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  "type": "article",
  "title": "धरती की गहराई से आ रहे जियोन्यूट्रिनो खोल रहे हैं भूगर्भीय गर्मी के अनसुलझे रहस्य",
  "summary": "कनाडा की गहरी खदान में स्थित स्नो+ डिटेक्टर ने पश्चिमी गोलार्ध में पहली बार दुर्लभ जियोन्यूट्रिनो पकड़े हैं। वैज्ञानिक इन कणों की मदद से पृथ्वी के मेंटल में मौजूद रेडियोधर्मी गर्मी और टेक्टोनिक हलचलों का रासायनिक नक्शा तैयार कर रहे हैं।",
  "content": "कनाडा के सडबरी में स्थित क्राइटन खदान की गहराइयों में स्नोलेब नामक भूमिगत भौतिकी प्रयोगशाला मौजूद है, जहाँ वैज्ञानिकों ने अत्यंत मायावी उप-परमाणु कणों को दर्ज करने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। भौतिक विज्ञान की दुनिया में न्यूट्रिनो को सबसे रहस्यमयी और मुश्किल से पकड़े जाने वाले कणों में गिना जाता है, लेकिन जब ये कण स्वयं पृथ्वी के आंतरिक गर्भ से फूटते हैं, तो इन्हें जियोन्यूट्रिनो कहा जाता है। स्नो+ नामक विशेष प्रयोग के जरिए शोधकर्ताओं ने इन कणों की पहली खेप रिकॉर्ड की है, जो पश्चिमी गोलार्ध के भीतर दर्ज की गई इस तरह की पहली माप है। दशकों की वैश्विक खोजबीन के दौरान वैज्ञानिकों के हाथ केवल कुछ सौ जियोन्यूट्रिनो ही लगे हैं, और इस नए परिणाम ने प्रेक्षित कणों की कुल संख्या में करीब 50 का इजाफा कर दिया है। यह खोज पृथ्वी की भीतरी गर्मी, टेक्टोनिक प्लेटों की गतिशीलता और मेंटल की वास्तविक बनावट को समझने के नए दरवाजे खोल रही है।\n\nपाताल में कैद डिटेक्टर और अत्यंत कठिन प्रयोग\nस्नो+ डिटेक्टर को जमीन से मीलों नीचे चट्टानों और पानी की विशाल ढाल के बीच स्थापित किया गया है ताकि अंतरिक्ष से बरसने वाले कॉस्मिक विकिरण के शोर को पूरी तरह रोका जा सके। यह डिटेक्टर एक मकान के आकार का ऐक्रेलिक गोला है, जिसके भीतर 780 टन तैलीय तरल सिंटिलेटर भरा हुआ है। इस विशाल गोले के चारों ओर लगभग 10,000 बेहद संवेदनशील लाइट डिटेक्टर लगाए गए हैं। जब भी कोई ऊर्जावान कण इस तैलीय तरल के भीतर से गुजरता है या अंतःक्रिया करता है, तो प्रकाश की एक नन्ही चमक पैदा होती है जिसे ये लाइट डिटेक्टर तुरंत भांप लेते हैं। सामान्य दिनों में यह पूरा कक्ष पृथ्वी की सबसे अंधेरी जगहों में से एक बना रहता है, जहाँ रोशनी की एक किरण का प्रवेश भी वर्जित होता है।\n\nप्रयोगशाला की शुद्धता बनाए रखने के लिए शोधकर्ताओं को बेहद कठोर प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। खदान के मुख्य शाफ्ट से उतरकर पथरीली सुरंगों से होते हुए जब वैज्ञानिक यहाँ पहुँचते हैं, तो उनके शरीर और कपड़ों पर वातावरण में मौजूद सूक्ष्म रेडियोधर्मी रेडॉन धूल चिपक जाती है। डिटेक्टर के मुख्य हिस्से में जाने से पहले काम के पुराने कपड़े उतार दिए जाते हैं, सभी को अनिवार्य रूप से नहाना पड़ता है और फिर गहरे नीले रंग के विशेष जंपसूट तथा हेयरनेट पहने जाते हैं। डिपाती जैसे शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्नान व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान को संदूषण से बचाने की एक अनिवार्य शर्त है। भूगर्भीय रहस्यों को खोजने के लिए इस स्तर की सतर्कता बेहद जरूरी मानी जाती है।