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  "type": "article",
  "title": "गुब्बारे के सहारे 21 किलोमीटर ऊपर समताप मंडल तक भेजा गया कार का बोनट, बेहद कठोर परिस्थितियों में जांची गई सुरक्षा कोटिंग",
  "summary": "तमिलनाडु में एक अनोखे एयरोस्पेस परीक्षण के तहत विशेष गुब्बारे से कार के बोनट को 21 किलोमीटर की ऊंचाई पर भेजा गया, जहां शून्य से 50 डिग्री नीचे के तापमान और तेज पराबैंगनी किरणों के बीच सुरक्षा फिल्म की मजबूती परखी गई।",
  "content": "धरती की सड़कों पर चलने वाले वाहनों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कोटिंग आमतौर पर धूल, धूप, मामूली रगड़ और बारिश से पेंट को बचाती है। इसी तकनीक को पृथ्वी की सामान्य परिस्थितियों से कहीं आगे ले जाकर वायुमंडल की अत्यधिक कठोर परतों में परखने का एक असाधारण वैज्ञानिक प्रयास तमिलनाडु में सामने आया है। चेन्नई स्थित एयरोस्पेस स्टार्टअप एयरो लॉन्च इंडिया ने एक विशेष हाई-एल्टीट्यूड बैलून की मदद से एक छोटी कार के बोनट को जमीन से 21 किलोमीटर की असाधारण ऊंचाई तक सफलतापूर्वक पहुंचाया। इस पूरे प्रयोग का मुख्य उद्देश्य ऑटोमोटिव डिटेलिंग ब्रांड कार्ज़स्पा की एजिस एक्सजी सीरीज पेंट प्रोटेक्शन फिल्म यानी पीपीएफ की टिकाऊपन क्षमता का परीक्षण करना था। यह परीक्षण शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस नीचे के कड़ाके की ठंड, अत्यधिक कम वायुमंडलीय दबाव और तीव्र पराबैंगनी विकिरण के बीच संपन्न हुआ।\n\nसमताप मंडल में सामग्री की परीक्षा का खास प्रारूप\nसड़कों पर चलने वाली गाड़ियों के लिए तैयार की गई पेंट प्रोटेक्शन फिल्म का प्राथमिक काम गाड़ी के मूल रंग और चमक को बाहरी खरोंचों और मौसम की मार से सुरक्षित रखना होता है। कार्ज़स्पा की स्थापना के 20 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित इस परियोजना का नाम एचएबी0226 रखा गया था। सामान्य तौर पर ऐसे परीक्षण प्रयोगशालाओं के भीतर नियंत्रित चेंबरों में किए जाते हैं, लेकिन इस बार इसे वास्तविक वायुमंडलीय परिस्थितियों के सीधे संपर्क में लाकर जांचने का निर्णय लिया गया। 1 नवंबर को तमिलनाडु के कुड्डालोर में स्थित कृष्णास्वामी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस के परिसर से इस मिशन को आसमान की ओर रवाना किया गया।\n\nउड़ान के दौरान यह पेलोड क्षोभमंडल को पार करते हुए समताप मंडल की निचली सीमा में 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक जा पहुंचा। वहां दर्ज किया गया तापमान लगभग माइनस 50 डिग्री सेल्सियस था। वायुमंडलीय घनत्व में भारी कमी और ओजोन परत के करीब होने के कारण उस ऊंचाई पर सूर्य की पराबैंगनी किरणों का प्रभाव जमीन की तुलना में कहीं अधिक तीव्र होता है। लगभग दो घंटे तक आसमान में रहने के बाद जब यह पूरा ढांचा सुरक्षित नीचे उतरा, तो प्रारंभिक जांच में फिल्म की बाहरी सतह पर किसी प्रकार का संरचनात्मक क्षरण, दरार अथवा स्पष्ट बदलाव देखने को नहीं मिला।\n\nफाल्कन हेवी के प्रक्षेपण से क्यों अलग रहा यह भारतीय प्रयोग\nकार को अंतरिक्ष की दिशा में भेजने का विचार सुनते ही अक्सर वर्ष 2018 में स्पेसएक्स द्वारा फाल्कन हेवी रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान के दौरान एलन मस्क की टेस्ला रोडस्टर को गहरे अंतरिक्ष की ओर भेजने वाली ऐतिहासिक घटना याद आ जाती है। हालांकि, भारत में संपन्न हुआ यह हालिया परीक्षण उस मिशन से मूल रूप से बिल्कुल भिन्न प्रकृति का था। स्पेसएक्स का वह अभियान एक पूर्ण विकसित भारी रॉकेट के जरिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर जाने का पेलोड प्रदर्शन था। इसके विपरीत, तमिलनाडु में किया गया यह परीक्षण किसी रॉकेट या अंतरिक्ष यान का उपयोग किए बिना पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल हाई-एल्टीट्यूड हीलियम बैलून तकनीक पर आधारित था।