चीन के रहस्यमयी स्पेसप्लेन की तस्वीर ने खोली गुप्त अंतरिक्ष अभियानों की पोल, अमेरिकी रक्षा रिपोर्ट में बड़े खुलासे पेंटागन की खुफिया रिपोर्ट में चीनी स्पेसप्लेन की नई तस्वीरें और उसकी अंतरिक्ष क्षमताओं का ब्योरा सामने आया है। यह क्राफ्ट अमेरिकी एक्स-37बी जैसा दिखता है और कक्षा में उपग्रहों को पकड़ने और छोड़ने में सक्षम है। अंतरिक्ष की निचली कक्षा में चक्कर काट रहे चीन के बेहद गोपनीय स्पेसप्लेन की विस्तृत तस्वीरें सामने आने के बाद दुनिया भर के रक्षा विश्लेषकों का ध्यान इस गुप्त अभियान की ओर खिंचा है। इस मानवरहित विंग्ड यान की बनावट को देखने पर साफ पता चलता है कि इसमें डेल्टा विंग्स, पेलोड बे डोर्स, गहरे रंग की हीट शील्ड और बिजली पैदा करने वाले सोलर पैनलों से लैस एक रियर-माउंटेड सर्विस मॉड्यूल दिया गया है। कुल मिलाकर यह पूरी रूपरेखा अमेरिकी स्पेस फोर्स द्वारा संचालित एक्स-37बी स्पेसप्लेन की बनावट से काफी हद तक मेल खाती है, जिससे दोनों महाशक्तियों के बीच जारी अंतरिक्ष होड़ का नया अध्याय उजागर होता है। इस यान की यह तस्वीर एक वाणिज्यिक इमेजिंग सैटेलाइट की मदद से ली गई थी, जिसका संचालन वैन्टोर नामक कंपनी करती है, जिसे साल 2024 में मैक्सार के नाम से जाना जाता था। वैन्टोर उन कंपनियों में शामिल है जो अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों को दुनिया भर के विभिन्न ठिकानों की जासूसी तस्वीरें मुहैया कराती हैं। पृथ्वी की तस्वीरें उतारने के लिए तैयार किए गए यही सैटेलाइट अपने शक्तिशाली टेलीस्कोप का रुख अंतरिक्ष में मौजूद अन्य वस्तुओं की ओर भी मोड़ सकते हैं, जिससे अन्य उपग्रहों की गुप्त गतिविधियों को रिकॉर्ड करना संभव हो जाता है। खुफिया रिपोर्ट में सार्वजनिक हुई हाई-रेजोल्यूशन तस्वीर डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी यानी डीआईए के इस ताजा आकलन से पहले भी चीनी स्पेसप्लेन के सामान्य आकार को दर्शाने वाली कम रेजोल्यूशन की तस्वीरें सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध थीं। दक्षिण कोरिया में आयोजित एक सम्मेलन में अमेरिकी स्पेस फोर्स के एक अधिकारी ने मैक्सार द्वारा दर्ज की गई इस गतिविधि की जानकारी साझा की थी, लेकिन पेंटागन ने इसकी पूर्ण रेजोल्यूशन वाली मूल तस्वीर सोमवार तक आम जनता के लिए जारी नहीं की थी। इस तस्वीर को अंतरिक्ष में अमेरिका के सामने मौजूद खतरों से जुड़े डीआईए के एक गैर-वर्गीकृत दस्तावेज़ के साथ प्रकाशित किया गया है। हालांकि इस खुफिया रिपोर्ट से यह बहुत स्पष्ट नहीं हो पाता कि यह चीनी स्पेसप्लेन अपनी कक्षा में रहते हुए वास्तव में किन अभियानों को अंजाम देता है। साल 2020 के बाद से अब तक चीन ने ऐसे चार स्पेसप्लेन मिशन लॉन्च किए हैं, जिनमें से कुछ की अवधि नौ महीने तक रही है। इस श्रृंखला का चौथा मिशन फरवरी में प्रक्षेपित किए जाने के बाद से लगातार कक्षा में सक्रिय है। फिलहाल सार्वजनिक रूप से यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि चीन के बेड़े में ऐसे कितने स्पेसप्लेन मौजूद हैं या क्या वह केवल