\n\nपृथ्वी की आंतरिक भट्टी का ईंधन और जियोन्यूट्रिनो का जन्म\nजियोन्यूट्रिनो उन बुनियादी प्रक्रियाओं के दौरान पैदा होते हैं जो हमारी पृथ्वी के भीतर भीषण गर्मी उत्पन्न करती हैं। ग्रह के भीतरी हिस्से में मौजूद यह ऊष्मा मेंटल की चट्टानों में धीमी गति से होने वाले प्रवाह को ऊर्जा प्रदान करती है। यही चट्टानी हलचल सतह पर टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने, ज्वालामुखियों के फटने और पृथ्वी के जीवन-रक्षक चुंबकीय क्षेत्र को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की यह आंतरिक गर्मी दो प्रमुख स्रोतों से आती है। पहला स्रोत वह बची हुई प्रचंड ऊष्मा है जो अरबों साल पहले ग्रह के निर्माण के समय से मौजूद है, जबकि दूसरा बड़ा स्रोत मेंटल और क्रस्ट की चट्टानों में मौजूद यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों का क्षय होना है। यदि रेडियोधर्मी तत्वों से पैदा होने वाली यह दूसरी ऊर्जा न होती, तो हमारी पृथ्वी बहुत पहले ही ठंडी होकर टेक्टोनिक रूप से एक मृत ग्रह बन चुकी होती।\n\nक्वींस यूनिवर्सिटी के पार्टिकल एस्ट्रोफिजिसिस्ट रयान बेयस, जो स्नो+ प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, बताते हैं कि यह प्रयोग बेहद अनूठा है क्योंकि यह पूरी तरह पृथ्वी पर केंद्रित है। खगोलविदों और भौतिकविदों के अधिकांश अन्य उपकरण ब्रह्मांड के सुदूर कोनों से आने वाले सिग्नलों को पकड़ने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन स्नो+ सीधे तौर पर हमारी अपनी धरती के रासायनिक और ऊष्मीय ढाँचे की पड़ताल करता है। इन कणों की सीधी गिनती करके वैज्ञानिक यह सटीक आकलन कर सकते हैं कि पृथ्वी के भीतर कितने ऊष्मा-उत्पादक तत्व सक्रिय हैं।\n\nजापान, इटली और अब कनाडा: तीन जगहों के अलग-अलग आंकड़े\nजियोन्यूट्रिनो की पहली सफल माप वर्ष 2005 में जापान के कैमलैंड डिटेक्टर ने दर्ज की थी। इसके बाद वर्ष 2009 में इटली के बोरेक्सिनो डिटेक्टर ने कई दर्जन और कणों को पकड़कर इस खोज को आगे बढ़ाया। नवंबर 2025 में स्नो+ ने अपने पहले परिणामों की घोषणा करते हुए करीब 50 नए जियोन्यूट्रिनो दर्ज किए। इन तीनों प्रयोगों से मिले परिणामों की तुलना करने पर शोधकर्ताओं के सामने एक चौंकाने वाली तस्वीर उभर रही है। हालांकि नतीजों के विश्लेषण में कई अनिश्चितताएं मौजूद हैं, फिर भी शुरुआती अनुमान बताते हैं कि प्रत्येक प्रयोगशाला में दर्ज होने वाला जियोन्यूट्रिनो फ्लक्स एक दूसरे से काफी भिन्न है।\n\nक्वींस यूनिवर्सिटी के पार्टिकल एस्ट्रोफिजिसिस्ट और स्नो+ सहयोग के निदेशक मार्क चेन के अनुसार, यह इस बात का पहला संकेत हो सकता है कि पृथ्वी का मेंटल अंदर से पूरी तरह एक समान नहीं है। अब तक भूरसायनविदों की आम धारणा यह रही थी कि चट्टानों के निरंतर प्रवाह और घुलने-मिलने के कारण रेडियोधर्मी तत्व पूरे मेंटल में समान रूप से फैले हुए हैं। लेकिन विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर जियोन्यूट्रिनो की असमान संख्या इस पारंपरिक वैज्ञानिक सोच को चुनौती दे रही है।\n\nमेंटल के विशालकाय रहस्यों से गहराता संबंध\nवैज्ञानिकों का ध्यान इस बात पर भी गया है कि जियोन्यूट्रिनो पैदा करने वाले सबसे सक्रिय क्षेत्र पृथ्वी के केंद्र यानी कोर के दोनों तरफ स्थित असामान्य रूप से गर्म और घने पदार्थों के महाद्वीपीय आकार के विशालकाय पिंडों के ऊपर स्थित प्रतीत होते हैं। भूकंप विज्ञान में इन्हें लार्ज लो-शीयर-वेलोसिटी प्रोविंसेस या एलएलएसवीपी कहा जाता है। इनमें से एक विशाल संरचना अफ्रीका महाद्वीप के नीचे मौजूद है और दूसरी प्रशांत महासागर की गहराइयों के नीचे स्थित है। मार्क चेन बताते हैं कि मेंटल की गहराई में ऐसी अनसुलझी संरचनाएं हो सकती हैं जिन्हें हम अभी तक ठीक से नहीं समझ पाए हैं, और संभव है कि ये विशालकाय पिंड खास प्रकार के रेडियोधर्मी तत्वों को अपने भीतर केंद्रित कर रहे हों।