\n\nइस मिशन का उद्देश्य किसी वाहन को अनंत अंतरिक्ष में स्थापित करना नहीं था, बल्कि पृथ्वी के वायुमंडल की अत्यधिक ऊंचाई वाली परिस्थितियों का उपयोग एक नियंत्रित औद्योगिक और वैज्ञानिक परीक्षण मंच के रूप में करना था। इस प्रक्रिया में किसी भी रासायनिक ईंधन या रॉकेट प्रणोदन प्रणाली का उपयोग नहीं किया गया, जिससे यह परीक्षण कम लागत और पर्यावरण सुरक्षा के मानकों के पूरी तरह अनुकूल रहा।\n\nपेलोड का ढांचा और हाई-रेजोल्यूशन रिकॉर्डिंग प्रणाली\nएक भारी और सपाट धातु के बोनट को गुब्बारे के सहारे सुरक्षित रूप से 21 किलोमीटर ऊपर ले जाना तकनीकी दृष्टि से काफी चुनौतीपूर्ण कार्य था। एयरो लॉन्च इंडिया की इंजीनियरिंग टीम ने बोनट को केवल रस्सियों से बांधने के बजाय उसके चारों ओर एक विशेष एयरोस्पेस-ग्रेड सुरक्षात्मक ढांचा तैयार किया। अत्यधिक कम तापमान से आंतरिक उपकरणों को सुरक्षित रखने के लिए हल्के एक्सपैंडेड पॉलीस्टाइरीन का आवरण लगाया गया। इसके साथ ही हवा के तेज थपेड़ों और झटकों को झेलने के लिए मजबूत और वजन में बेहद हल्के कार्बन फाइबर पाइपों से एक सुदृढ़ ढांचा तैयार किया गया था।\n\nइस पूरे सफर को विस्तृत रूप से दर्ज करने और वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए 5.7K रेजोल्यूशन वाला 360 डिग्री कैमरा पेलोड के साथ जोड़ा गया था। कैमरे के लेंस ने घने बादलों की परतों को चीरते हुए आगे बढ़ते बोनट, नीले आकाश के विहंगम दृश्य और धरती की वक्रता की स्पष्ट फुटेज रिकॉर्ड की। यह फुटेज केवल दृश्य प्रमाण के लिए नहीं, बल्कि उड़ान के विभिन्न चरणों में हवा के दबाव और घर्षण के प्रभाव को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हुई।\n\nलॉन्च स्थल से 30 किलोमीटर दूर रिकवरी और परीक्षण परिणाम\nलगभग दो घंटे तक आसमान में अपनी यात्रा पूरी करने के बाद गुब्बारे के पैराशूट सिस्टम ने पेलोड को धीरे-धीरे जमीन की ओर उतारना शुरू किया। यह पेलोड कुड्डालोर के लॉन्च स्थल से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मेलकांगायन कुप्पम नामक स्थान पर उतरा। जीपीएस ट्रैकिंग की सहायता से एयरो लॉन्च इंडिया की रिकवरी टीम तुरंत मौके पर पहुंची और पूरे उपकरण सहित कार के बोनट को सुरक्षित अपने कब्जे में ले लिया।\n\nउपकरणों की जांच के बाद कार्ज़स्पा ने बताया कि चरम मौसम और विकिरण का सामना करने के बावजूद एजिस एक्सजी सीरीज फिल्म की सुरक्षात्मक परत पूरी तरह बरकरार पाई गई। कंपनी के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि 20 साल पूरे होने पर वे अपने उत्पाद की गुणवत्ता को साबित करने के लिए एक बेहद अनोखा और चुनौतीपूर्ण रास्ता चुनना चाहते थे। कंपनी के अनुसार, अब तक देश भर में लगभग 25 लाख वाहन मालिक उसके द्वारा दी जाने वाली विभिन्न डिटेलिंग और सुरक्षा सेवाओं पर अपना भरोसा जता चुके हैं।\n\nवैज्ञानिक पेलोड: पराबैंगनी विकिरण की गहन मैपिंग\nयह अभियान केवल एक ऑटोमोबाइल सुरक्षा उत्पाद की जांच तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसमें एक महत्वपूर्ण वायुमंडलीय अनुसंधान का पहलू भी शामिल किया गया था। सूरत की एयरोस्पेस स्टार्टअप स्टार यानी स्पेस टेक्नोलॉजी एंड एरोनॉटिकल रॉकेट्री द्वारा विकसित एक विशेष यूवी डेटा लॉगर भी इस पेलोड के साथ भेजा गया था। इस इलेक्ट्रॉनिक सेंसर प्रणाली ने उड़ान के दौरान जमीन से लेकर 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक अलग-अलग स्तरों पर पराबैंगनी विकिरण की बदलती तीव्रता को निरंतर दर्ज किया।