एक ही यान का बार-बार इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी एक्स-37बी और चीनी यान की कार्यप्रणाली इसकी तुलना में अमेरिकी स्पेस फोर्स रोटेशन के आधार पर दो एक्स-37बी यानों का संचालन करती है। अब तक पूरे किए गए आठ मिशनों में से अमेरिकी यान का सबसे लंबा सफर लॉन्च से लेकर लैंडिंग तक पूरे ढाई साल तक चला था। अमेरिकी अधिकारियों ने एक्स-37बी की तस्वीरें जारी की हैं, उसके आकार और आयामों की जानकारी प्रकाशित की है और उन कुछ प्रयोगों का विवरण भी साझा किया है जिन्हें यह कक्षा में लेकर गया था, हालांकि एक्स-37बी की अधिकांश अंतरिक्ष गतिविधियां आज भी पूरी तरह से गोपनीय रखी जाती हैं। अमेरिकी एक्स-37बी की तरह ही चीनी स्पेसप्लेन भी एक पारंपरिक रॉकेट के पेलोड फेयरिंग के भीतर बंद होकर अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरता है। एक बार कक्षा में स्थापित होने के बाद यह एक स्वतंत्र उपग्रह की तरह कार्य करने लगता है। यह यान नासा के पुराने स्पेस शटल के एक छोटे और मानवरहित संस्करण की तरह उड़ता है और प्रत्येक मिशन के अंत में पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते हुए जमीन पर बने रनवे पर स्वायत्त रूप से लैंडिंग करता है। इसके बाद ग्राउंड टीमें यान की जांच और मरम्मत करती हैं ताकि उसे अगली उड़ान के लिए फिर से तैयार किया जा सके। कक्षा में पैंतरेबाजी और उपग्रहों को पकड़ने की क्षमता डीआईए की रिपोर्ट के अनुसार, स्पेसप्लेन में मौजूद उन्नत पैंतरेबाजी क्षमताएं उन्हें सामान्य उपग्रहों की तुलना में कुछ खास तरह के जटिल मिशनों के लिए कहीं अधिक उपयुक्त बनाती हैं। अब तक चीनी स्पेसप्लेन ने केवल पृथ्वी की निचली कक्षा में कुछ सौ मील की ऊंचाई पर ही उड़ान भरी है। दूसरी ओर, अमेरिकी स्पेस फोर्स की एक्स-37बी उड़ानों में से एक उड़ान 24,000 मील से अधिक की ऊंचाई तक पहुंची थी, जिसके बाद उसने वायुमंडल में री-एंट्री और लैंडिंग की तैयारी के लिए एरोब्रेकिंग तकनीक का उपयोग किया था। चीन और अमेरिका के ये दोनों स्पेसप्लेन अपने कार्गो बे से छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में तैनात करने में सक्षम हैं। हाल के दिनों में चीन ने कक्षा में किसी वस्तु को पकड़ने की असाधारण क्षमता का प्रदर्शन किया है, जिसके लिए संभवतः एक रोबोटिक आर्म का इस्तेमाल किया गया। अंतरिक्ष उड़ान गतिविधियों का विस्तृत कैटलॉग तैयार करने वाले खगोल भौतिकीविद् जोनाथन मैकडॉवेल द्वारा ओपन-सोर्स ऑर्बिटल ट्रैकिंग डेटा के विश्लेषण से पता चला कि अंतरिक्ष में मौजूद चीनी यान ने जून के महीने में एक सब-सैटेलाइट को छोड़ा और जुलाई में उसे फिर से पकड़ लिया। इसके बाद अगस्त और सितंबर के महीनों में इसी प्रक्रिया को दोबारा सफलतापूर्वक दोहराया गया। नाम का रहस्य और नॉन-अर्थ इमेजिंग तकनीक इस चीनी स्पेसप्लेन का आधिकारिक नाम भी एक गहरा रहस्य बना हुआ है। पश्चिमी प्रकाशनों में इसे अक्सर शेनलॉन्ग के नाम से पुकारा जाता है, जो रोबोटिक स्पेसप्लेन के विकास को लेकर 2000 के दशक में आई चीनी रिपोर्टों पर आधारित