\n\nचाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के भूरसायनविद विलियम मैकडोनो, जो दशकों से जियोन्यूट्रिनो अनुसंधान की अगुआई कर रहे हैं, का मानना है कि ये कण भविष्य में पृथ्वी के आंतरिक हिस्सों का एक संपूर्ण रासायनिक नक्शा तैयार करने में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये भिन्नताएं वास्तव में मेंटल के अलग-अलग हिस्सों में रेडियोधर्मी पदार्थों के असमान वितरण को दर्शाती हैं, या फिर यह अंतर अलग-अलग डिटेक्टरों द्वारा कणों की गिनती करने के तरीकों की तकनीकी सीमाओं से उपजा है। फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि अनिश्चितताओं का दायरा इतना बड़ा है कि किसी अंतिम नतीजे पर तुरंत नहीं पहुँचा जा सकता।\n\nविलियम मैकडोनो कहते हैं कि यदि इन आंकड़ों को सीधे तौर पर स्वीकार कर लिया जाए, तो ऐसा प्रतीत होगा कि पश्चिमी गोलार्ध में पूर्वी गोलार्ध की तुलना में बहुत अधिक रेडियोधर्मी पदार्थ मौजूद हैं। लेकिन वे आगाह करते हैं कि क्या इतालवी प्रयोग पूरी तरह सही है, क्या जापानी प्रयोग सही है, क्या दोनों सही हैं या कहीं कोई गंभीर चूक हो रही है, इसे लेकर अभी अतिरिक्त पड़ताल की जरूरत है।\n\nशोर के बीच से वास्तविक सिग्नल छांटने की जटिल चुनौती\nजियोन्यूट्रिनो की पहचान करना भौतिकविदों के लिए एक बेहद पेंचीदा प्रक्रिया है। रयान बेयस के शब्दों में, ये कण डिटेक्टर में आकर खुद अपनी पहचान नहीं बताते। शोधकर्ताओं को आने वाले सभी सिग्नलों को एक कड़ी छंटनी प्रक्रिया से गुजारना पड़ता है। सबसे पहले उन कणों के सिग्नलों को बाहर किया जाता है जिनकी ऊर्जा बहुत अधिक होती है। इसके अलावा हेलिसिटी नामक भौतिक गुण के आधार पर बेमेल कणों और दुनिया भर के परमाणु रिएक्टरों से निकलने वाले सामान्य न्यूट्रिनो को भी डेटा से छांटकर अलग करना पड़ता है।\n\nइसके बाद सबसे बड़ा काम पृथ्वी की अपनी क्रस्ट यानी ऊपरी भूपर्पटी से निकलने वाले जियोन्यूट्रिनो को घटाने का होता है। डिटेक्टर के आसपास कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में स्थित चट्टानों से आने वाले कण इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रखते हैं। जब इन सभी बाहरी और स्थानीय प्रभावों को कुल गिनती से घटा दिया जाता है, तब जाकर जो शेष बचता है, वही मेंटल से आने वाला वास्तविक जियोन्यूट्रिनो सिग्नल माना जाता है। सामान्य संदर्भ में देखें तो मेंटल से निकलने वाला यह फ्लक्स बोरेक्सिनो डिटेक्टर में बहुत अधिक दिखता है, जबकि कैमलैंड में यह काफी कम रहा है। कनाडा में स्नो+ के नीचे मेंटल की स्थिति इन दोनों के बीच की मानी जा रही है, हालांकि विस्तृत भूगर्भीय विश्लेषण पर काम अभी जारी है।