\n\nइस आंकड़े के संग्रह से वैज्ञानिकों को वायुमंडल की अलग-अलग परतों में सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों के घनत्व को सटीक रूप से मापने में मदद मिली है। इस तरह के एकीकृत पेलोड ने यह प्रमाणित किया कि एक ही उड़ान के भीतर वाणिज्यिक उत्पाद परीक्षण और वास्तविक वैज्ञानिक डेटा संग्रह दोनों को एक साथ सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सकता है।\n\n35 किलोमीटर की ऊंचाई तक जाने की क्षमता और भविष्य की दिशा\nएयरो लॉन्च इंडिया की नींव वर्ष 2021 में हेमप्रसाथ और श्री रंगनाथन ने रखी थी। कंपनी का मुख्य केंद्र हाई-एल्टीट्यूड बैलून आधारित मिशनों को डिजाइन और निष्पादित करना है। कंपनी के पास उपलब्ध बैलून प्लेटफॉर्म विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक और वाणिज्यिक पेलोड को आवश्यकता पड़ने पर 35 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जाने में पूरी तरह सक्षम हैं।\n\nकंपनी के संस्थापकों ने अपनी यात्रा साझा करते हुए बताया कि शुरुआती चरण में उनका दायरा केवल गुब्बारे के जरिए एक बेसिक उड़ान मंच उपलब्ध कराने तक सीमित था। इसके बाद करीब पांच साल तक चले गहन अनुसंधान और विकास के बाद अब वे जटिल इंजीनियरिंग आवश्यकताओं वाले पेलोड खुद डिजाइन करने लगे हैं। आज यह स्टार्टअप वीडियो रिकॉर्डिंग, वास्तविक समय में डेटा संग्रह और उपकरणों की शत-प्रतिशत सुरक्षित रिकवरी जैसी एकीकृत सेवाएं प्रदान करने की स्थिति में पहुंच चुका है। एचएबी0226 मिशन ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारतीय एयरोस्पेस क्षेत्र में निजी कंपनियां अब केवल उपग्रहों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उन्नत वायुमंडलीय परीक्षण तकनीकों के जरिए विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को नए समाधान उपलब्ध करा रही हैं।\n\nइसका आप पर असर\nइस परीक्षण से वाहन मालिकों को चरम मौसम में कोटिंग की मजबूती समझने और उद्योग जगत को कम लागत वाले एयरोस्पेस परीक्षण के नए विकल्प मिलने में मदद मिलेगी।\n\n• वाहन मालिकों के लिए: यह परीक्षण दिखाता है कि आधुनिक सुरक्षा फिल्में सामान्य सड़क की धूल और धूप के अलावा बेहद कड़ाके की ठंड और तेज किरणों में भी अपना रूप नहीं खोती हैं। इससे अपनी गाड़ियों पर महंगी सुरक्षा परत लगवाने वाले उपभोक्ताओं का उत्पाद की गुणवत्ता पर भरोसा बढ़ता है।\n• ऑटोमोटिव उद्योग में: कंपनियों को अपने उत्पादों की क्षमता साबित करने के लिए महंगी प्रयोगशालाओं के अलावा वास्तविक वायुमंडलीय परिस्थितियों में परीक्षण का एक नया तरीका मिल गया है। इससे भविष्य में नई सामग्री और कोटिंग्स के विकास में तेजी आ सकती है।\n• रिसर्च और स्टार्टअप्स के लिए: छोटे उद्यमों और शोधकर्ताओं को महंगे रॉकेट मिशनों पर निर्भर हुए बिना अपने सेंसर और उपकरणों की समताप मंडल में जांच करने का सस्ता साधन उपलब्ध हुआ है। वे बहुत कम बजट में अपने वैज्ञानिक पेलोड को 20 से 35 किलोमीटर ऊपर भेज सकते हैं।