इसरो के निजीकरण की खबरों को एजेंसी ने बताया झूठ, 2035 में स्पेस स्टेशन और 2040 में चांद पर इंसान भेजने का खाका पेश इसरो ने सोशल मीडिया पर फैली निजीकरण की अफवाहों को सिरे से खारिज करते हुए बताया कि रूटीन तकनीक का उत्पादन अब निजी कंपनियां संभालेंगी, जबकि वैज्ञानिक 2035 में अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 में चांद मिशन जैसी बड़ी परियोजनाओं पर फोकस करेंगे। पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर एक ऐसी अफवाह तेजी से फैली, जिसमें दावा किया गया कि भारत की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी इसरो को किसी निजी कंपनी को बेचा जा रहा है और आने वाले समय में इसकी भूमिका खत्म हो जाएगी। इस दावे ने लोगों के बीच खासा भ्रम पैदा कर दिया, लेकिन इसरो ने खुद आगे आकर इस पूरे मामले पर सफाई दे दी और साफ कह दिया कि ऐसी कोई भी बात सच नहीं है। इसरो ने एक्स पर दी सफाई इसरो ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर बताया कि निजीकरण से जुड़ी खबरें पूरी तरह बेबुनियाद और गलत हैं। एजेंसी ने कहा कि उसका न तो निजीकरण हो रहा है और न ही उसका दबदबा किसी तरह कम होने वाला है। भारत के अंतरिक्ष मिशनों की अगुवाई अब तक इसरो करता आया है और आगे भी करता रहेगा। क्या है नेशनल स्पेस इकोसिस्टम की योजना असल में केंद्र सरकार इसरो की अगुवाई में एक नेशनल स्पेस इकोसिस्टम खड़ा कर रही है। इसके तहत जो तकनीक इसरो पहले ही विकसित कर चुका है, जैसे रूटीन सैटेलाइट बनाना और पुराने लॉन्च व्हीकल तैयार करना, उनके बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी अब निजी कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और सरकारी उपक्रमों यानी PSUs को सौंपी जाएगी। इसका मतलब यह नहीं कि इसरो इन प्रोजेक्ट्स से बाहर हो जाएगा, बल्कि रोजमर्रा के उत्पादन कार्य में उसकी सीधी भागीदारी घटेगी। अब वैज्ञानिकों का ध्यान किन मिशनों पर जब रूटीन उत्पादन का जिम्मा निजी क्षेत्र संभाल लेगा, तो इसरो के वैज्ञानिक अपनी ऊर्जा और समय अगली पीढ़ी की तकनीकों पर लगा सकेंगे। इस लिस्ट में साल 2035 तक भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन तैयार करना शामिल है। इसके अलावा 2040 तक किसी भारतीय एस्ट्रोनॉट को चांद की सतह पर उतारने का लक्ष्य भी रखा गया है। मंगल और शुक्र जैसे ग्रहों की तरफ डीप स्पेस मिशन भेजना और बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाले यानी री-यूजेबल लॉन्च व्हीकल तैयार करना भी इसी अगली पीढ़ी की योजना का हिस्सा है। 44 बिलियन डॉलर की स्पेस इकोनॉमी का टारगेट भारत की मौजूदा स्पेस इकोनॉमी करीब 8.4 बिलियन डॉलर की है। सरकार का लक्ष्य है कि साल 2033 तक इसे बढ़ाकर 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाया जाए। इतना बड़ा लक्ष्य अकेले इसरो के संसाधनों के दम पर हासिल करना मुमकिन नहीं है, इसीलिए निजी क्षेत्र की भागीदारी जरूरी मानी जा रही है। साल 2020 में भारत में गिनती के स्पेस स्टार्ट-अप्स हुआ करते थे, जबकि आज इनकी संख्या 450 से ज्यादा हो चुकी है। इससे साफ पता चलता है कि इस क्षेत्र में निजी निवेश और दिलचस्पी दोनों तेजी से बढ़ी हैं। सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर रहेगा पूरा सरकारी नियंत्रण इसरो ने यह भी स्पष्ट किया है कि निजी कंपनियां किसी भी सूरत में इसरो की जगह नहीं ले रही हैं, बल्कि वे साथ मिलकर भारत को स्पेस के क्षेत्र में मजबूत बना रही हैं। जो भी प्रोजेक्ट क्रिटिकल या नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े हैं, उनकी पूरी कमान सरकार और इसरो के ही हाथों में रहेगी। निजी कंपनियों और स्टार्ट-अप्स को सिर्फ उन कामों में शामिल किया जाएगा, जिनकी तकनीक पहले से परखी जा चुकी है। कुल मिलाकर इसरो की यह सफाई बताती है कि यह घटनाक्रम सिकुड़ने की नहीं बल्कि विस्तार की कहानी है। रूटीन काम बाहर सौंपकर एजेंसी अगले डेढ़ दशक में कहीं बड़े और मुश्किल लक्ष्यों की तरफ बढ़ने की तैयारी में है। इसका आप पर असर यह बदलाव सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर असर नहीं डालता, लेकिन जो लोग स्पेस सेक्टर में करियर, निवेश या कारोबार तलाश रहे हैं, उनके लिए यह बड़ी खबर है। • नौकरी के नए मौके: रूटीन सैटेलाइट और लॉन्च व्हीकल बनाने का काम अब निजी कंपनियों को मिलेगा, जिससे इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नई नौकरियां बनेंगी। एयरोस्पेस या मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ रहे युवाओं के लिए स्टार्ट-अप्स और PSUs में मौके बढ़ेंगे। • निवेश के दरवाजे खुलेंगे: सरकार का लक्ष्य 2033 तक स्पेस इकोनॉमी को 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाना है। जो निवेशक या उद्यमी स्पेस स्टार्ट-अप्स में पैसा लगाना चाहते हैं, उनके लिए यह क्षेत्र अगले कुछ सालों में तेजी से बढ़ने वाला बाजार बन सकता है। • बड़े मिशनों पर नजर रखें: 2035 तक भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 तक चांद पर भारतीय एस्ट्रोनॉट उतारने का लक्ष्य तय हुआ है। स्पेस में दिलचस्पी रखने वाले लोग इन तारीखों को याद रख सकते हैं क्योंकि आने वाले सालों में इनसे जुड़ी अहम घोषणाएं होती रहेंगी। • इसरो की साख पर कोई असर नहीं: क्रिटिकल और नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े प्रोजेक्ट पूरी तरह सरकार और इसरो के नियंत्रण में रहेंगे, इसलिए नागरिकों को इसरो की विश्वसनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। सवाल-जवाब 1. क्या इसरो को निजी हाथों में बेचा जा रहा है? नहीं, इसरो ने खुद एक्स पर पोस्ट कर पुष्टि की है कि उसका निजीकरण नहीं हो रहा। 2. इसरो की भूमिका में असल में क्या बदलाव आएगा? रूटीन सैटेलाइट और पुराने लॉन्च व्हीकल के बड़े पैमाने पर उत्पादन का काम अब निजी कंपनियां, स्टार्ट-अप्स और PSUs संभालेंगी। 3. भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन कब तक तैयार होगा? साल 2035 तक भारत अपना अंतरिक्ष स्टेशन तैयार करने का लक्ष्य रखता है। 4. भारतीय एस्ट्रोनॉट को चांद पर कब उतारने की योजना है? इसरो का लक्ष्य 2040 तक किसी भारतीय एस्ट्रोनॉट को चांद की सतह पर उतारना है। 5. भारत की स्पेस इकोनॉमी को कितने डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है? मौजूदा 8.4 बिलियन डॉलर की स्पेस इकोनॉमी को 2033 तक 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। 6. भारत में अभी कितने स्पेस स्टार्ट-अप्स सक्रिय हैं? आज भारत में 450 से ज्यादा स्पेस स्टार्ट-अप्स काम कर रहे हैं, जबकि 2020 में इनकी संख्या गिनती की थी। 7. क्रिटिकल और सुरक्षा से जुड़े स्पेस प्रोजेक्ट्स की कमान किसके पास रहेगी? ऐसे सभी प्रोजेक्ट्स की पूरी कमान पूरी तरह सरकार और इसरो के हाथों में ही रहेगी। https://trendkia.com/science/isro-ke-nijikarana-ki-khabaron-ko-ejensi-ne-bataya-jhutha-2035-men-spesa-steshana-aura-2040-men-chanda-para-insana-bhejane-ka-khak-28646 TrendKia — Har trend, sabse pehle.