# यूरोप में बढ़ते तापमान से बढ़ा डेंगू और चिकुनगुनिया जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा

> यूरोप में लगातार बढ़ते तापमान के कारण एशियन टाइगर मच्छर तेजी से पैर पसार रहे हैं, जिससे डेंगू और चिकुनगुनिया जैसी बीमारियां अब गैर-उष्णकटिबंधीय इलाकों में भी फैल रही हैं।

**Type:** article · **Category:** विज्ञान · **Published:** 2026-07-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/science/europe-men-barhate-tapamana-se-barha-dengue-aura-chikungunya-jaisi-khataranaka-bimariyon-ka-khatara-11922 · **Language:** Hindi
**Tags:** यूरोप स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, डेंगू बुखार, चिकुनगुनिया, एशियन टाइगर मच्छर, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आक्रामक प्रजातियां

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में पर्यावरण और मौसम के मिजाज में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय देशों के लोग डेंगू बुखार और चिकुनगुनिया जैसे उष्णकटिबंधीय वायरल संक्रमणों को केवल दूसरे महाद्वीपों या गर्म देशों की यात्रा के दौरान होने वाला खतरा मानते थे। हालांकि, हालिया स्वास्थ्य आंकड़े बताते हैं कि मच्छरों की आक्रामक प्रजातियां अब यूरोप में अपनी मजबूत आबादी स्थापित कर रही हैं और स्थानीय स्तर पर उन बीमारियों को फैला रही हैं जिन्हें पहले बाहरी माना जाता था। इस स्थिति का एक बड़ा उदाहरण इटली के फानो शहर में देखने को मिला, जहां वर्ष 2024 में मध्य अगस्त से मध्य अक्टूबर के बीच डेंगू के 199 मामलों की पुष्टि हुई। हालांकि यह मुख्य भूमि यूरोप में स्थानीय स्तर पर डेंगू फैलने की पहली घटना नहीं थी, लेकिन पिछले मामलों की तुलना में यह अब तक का सबसे बड़ा प्रकोप था। पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई यूरोपीय देशों ने चिकुनगुनिया, जिससे जोड़ों में भयानक दर्द और सूजन होती है, और वेस्ट नील वायरस जैसी मच्छर जनित बीमारियों के फैलने की सूचना दी है। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, शोधकर्ताओं का अनुमान है कि उष्णकटिबंधीय बीमारियां अब केवल गर्म इलाकों तक सीमित नहीं रहेंगी और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

## एशियन टाइगर मच्छर: जीव विज्ञान, दायरा और सहनशक्ति
यूरोप में उष्णकटिबंधीय बीमारियों के तेजी से पैर पसारने के पीछे मुख्य रूप से _एडीज एल्बोपिक्टस_ नाम का मच्छर जिम्मेदार है, जिसे आमतौर पर एशियन टाइगर मच्छर या सिर्फ टाइगर मच्छर कहा जाता है। यह मच्छर अब दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में पाया जाता है। मच्छरों की आम प्रजातियों के विपरीत, एशियन टाइगर मच्छर रात के साथ-साथ दिन के समय भी इंसानों को काटता है। टाइगर मच्छर की आबादी यूरोप के कई हिस्सों, विशेष रूप से दक्षिणी यूरोपीय देशों में पहले से ही स्थापित हो चुकी है। इटैलियन नेशनल एजेंसी फॉर न्यू टेक्नोलॉजीज, एनर्जी एंड सस्टेनेबल इकोनॉमिक डेवलपमेंट (ईएनईए) के वरिष्ठ शोधकर्ता रिकार्डो मोरेटी, जो 20 से अधिक वर्षों से टाइगर मच्छरों पर शोध कर रहे हैं, के अनुसार यह मच्छर अब धीरे-धीरे उत्तर की ओर बढ़ रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि एशियन टाइगर मच्छर 20 से 30 डिग्री सेल्सियस (68 से 86 डिग्री फ़ारेनहाइट) के तापमान के बीच सबसे तेजी से पनपता है। इसके बावजूद, यह 10 डिग्री सेल्सियस (50 डिग्री फ़ारेनहाइट) जितने कम तापमान में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। रिकार्डो मोरेटी बताते हैं कि इस अनुकूलन क्षमता का मतलब है कि मौजूदा मौसम की स्थितियां इंग्लैंड जैसे ठंडे देशों में भी साल के सबसे गर्म महीनों के दौरान टाइगर मच्छर के प्रसार के लिए अनुकूल हो चुकी हैं। वहीं, ग्रीस जैसे दक्षिणी यूरोपीय देशों में मच्छरों का मौसम काफी लंबा होता जा रहा है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वयस्क टाइगर मच्छर दिसंबर तक उड़ते हुए देखे गए हैं और मार्च की शुरुआत में ही फिर से सक्रिय हो जाते हैं। वे सर्दियों के मौसम में अंडों के रूप में जीवित रहते हैं। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि आने वाले कुछ वर्षों में यूरोप में मच्छरों की ऐसी आबादी तैयार होने का ठोस जोखिम है जो पूरे साल जीवित रह सकती है।