\n• तमिलनाडु में: स्थानीय शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्टअप्स के बीच तालमेल बढ़ने से राज्य में निजी एयरोस्पेस गतिविधियों को नया प्रोत्साहन मिला है। कुड्डालोर जैसे क्षेत्रों में इस तरह के सफल प्रक्षेपण भविष्य के तकनीकी छात्रों को प्रेरित करते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह मिशन कार सुरक्षा सामग्री की सीमाओं को जांचने और निजी एयरोस्पेस क्षमताओं का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। इस प्रयोग के पीछे मुख्य तकनीकी और संस्थागत कारण इस प्रकार हैं:\n\n• उत्पाद की चरम परिस्थितियों में परीक्षा: कार्ज़स्पा अपनी 20वीं वर्षगांठ के मौके पर अपनी एजिस एक्सजी सीरीज पेंट प्रोटेक्शन फिल्म की मजबूती को सामान्य प्रयोगशाला से बाहर असामान्य प्राकृतिक माहौल में परखना चाहती थी। इसके लिए शून्य से 50 डिग्री नीचे के तापमान, कम वायुदाब और तीव्र पराबैंगनी किरणों से युक्त समताप मंडल को चुना गया।\n• एकीकृत पेलोड का विकास: एयरो लॉन्च इंडिया ने पांच साल के शोध के बाद ऐसा हल्का और मजबूत ढांचा तैयार किया जो कार के बोनट जैसे भारी पुर्जे को सुरक्षित ले जा सके। पॉलीस्टाइरीन और कार्बन फाइबर के मेल ने इस पेलोड को अत्यधिक ठंड और वायुमंडलीय दबाव झेलने में सक्षम बनाया।\n• वैज्ञानिक डेटा का संकलन: सूरत की स्टार्टअप स्टार द्वारा विकसित यूवी डेटा लॉगर को जोड़कर इस परीक्षण को केवल व्यावसायिक प्रदर्शन तक सीमित न रखकर वास्तविक वायुमंडलीय विकिरण डेटा जुटाने का अवसर बनाया गया। इससे अलग-अलग ऊंचाइयों पर सूर्य की किरणों की तीव्रता का सटीक रिकॉर्ड तैयार हुआ।\n• सस्ती परीक्षण तकनीक की मांग: उपग्रहों और रॉकेटों की तुलना में हाई-एल्टीट्यूड बैलून बहुत कम खर्च में सामग्री और उपकरणों के परीक्षण की सुविधा देते हैं। इस सफलता के बाद भारत में औद्योगिक उत्पादों की वायुमंडलीय जांच का चलन आगे और बढ़ सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कार के बोनट को 21 किलोमीटर की ऊंचाई पर क्यों भेजा गया था?\nकार्ज़स्पा की एजिस एक्सजी सीरीज पेंट प्रोटेक्शन फिल्म को शून्य से 50 डिग्री नीचे तापमान, कम वायुदाब और तीव्र पराबैंगनी किरणों के बीच परखने के लिए यह परीक्षण किया गया था।\n\n2. इस मिशन को किस कंपनी ने लॉन्च किया और यह कहां से उड़ाया गया था?\nइस मिशन को चेन्नई की एयरोस्पेस स्टार्टअप एयरो लॉन्च इंडिया ने 1 नवंबर को तमिलनाडु के कुड्डालोर स्थित कृष्णास्वामी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस से लॉन्च किया था।\n\n3. क्या परीक्षण के बाद कार के बोनट और फिल्म को कोई नुकसान पहुंचा?\nकरीब दो घंटे की उड़ान के बाद सुरक्षित बरामद किए गए बोनट की जांच में फिल्म की कोटिंग पर कोई स्पष्ट बदलाव या नुकसान नहीं देखा गया।\n\n4. यह मिशन एलन मस्क की टेस्ला कार वाले मिशन से किस प्रकार अलग था?\nएलन मस्क की टेस्ला को स्पेसएक्स के फाल्कन हेवी रॉकेट से गहरे अंतरिक्ष में भेजा गया था, जबकि यह प्रयोग बिना रॉकेट के हाई-एल्टीट्यूड बैलून से वायुमंडल के भीतर किया गया।\n\n5. बोनट के साथ कौन सा वैज्ञानिक उपकरण आसमान में भेजा गया था?\nसूरत की स्टार्टअप स्टार द्वारा तैयार किया गया यूवी डेटा लॉगर भेजा गया था, जिसने अलग-अलग ऊंचाइयों पर पराबैंगनी विकिरण की तीव्रता दर्ज की।\n\n6. पेलोड की लैंडिंग कहां हुई और इसे कैसे वापस पाया गया?\nपेलोड लॉन्च स्थल से लगभग 30 किलोमीटर दूर मेलकांगायन कुप्पम में उतरा, जिसे एयरो लॉन्च इंडिया की टीम ने मौके पर पहुंचकर सुरक्षित बरामद किया।",
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  "category": "विज्ञान",
  "publishedAt": "2026-11-04",
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