\n\nस्नो+ के वैज्ञानिकों के लिए डिटेक्टर के आसपास के इलाके की जटिल भूगर्भीय संरचना को समझना एक और बड़ी चुनौती है। सडबरी का यह क्षेत्र करीब 1.8 अरब साल पहले एक विशालकाय उल्कापिंड के टकराने से बने बेसिन पर स्थित है। इटली की फेरारा यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता वर्जीनिया स्ट्राटी, जिन्होंने स्नोलेब के लिए स्थानीय रेडियोधर्मिता का मॉडल तैयार करने में मदद की है, बताती हैं कि इस भूगर्भीय इलाके में कई अज्ञात कारक मौजूद हैं। साथ ही मेंटल को गर्म करने वाले कुल रेडियोधर्मी पदार्थों के अनुमान में भी भारी अनिश्चितता है। आंकड़ों के अनुसार ये तत्व मेंटल की कुल गर्मी में कुछ प्रतिशत से लेकर आधे हिस्से तक का योगदान दे सकते हैं, और यह विसंगति हजारों परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के कुल उत्पादन जितनी विशाल है। वर्जीनिया स्ट्राटी का कहना है कि विभिन्न पैटर्नों के बीच का अपेक्षित अंतर इतना बारीक है कि वह इन मौजूदा अनिश्चितताओं के पीछे छिप जाता है।\n\nसमुद्र के तल पर नए डिटेक्टर की महत्वाकांक्षी योजना\nडिटेक्टरों से मिलने वाले जियोन्यूट्रिनो फ्लक्स को अधिक सटीक बनाने के लिए वैज्ञानिकों को और अधिक विस्तृत भूगर्भीय डेटा तथा हर स्थल पर लंबे समय तक कणों की गिनती की आवश्यकता होगी। हालांकि विलियम मैकडोनो का दृढ़ विश्वास है कि इस पूरी समस्या का सबसे कारगर और स्थायी समाधान समुद्र की तलहटी में एक नया न्यूट्रिनो डिटेक्टर स्थापित करना है। वे इस विचार की वकालत पिछले कई दशकों से कर रहे हैं।\n\nमहासागर के तल पर स्थित डिटेक्टर महाद्वीपीय चट्टानों से हजारों किलोमीटर दूर होगा, जिनमें रेडियोधर्मी तत्वों की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसके अलावा समुद्री क्रस्ट महाद्वीपीय क्रस्ट की तुलना में बहुत पतली और भूगर्भीय रूप से काफी एक समान होती है। ऐसी जगह पर क्रस्ट से जुड़ी सारी अनिश्चितताएं लगभग समाप्त हो जाएंगी और वैज्ञानिकों को सीधे तौर पर केवल मेंटल के शुद्ध सिग्नल हासिल होंगे। समुद्र के तल पर बनने वाले ऐसे विशालकाय डिटेक्टर की लागत सैकड़ों मिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जिसके चलते सरकारी फंडिंग एजेंसियों ने अब तक इसमें विशेष रुचि नहीं दिखाई है। इसके बावजूद विलियम मैकडोनो को उम्मीद है कि वे चीन में इस परियोजना को आगे बढ़ाने में सफल हो सकते हैं, जहाँ हाल के वर्षों में कई बड़े भू-विज्ञान प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी गई है। जब तक ऐसी कोई नई परियोजना हकीकत नहीं बनती, वैज्ञानिक खदानों की अथाह गहराइयों में ही पृथ्वी के इन छिपे रहस्यों को टटोलते रहेंगे।\n\nइसका आप पर असर\nपृथ्वी के भीतर मौजूद रेडियोधर्मी गर्मी और टेक्टोनिक प्रक्रियाओं की सटीक समझ हमारे ग्रह के दीर्घकालिक भूगर्भीय भविष्य और ऊर्जा संतुलन को स्पष्ट करती है।\n\n• भूगर्भीय सुरक्षा पर: पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा और मेंटल के प्रवाह को बेहतर समझने से भूकंप और ज्वालामुखी जैसी टेक्टोनिक आपदाओं के बुनियादी कारणों पर अधिक स्पष्ट वैज्ञानिक आंकड़े जुटाने में मदद मिलेगी। इससे भविष्य में जोखिम वाले क्षेत्रों के दीर्घकालिक भूगर्भीय मॉडल अधिक सटीक बनाए जा सकेंगे।\n• वैज्ञानिक शोध और तकनीक पर: अत्यंत कम बैकग्राउंड रेडिएशन वाले गहरे भूमिगत डिटेक्टरों का विकास अत्याधुनिक सेंसर और कण-भौतिकी तकनीकों को नई दिशा देता है। ऐसे प्रयोगों से निकलने वाली सेंसर तकनीक भविष्य में गहरे भूमिगत खनन और सटीक विकिरण निगरानी उपकरणों में काम आती है।\n• ग्रह के विकास की समझ पर: मेंटल में यूरेनियम और थोरियम जैसे तत्वों की सही मात्रा का पता चलने से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी कितने समय तक भूगर्भीय रूप से सक्रिय और रहने योग्य बनी रहेगी। इससे चुंबकीय क्षेत्र को ऊर्जा देने वाले बुनियादी स्रोतों का सही रासायनिक खाका तैयार होता है।