## संक्रमण चक्र: छिटपुट मामलों से स्थायी खतरे की ओर
वर्तमान में यूरोप में मच्छर जनित बीमारियों के मामले आमतौर पर गर्मियों के अंत में सबसे अधिक दर्ज किए जाते हैं। यह वह समय होता है जब टाइगर मच्छरों की संख्या अपने चरम पर होती है और बड़ी संख्या में लोग छुट्टियों की यात्राओं से वापस लौट रहे होते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की यात्रा के दौरान अनजाने में डेंगू जैसे संक्रमण की चपेट में आता है और यूरोप लौटने पर उसे टाइगर मच्छर काट लेता है, तो वह मच्छर उस वायरस को स्थानीय निवासियों में फैलाना शुरू कर देता है। इस प्रकार स्थानीय स्तर पर संक्रमण के नए मामले सामने आते हैं।

अतीत में, मौसम ठंडा होते ही मच्छरों की गतिविधियां सुस्त पड़ जाती थीं और बीमारियों का प्रकोप स्वतः कम हो जाता था। लेकिन यदि मच्छरों का मौसम अधिक समय तक बना रहता है, तो संक्रमण फैलने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाती है। रिकार्डो मोरेटी का कहना है कि लंबे होते मौसम के कारण डेंगू जैसी उष्णकटिबंधीय बीमारियां यूरोप के कुछ हिस्सों में हमेशा के लिए स्थापित यानी स्थानिक हो सकती हैं। किसी बीमारी के केवल कभी-कभार फैलने और उसके हमेशा के लिए किसी क्षेत्र में मौजूद रहने की संभावना में बहुत बड़ा अंतर होता है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर स्थायी दबाव बन जाता है।

## तापमान का नया पैमाना: कम तापमान पर भी बीमारी का फैलाव
तापमान में महज एक या दो डिग्री का अंतर बीमारियों के फैलने की गति को पूरी तरह बदल सकता है। यूके सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी के महामारी विज्ञान मॉडलर संदीप तेगर के नेतृत्व में किए गए एक शोध में पाया गया कि टाइगर मच्छरों के जरिए चिकुनगुनिया फैलने के लिए जितना तापमान जरूरी माना जाता था, असल में उससे कम तापमान पर भी यह वायरस फैल सकता है। पहले माना जाता था कि चिकुनगुनिया वायरस 16 डिग्री सेल्सियस (61 डिग्री फ़ारेनहाइट) पर फैलता है, लेकिन इस अध्ययन से साबित हुआ कि यह मच्छर केवल 14 डिग्री सेल्सियस (57 डिग्री फ़ारेनहाइट) के तापमान पर भी वायरस फैला सकता है।

संदीप तेगर के अनुसार, वैश्विक तापमान में वृद्धि के दौर में यह दो डिग्री का अंतर बहुत मायने रखता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अधिकांश यूरोपीय देशों में और साल के लंबे समय तक चिकुनगुनिया के फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी रह सकती हैं। तापमान के इस नए पैमाने ने यूरोप में बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता के भूगोल को और विस्तृत कर दिया है।