है। सिक्योर वर्ल्ड फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित एक तथ्य-पत्रक के अनुसार, चीनी सरकारी मीडिया इस यान को केवल 'चोंगफू शियोंग शियान हांगतियान की' यानी सीएसएसएचक्यू कहता है, जिसका सीधा अर्थ पुन: प्रयोज्य प्रयोगात्मक अंतरिक्ष यान होता है। डीआईए ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि मैक्सार ने चीनी स्पेसप्लेन को किस समय, किस सटीक स्थान या कितनी दूरी से देखा था। सामान्यतः पृथ्वी पर नजर रखने वाले कैमरे अंतरिक्ष में अन्य वस्तुओं को उस समय रिकॉर्ड करते हैं जब उनकी कक्षाएं एक-दूसरे को पार करती हैं। इस उभरते हुए तकनीकी क्षेत्र को नॉन-अर्थ इमेजिंग या एनईआई कहा जाता है। एनईआई तकनीक वाणिज्यिक ऑपरेटरों और सरकारी विश्लेषकों को अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे उपग्रहों की करीबी जांच करने की सुविधा देती है। यह क्षमता गोपनीय या मालिकाना सैटेलाइट डिजाइनों के बारे में महत्वपूर्ण विवरण जुटाने में बेहद उपयोगी साबित हो रही है, जिससे अंतरिक्ष की सीमा में जासूसी का एक नया दौर शुरू हो गया है। अंतरिक्ष में रूसी गतिविधियां और एनईआई का फर्क मैक्सार और अन्य वाणिज्यिक फर्मों द्वारा एनईआई क्षेत्र में प्रदर्शित की गई यह क्षमता कुछ सैन्य अंतरिक्ष यानों की हालिया गतिविधियों से काफी अलग है। उदाहरण के लिए, रूस के कॉसमॉस 2612 उपग्रह ने इसी महीने एक अमेरिकी रडार इमेजिंग उपग्रह के बेहद करीब पहुंचने के लिए जानबूझकर अपनी दिशा बदली थी। इसके विपरीत, वाणिज्यिक एनईआई तस्वीरें आमतौर पर अत्यधिक तेज गति से एक-दूसरे के पास से गुजरने के दौरान संयोगवश रिकॉर्ड की जाती हैं। रूस के अन्य अंतरिक्ष हथियार प्रणालियों में निवेलिर प्रणाली शामिल है, जिसे एक उपग्रह से दूसरे उपग्रह पर प्रोजेक्टाइल दागने के लिए डिजाइन किया गया है। रूसी सेना ने 2020 में निवेलिर प्रणाली का उपयोग करके एक हमले का सिमुलेशन किया था। इसके अलावा, अप्रैल में रूस ने छोटे उपग्रहों का एक बेड़ा उस कक्षा में भेजा जो यूक्रेन को टोही तस्वीरें प्रदान करने वाले आइसआई के वाणिज्यिक रडार रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट के काफी करीब थी। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, रूसी उपग्रहों में से एक उपग्रह इसी महीने आइसआई उपग्रह के कुछ दसियों मीटर के दायरे में पहुंच गया था और फिर पीछे हट गया था। इसके साथ ही अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के अनुसार रूस अंतरिक्ष में परमाणु हथियार तैनात करने की महत्वाकांक्षा सहित अपने कक्षीय युद्ध कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में जुटा है। डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स और अंतरिक्ष सुरक्षा की चुनौतियां डीआईए के अंतरिक्ष खतरे के आकलन में एंटी-सैटेलाइट तकनीक और काउंटरस्पेस हथियारों को लेकर चीन के बढ़ते कदमों का भी ब्योरा दिया गया है। खुफिया एजेंसी के अनुसार, चीनी सेना डायरेक्टेड-एनर्जी वेपन्स यानी डीईडब्ल्यू को आदर्श काउंटरस्पेस प्रणाली मानती है, क्योंकि