो इसका मतलब है कि वे किसी भी भौतिक कंपन से पूरी तरह स्वतंत्र होकर हवा में मौजूद आवाज़ों को सुन रही हैं। सामान्य शब्दों में ध्वनि को कंपन या ऊर्जा का ही एक रूप माना जाता है जिसे कानों की मदद से सुना जा सकता है। लेकिन यहां एक तकनीकी पेंच यह भी है कि ध्वनि की वजह से आसपास की वस्तुएं भी कंपित होने लगती हैं। इस बात की पुख्ता पुष्टि करने के लिए कि इल्ली केवल प्लेटफॉर्म के जरिए ध्वनि के कंपन को महसूस नहीं कर रही थी, वैज्ञानिकों ने फिर से एक्सेलेरोमीटर का उपयोग किया। इस उपकरण के जरिए उस कंपन को मापा गया जो प्लेटफॉर्म को ध्वनि के कारण महसूस हुआ था, और इसकी तुलना सीधे कंपन वाले परिदृश्य से की गई। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान यह गौर किया गया कि इल्लियों ने सीधे कंपन के प्रति अपनी प्रतिक्रिया की सीमा से नीचे चले जाने के बावजूद उस हवा वाली ध्वनि के प्रति अपनी प्रतिक्रिया जारी रखी। इस महत्वपूर्ण परिणाम से साफ संकेत मिला कि ये जीव वास्तव में हवा में तैरने वाली आवाज़ों को सुनने में पूरी तरह सक्षम हैं। इल्लियों के अदृश्य कानों की तलाश इस पूरी प्रक्रिया के बाद सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया कि आखिर इन जीवों के कान कहां पर स्थित हैं। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो उनके शरीर में ध्वनि सुनने का काम करने वाली संरचनाएं वास्तव में क्या हैं। विज्ञान जगत में लंबे समय से सुनने की क्षमता को टिम्पनल अंगों के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है। अधिकांश स्तनधारियों में पाया जाने वाला टिम्पनल अंग एक पतली झिल्ली की तरह होता है जो ध्वनि तरंगों के दबाव के जवाब में कंपित होती है। इसके कांपने से उसके आसपास मौजूद हड्डियों की संरचनाएं भी गति करने लगती हैं। ध्वनि के दबाव पर प्रतिक्रिया देने वाले अधिकांश कीटों में इस टिम्पनल अंग के समकक्ष संरचना हवा से भरा हुआ एक छोटा थैला होती है। ऐसे कीट इस थैले में होने वाले किसी भी प्रकार के कंपन को ध्वनि के रूप में महसूस करते हैं। लेकिन तंबाकू हॉर्नवर्म जैसी इल्लियां इस पारंपरिक श्रवण प्रणाली के सामने एक बड़ी चुनौती पेश करती हैं, क्योंकि वे सुन तो सकती हैं लेकिन उनके पास कोई स्पष्ट टिम्पनल झिल्लियां नहीं होती हैं। पिछले कुछ शोधों को खंगालने और सूक्ष्मदर्शी के नीचे इन इल्लियों की बारीकी से जांच करने के बाद वैज्ञानिकों को उनके शरीर पर कुछ खास तरह के बाल दिखाई दिए। इन बालों के मिलने के बाद इस शोध का अगला चरण शुरू हुआ जिसमें वैज्ञानिकों ने उन बालों को हटाकर ध्वनि के प्रति इल्लियों की प्रतिक्रियाओं का मिलान किया। कुछ मामलों में सूक्ष्मदर्शी के नीचे चिमटी की मदद से सभी बालों को शल्य चिकित्सा द्वारा हटा दिया गया, तो कुछ अन्य मामलों में चुनिंदा बालों को ही निशाना बनाया गया। इसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले रहे क्योंकि अलग-अलग बालों को हटाने पर विभिन्न ध्वनि आवृत्तियों के खिलाफ इल्लियों की रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं में भारी गिरावट दर्ज की गई। हालांकि यह शोध अभी भी जारी है और