## भीषण गर्मी, सूखा और बारिश का मिला-जुला प्रभाव
हालांकि गर्म तापमान आमतौर पर मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करता है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। यदि तापमान अत्यधिक बढ़ जाए, यानी 35 डिग्री सेल्सियस (95 डिग्री फ़ारेनहाइट) से ऊपर चला जाए, तो टाइगर मच्छरों के लिए जीवित रहना मुश्किल हो जाता है। स्पैनिश वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (सीईएबी) के पारिस्थितिकीविद् फ्रेडरिक बार्टुमियस बताते हैं कि हाल ही में भीषण गर्मी और जंगलों की आग से प्रभावित दक्षिणी फ्रांस और स्पेन में इस साल मच्छरों की संख्या में कमी देखी गई। इन क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण मच्छरों के पनपने के लिए स्थितियां अनुकूल नहीं थीं।

इसके अलावा, मच्छरों के प्रजनन के लिए बारिश का सही संतुलन होना भी बेहद आवश्यक है। यूके स्थित स्वास्थ्य फाउंडेशन वेलकम के जलवायु और संक्रामक रोग विशेषज्ञ फेलिप कोलन गोंजालेज बताते हैं कि मच्छरों को अंडे देने और उनके लार्वा व प्यूपा के विकास के लिए ठहरे हुए पानी की आवश्यकता होती है। यदि बारिश बहुत कम होती है, तो प्रजनन के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती। दूसरी ओर, यदि बहुत अधिक तेज बारिश हो जाए, तो वह पानी के बहाव के साथ मच्छरों के प्रजनन स्थलों को बहाकर ले जाती है। हवा में नमी, मच्छरों के भीतर वायरस का विकास और गर्म मौसम में इंसानों का व्यवहार भी बीमारियों के प्रसार को प्रभावित करता है। इन सभी कारकों के कारण मच्छरों और बीमारियों के पैटर्न को समझना जटिल हो जाता है, जिसके लिए निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है।

## मच्छरों पर जैविक नियंत्रण के नए प्रयोग
समय रहते मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करके बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। ईएनईए के शोधकर्ता रिकार्डो मोरेटी और उनकी टीम ने हाल ही में इटली में टाइगर मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए एक बड़ा प्रयोग किया। इस प्रयोग के तहत 10 लाख से अधिक ऐसे नर मच्छरों को पर्यावरण में छोड़ा गया जो जनन क्षमता के लिहाज से असंगत थे। जब इन नर मच्छरों ने जंगली मादा मच्छरों के साथ प्रजनन किया, तो मादाओं ने बांझ अंडे दिए। इससे संबंधित इलाके में उपजाऊ अंडों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई।

हालांकि, इस प्रकार के जैविक नियंत्रण में एक बड़ी चुनौती यह है कि विशेष बायोफैक्ट्री में मच्छरों का प्रजनन कराना काफी खर्चीला होता है। इस प्रयोग के लिए मच्छरों को मियामी में गूगल के डिबग प्रोग्राम के तहत विकसित किया गया था और फिर वहां से इटली भेजा गया था। रिकार्डो मोरेटी का मानना है कि मच्छरों को पूरी तरह से समाप्त करना असंभव है क्योंकि वे नए क्षेत्रों में बहुत तेज़ी से फैलते हैं। इसलिए मुख्य लक्ष्य उष्णकटिबंधीय वायरसों के संचरण के जोखिम को व्यापक स्तर पर घटाना होना चाहिए।

## सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और व्यक्तिगत सावधानी
यूरोपीय देशों के लिए असली परीक्षा यह है कि क्या उनकी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियां बीमारियों के छोटे-छोटे प्रकोपों को बड़ी स्वास्थ्य आपदा में बदलने से रोक सकती हैं। वेलकम के विशेषज्ञ फेलिप कोलन गोंजालेज कहते हैं कि एक आम गलतफहमी यह है कि तैयारी का मतलब केवल बीमारी के प्रकोप की भविष्यवाणी करना है। वास्तव में, असली तैयारी एक ऐसी मजबूत स्वास्थ्य संरचना का निर्माण करना है जो जोखिम सामने आने पर त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया दे सके। इस मामले में यूरोप के पास एक लाभ यह है कि उसकी विश्वसनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य और सूचना प्रणालियों के कारण अब तक मच्छर जनित बीमारियों के मामले समान जलवायु वाले दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में कम रहे हैं।