इनका उपयोग किसी उपग्रह को स्थायी या अस्थायी रूप से निष्क्रिय करने के लिए किया जा सकता है। अंतरिक्ष में लेजर का एक संभावित उपयोग दुश्मन के उपग्रह पर लगे सेंसर को चौंधियाना या अंधा करना हो सकता है। डीआईए का कहना है कि चीन के पास पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद उपग्रहों को बाधित करने, कमजोर करने या नुकसान पहुंचाने के लिए अलग-अलग शक्ति स्तरों वाले कई ग्राउंड-आधारित लेजर हथियार मौजूद हैं। 2020 के दशक के उत्तरार्ध तक चीन अंतरिक्ष-आधारित डायरेक्टेड एनर्जी सिस्टम और अधिक शक्तिशाली ग्राउंड-आधारित लेजर हथियार तैनात कर सकता है, जो उच्च कक्षाओं में स्थित उपग्रहों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करने में सक्षम होंगे। इसके अतिरिक्त, चीन ने ग्राउंड-आधारित एंटी-सैटेलाइट मिसाइलों का परीक्षण किया है और पिछले साल भू-समकालिक कक्षा में उपग्रह में ईंधन भरने का ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था। भूमध्य रेखा से लगभग 22,000 मील यानी 36,000 किलोमीटर ऊपर की इस ऊंचाई पर यह उपलब्धि हासिल करने वाला चीन दुनिया का एकमात्र देश है। इसके साथ ही चीन रोबोटिक आर्म का परीक्षण कर चुका है जो किसी अंतरिक्ष यान को उसकी कक्षा से खींच सकती है, और टीजेएस नामक उपग्रहों के एक बढ़ते बेड़े का संचालन करता है जो नियमित रूप से विदेशी अंतरिक्ष यानों के करीब पहुंचते रहते हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मींक ने पिछले महीने खुलासा किया था कि पेंटागन ने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर दिए हैं, जिससे अमेरिका कक्षीय हथियारों की मौजूदगी स्वीकार करने वाला पहला देश बन गया है। इसका आप पर असर अंतरिक्ष में महाशक्तियों की सैन्य गतिविधियों और जासूसी होड़ से आम नागरिक जीवन को सहारा देने वाली संचार प्रणालियों पर दूरगामी असर पड़ सकता है। • संचार और नेविगेशन सेवाएं: अंतरिक्ष में सैटेलाइट विरोधी हथियारों की होड़ से जीपीएस और इंटरनेट संचार उपग्रहों की सुरक्षा पर जोखिम बढ़ता है। यदि उपग्रहों के बीच टकराव या खराबी होती है, तो दैनिक नेविगेशन, ऑनलाइन बैंकिंग और मौसम पूर्वानुमान प्रणालियां बाधित हो सकती हैं। • वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग: उपग्रहों द्वारा एक-दूसरे की तस्वीरें खींचने की तकनीक से कंपनियों के गोपनीय तकनीकी डिजाइन सार्वजनिक होने का खतरा है। निजी एयरोस्पेस कंपनियों को अब अपने अंतरिक्ष यानों की सुरक्षा और पेटेंट गोपनीयता बनाए रखने के लिए नए सुरक्षा मानक अपनाने होंगे। • वैश्विक अंतरिक्ष सुरक्षा: अंतरिक्ष में हथियारों और उपग्रह रोधी प्रणालियों की तैनाती से कक्षा में मलबे की मात्रा बढ़ सकती है। यह कचरा भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधानों और सामान्य संचार उपग्रहों के संचालन को कई दशकों के लिए जोखिम भरा बना सकता है। • नागरिकों के लिए चेतावनी: सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि कक्षा में लड़े जाएंगे। साइबर हमलों और अंतरिक्ष आधारित व्यवधानों