इसके परिणामों को किसी आधिकारिक पत्रिका में प्रकाशित नहीं किया गया है, लेकिन इस काम की मदद से इल्लियों की सुनने की पहेली को सुलझाने में बड़ी सफलता मिल रही है। नई पीढ़ी के माइक्रोफोन तकनीक की राह कीटों द्वारा विशेष सूक्ष्म बालों का उपयोग करके ध्वनि सुनने के इस पूरे अध्ययन से भविष्य के लिए नई पीढ़ी के ध्वनिक उपकरणों को प्रेरणा मिल सकती है। मौजूदा समय में इस्तेमाल होने वाले मानक माइक्रोफोन ऐसे उपकरण होते हैं जिनके भीतर झिल्लियां यानी मेंब्रेन मौजूद होती हैं जो ध्वनि के दबाव के स्तर को भांप सकती हैं। भविष्य में इन जैविक प्रणालियों की नकल करके और मेंब्रेन की जगह इन बालों जैसी संरचनाओं का उपयोग करके नए माइक्रोफोन डिजाइन किए जा सकते हैं। इस तरह के माइक्रोफोन जो हवा के कणों के वेग को मापने की क्षमता रखते हों, वे किसी भी ध्वनि तरंग के उद्गम की सटीक दिशा का भी आसानी से पता लगा सकेंगे। श्रवण यंत्रों के लिए बनाए जाने वाले माइक्रोफोन डिजाइनों के मामले में ऐसा उपकरण जो ध्वनि के दबाव और हवा के कणों के वेग दोनों को ट्रैक करने में सक्षम हो, वह उपयोगकर्ता को ध्वनि तरंग की आवाज और उसकी दिशा दोनों की जानकारी एक साथ प्रदान कर सकता है। इल्लियों की श्रवण प्रणालियों का अध्ययन करके और उनके सुनने वाले बालों की नकल उतार कर इस तरह के दिशात्मक माइक्रोफोन विकसित करना भविष्य में संभव हो सकता है। इसका आप पर असर इस वैज्ञानिक अध्ययन का आम लोगों के दैनिक जीवन पर कोई सीधा और तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह भविष्य की ऑडियो तकनीक को पूरी तरह बदल सकता है। • भविष्य की तकनीक: इस शोध से प्रेरित होकर आने वाले समय में बेहद सटीक और सस्ते दिशात्मक माइक्रोफोन बनाए जा सकते हैं। • श्रवण यंत्र: हियरिंग ऐड्स और अन्य ऑडियो उपकरणों की गुणवत्ता में सुधार होगा जिससे उपयोगकर्ताओं को आवाज की दिशा समझने में आसानी होगी। • वैज्ञानिक प्रगति: कीटों की शारीरिक संरचनाओं को समझकर नई इंजीनियरिंग प्रणालियों को विकसित करने में मदद मिलेगी। सवाल-जवाब 1. तंबाकू हॉर्नवर्म की इल्लियां बिना कान के कैसे सुनती हैं? ये इल्लियां अपने शरीर पर मौजूद बेहद बारीक और अत्यधिक संवेदनशील बालों के जरिए हवा में तैरने वाली आवाज़ों और कंपनों को महसूस करती हैं। 2. अनेकोइक चैंबर क्या होता है? अनेकोइक चैंबर दुनिया के सबसे शांत स्थानों में से एक है जिसे विशेष रूप से बाहरी शोर और अवांछित कंपनों को पूरी तरह रोकने के लिए डिजाइन किया जाता है। 3. शोधकर्ताओं ने इल्लियों की सुनने की क्षमता की जांच कैसे की? वैज्ञानिकों ने एक साल तक इल्लियों को प्लेटफॉर्म पर रखकर कंपन और ध्वनि के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया और उनके बाल हटाकर परीक्षण किए। 4. इस शोध से किस तरह की तकनीक को बढ़ावा मिल सकता है? इस अध्ययन से प्रेरित होकर भविष्य में हवा के कणों के वेग को मापने वाले किफायती और दिशात्मक माइक्रोफोन बनाए जा सकते हैं। https://trendkia.com/science/bina-kanon-ke-kaise-sunati-hain-tnbaku-hornavarma-ki-illiyan-vaijnanikon-ne-kholi-anokhi-paheli-28266 TrendKia — Har trend, sabse pehle.