इसके साथ ही, यूरोप के आम नागरिकों को भी अब उन सावधानियों को अपनाने की आदत डालनी होगी जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लोग लंबे समय से अपनाते आए हैं। स्पेन में रहने वाले वैज्ञानिक फ्रेडरिक बार्टुमियस खुद अपने घर की खिड़कियों पर मच्छरदानी का इस्तेमाल करते हैं और गमलों में जमा ठहरे हुए पानी को नियमित रूप से खाली करते हैं। शाम के समय बाहर निकलने पर वे मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाते हैं और पूरे पैर ढकने वाले कपड़े पहनते हैं। उनका कहना है कि मच्छरों के बढ़ते खतरे से बचने के लिए ऐसे व्यावहारिक कदम उठाना ही सबसे कारगर उपाय है।

## एडीज एजिप्टी का नया खतरा और मालवाहक जहाजों के जरिए प्रसार
एशियन टाइगर मच्छर के अलावा, एक और आक्रामक प्रजाति _एडीज एजिप्टी_, जिसे येलो फीवर मच्छर कहा जाता है, यूरोप के लिए नया खतरा बन रही है। इस मच्छर की आबादी साइप्रस और पुर्तगाल के मडेरा द्वीपसमूह में पहले ही जम चुकी है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, यह मच्छर पीला बुखार (येलो फीवर) फैलाने के साथ-साथ डेंगू, चिकुनगुनिया और ज़िका वायरस का भी संवाहक है। हालांकि येलो फीवर मच्छर टाइगर मच्छर की तुलना में कम तापमान को सहन नहीं कर पाता, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय मालवाहक जहाजों और परिवहन साधनों के जरिए उत्तर दिशा के ठंडे इलाकों तक पहुंच रहा है। हाल ही में इस मच्छर की मौजूदगी लक्ज़मबर्ग के एक सर्विस स्टेशन पर दर्ज की गई थी।

## इसका आप पर असर
**भारत और वैश्विक स्तर पर:** गर्मी और शरद ऋतु के दौरान यूरोपीय देशों की यात्रा करने वाले यात्रियों को मच्छरों के काटने से बचाव के उपाय करने चाहिए, क्योंकि मच्छर जनित बीमारियां अब केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही हैं।

**सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से:** वैश्विक तापमान में वृद्धि दर्शाती है कि स्थानीय जलवायु परिवर्तन किस प्रकार बीमारी के संचरण पैटर्न को बदल सकते हैं, जिससे हर जगह व्यक्तिगत सुरक्षा और ठहरे हुए पानी के प्रबंधन का महत्व बढ़ जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. इटली के फानो शहर में डेंगू के प्रकोप का क्या कारण था?
फानो में मध्य अगस्त से मध्य अक्टूबर 2024 के बीच डेंगू के 199 मामले दर्ज किए गए, जो स्थानीय स्तर पर एशियन टाइगर मच्छरों के ज़रिए फैला था।

### 2. यूरोप में उष्णकटिबंधीय बीमारियां फैलाने के लिए मुख्य रूप से कौन सा मच्छर जिम्मेदार है?
मुख्य जिम्मेदार मच्छर एशियन टाइगर मच्छर (एडीज एल्बोपिक्टस) है, जो दिन और रात दोनों समय काटता है।

### 3. एशियन टाइगर मच्छर किस तापमान पर जीवित रह सकते हैं?
यह मच्छर 20 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच सबसे तेजी से पनपता है, लेकिन 10 डिग्री सेल्सियस जैसे कम तापमान में भी जीवित रह सकता है।

### 4. चिकुनगुनिया वायरस किस न्यूनतम तापमान पर फैल सकता है?
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, एशियन टाइगर मच्छर 14 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर भी चिकुनगुनिया वायरस को फैला सकते हैं।

### 5. मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए इटली में क्या प्रयोग किया गया?
शोधकर्ताओं ने 10 लाख से अधिक जनन-असमर्थ (बांझ) नर मच्छरों को छोड़ा, जिससे जंगली मादा मच्छरों द्वारा दिए गए उपजाऊ अंडों की संख्या में भारी कमी आई।

### 6. यूरोप में एशियन टाइगर मच्छर के अलावा कौन सी नई प्रजाति फैल रही है?
येलो फीवर मच्छर (एडीज एजिप्टी) साइप्रस और मडेरा में अपनी आबादी स्थापित कर चुका है और मालवाहक जहाजों के जरिए उत्तर की ओर फैल रहा है।

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