के चलते आपातकालीन सूचना प्रणालियों के लिए जमीनी बैकअप नेटवर्क की आवश्यकता बढ़ गई है। ऐसा क्यों हुआ चीन, अमेरिका और रूस के बीच अंतरिक्ष में रणनीतिक श्रेष्ठता हासिल करने की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण इस तरह के गुप्त स्पेसप्लेन और ऑर्बिटल हथियार विकसित किए जा रहे हैं। • रणनीतिक जासूसी और पैंतरेबाजी: पारंपरिक उपग्रह पूर्व-निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं, जिन्हें ट्रैक करना आसान होता है। विंग्ड स्पेसप्लेन अपनी कक्षा और दिशा बदलने में सक्षम होते हैं, जिससे वे गुप्त निगरानी और गोपनीय पेलोड परीक्षण के लिए आदर्श मंच बन जाते हैं। • उपग्रह रोधी क्षमताओं का विकास: आधुनिक युद्ध काफी हद तक उपग्रह आधारित टोही और संचार पर निर्भर करता है। दुश्मन के उपग्रहों को निष्प्रभावी करने के लिए रोबोटिक आर्म, डायरेक्टेड एनर्जी वेपन और स्पेसप्लेन जैसी प्रणालियों का विकास तेज हुआ है। • पुन: प्रयोज्य तकनीक की मांग: उपग्रहों को बार-बार नष्ट करने के बजाय ऐसे यान तैयार करना जो मिशन पूरा कर पृथ्वी पर लौट आएं, लागत और लचीलेपन के लिहाज से बेहद उपयोगी साबित होता है। अमेरिका की एक्स-37बी की दशकों पुरानी बढ़त को संतुलित करने के लिए चीन ने अपने स्पेसप्लेन कार्यक्रम में तेजी लाई है। सवाल-जवाब 1. चीनी स्पेसप्लेन की ताजा तस्वीरें किस कंपनी के सैटेलाइट ने ली हैं? यह तस्वीर वाणिज्यिक इमेजिंग सैटेलाइट कंपनी वैन्टोर द्वारा ली गई है, जिसे साल 2024 में मैक्सार नाम से जाना जाता था। 2. चीनी स्पेसप्लेन की मुख्य बनावट किस अमेरिकी यान जैसी है? इसकी बनावट अमेरिकी स्पेस फोर्स के एक्स-37बी स्पेसप्लेन से काफी मिलती-जुलती है, जिसमें डेल्टा विंग्स, हीट शील्ड और रियर सर्विस मॉड्यूल शामिल हैं। 3. चीन अब तक इस तरह के स्पेसप्लेन के कितने मिशन संचालित कर चुका है? चीन ने साल 2020 से अब तक चार ऐसे स्पेसप्लेन मिशन लॉन्च किए हैं, जिनमें से चौथा मिशन अभी कक्षा में सक्रिय है। 4. अंतरिक्ष में चीनी स्पेसप्लेन ने किस अनोखी क्षमता का प्रदर्शन किया है? इस यान ने अपनी कक्षा में एक सब-सैटेलाइट को छोड़ा और बाद में रोबोटिक आर्म जैसी तकनीक की मदद से उसे सफलतापूर्वक दोबारा पकड़ लिया। 5. नॉन-अर्थ इमेजिंग तकनीक क्या होती है? यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें पृथ्वी की निगरानी करने वाले उपग्रह अपने कैमरों का रुख अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे कृत्रिम उपग्रहों की ओर मोड़कर उनकी तस्वीरें खींचते हैं। 6. क्या अमेरिका ने अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने की बात स्वीकार की है? हां, वायुसेना के सचिव ट्रॉय मींक ने खुलासा किया था कि पेंटागन ने अंतरिक्ष में हथियार तैनात किए हैं, जिससे अमेरिका ऐसा स्वीकार करने वाला पहला देश बन गया है। https://trendkia.com/science/china-ke-rahasyamayi-spaceplane-ki-tasvira-ne-kholi-gupta-antariksha-abhiyanon-ki-pola-us-raksha-riporta-men-bare-khulase-53235 TrendKia — Har trend, sabse pehle.