\n• ऊर्जा और संसाधन मॉडलों पर: प्राकृतिक रेडियोधर्मिता से पैदा होने वाली ऊर्जा की सटीक गणना भू-तापीय ऊर्जा के वैश्विक स्रोतों और उनके वितरण को समझने में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। इस जानकारी से वैज्ञानिक महाद्वीपीय और समुद्री क्रस्ट की ऊष्मीय क्षमताओं का बेहतर तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह शोध इसलिए सामने आया क्योंकि वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि पृथ्वी के आंतरिक भाग को गर्म रखने और टेक्टोनिक प्लेटों को गति देने में रेडियोधर्मी तत्वों की वास्तविक भूमिका कितनी बड़ी है। दशकों की खोज के बावजूद वैज्ञानिकों के पास मेंटल के रासायनिक वितरण का कोई सीधा प्रमाण नहीं था।\n\n• सीधे रासायनिक संकेतों की कमी: पृथ्वी के गहरे मेंटल और क्रस्ट के निचले हिस्सों तक सीधे खुदाई करके नमूने लेना असंभव है, जिसके चलते केवल बाहर निकलने वाले जियोन्यूट्रिनो ही वहाँ की संरचना का सीधा संदेशवाहक बनते हैं। कनाडा के स्नो+ डिटेक्टर ने पश्चिमी गोलार्ध से पहली बार इन कणों को दर्ज करके नए आंकड़े जुटाए हैं।\n• रेडियोधर्मी क्षय से पैदा होने वाली ऊष्मा: पृथ्वी के अंदर यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम का लगातार होने वाला क्षय ग्रह को ठंडा होने से बचाता है और मेंटल की चट्टानों में प्रवाह बनाए रखता है। इस प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाले उप-परमाणु कण चारों दिशाओं में फैलते हैं और उन्हें पकड़ना ही इस प्रयोग का मूल उद्देश्य था।\n• विभिन्न स्थानों के परस्पर विरोधी आंकड़े: इससे पहले जापान के कैमलैंड और इटली के बोरेक्सिनो डिटेक्टरों ने अलग-अलग फ्लक्स दर्ज किए थे, जिससे यह सवाल उठा कि क्या मेंटल असमान है या गणना पद्धतियों में अंतर है। कनाडा के नए डिटेक्टर ने इस वैश्विक तुलना को आगे बढ़ाने के लिए अपना डेटा प्रस्तुत किया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जियोन्यूट्रिनो क्या होते हैं?\nजियोन्यूट्रिनो वे अत्यंत सूक्ष्म उप-परमाणु कण हैं जो पृथ्वी के भीतर मौजूद यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के प्राकृतिक क्षय के दौरान पैदा होते हैं।\n\n2. स्नो+ प्रयोग कहाँ स्थित है?\nस्नो+ प्रयोग कनाडा के सडबरी में स्थित क्राइटन खदान के भीतर स्नोलेब नामक गहरी भूमिगत भौतिकी प्रयोगशाला में स्थापित है।\n\n3. स्नो+ डिटेक्टर में किन चीजों का उपयोग किया गया है?\nइस डिटेक्टर में एक मकान के आकार का ऐक्रेलिक गोला है, जिसमें 780 टन तैलीय तरल सिंटिलेटर भरा है और इसके चारों ओर करीब 10,000 संवेदनशील लाइट डिटेक्टर लगे हैं।\n\n4. जियोन्यूट्रिनो की पहली खोज कब और कहाँ हुई थी?\nजियोन्यूट्रिनो की पहली सफल माप वर्ष 2005 में जापान के कैमलैंड डिटेक्टर द्वारा दर्ज की गई थी, जिसके बाद 2009 में इटली के बोरेक्सिनो डिटेक्टर ने भी इन्हें दर्ज किया।\n\n5. वैज्ञानिक समुद्र के नीचे डिटेक्टर क्यों लगाना चाहते हैं?\nसमुद्र के नीचे डिटेक्टर लगाने से महाद्वीपीय चट्टानों का भारी रेडियोधर्मी शोर खत्म हो जाएगा क्योंकि समुद्री क्रस्ट पतली और एक समान होती है, जिससे सीधे मेंटल का साफ सिग्नल मिलेगा।",
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  "category": "विज्ञान",
  "publishedAt": "2026-10-04",
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